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क्या खत्म हो गए इनेलो के दिन, सबसे बुरे दौर से गुजर रही है पार्टी

हरियाणा की सियासत में एक वक्त इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) की तूती बोलती थी. लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश चौटाला के परिवार में कलह हुआ और पार्टी टूटी. अब विधानसभा चुनाव से पहले विधायक टूट रहे हैं. इसी का नतीजा है कि दूसरे नंबर की पार्टी को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद करना पड़ रहा है.

ओम प्रकाश चौटाला (फोटो-PTI) ओम प्रकाश चौटाला (फोटो-PTI)

हरियाणा की सियासत में एक वक्त इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) की तूती बोलती थी. राज्य में सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होने से लेकर देश के उपप्रधानमंत्री का सफर तय करने वाले चौधरी देवीलाल ने इनेलो की नींव रखी थी. जिसे उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने आगे बढ़ाया और हरियाणा के तीन बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे.

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन हरियाणा में इनेलो को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी. शुरुआती दौर में किसी को नहीं लगा कि इनेलो एक परिवार की पार्टी है. लेकिन देवीलाल की चौथी पीढ़ी के कदम रखते ही यह पार्टी टूटी और अब पूरी तरह से बिखराव की ओर अग्रसर है. हरियाणा की राजनीति में सबसे बुरे दौर से गुजर रही इनेलो का दिन अब खत्म होता दिख रहा है.

लोकसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो टूटी और अब विधानसभा चुनाव से पहले विधायक टूटकर दूसरे दलों का दामन थाम रहे हैं. जींद उप चुनाव से शुरू हुई इनेलो छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है. नूंह सीट से विधायक जाकिर हुसैन और जुलाना से विधायक परमिंदर सिंह ढुल ने मंगलवार को इनेलो छोड़कर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में बीजेपी का दामन थाम लिया है.

जाकिर हुसैन की एंट्री से मुस्लिम बहुल मेवात में बीजेपी को फायदा मिलने की संभावना है. जींद को इनेलो का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन परमिंदर सिंह ढुल के बीजेपी का दामन थाम लेने के बाद इनेलो को इस इलाके में अपने वजूद बचाए रखना बड़ी चुनौती होगी. ढुल और हुसैन को मिलाकर बीजेपी में अभी तक इनेलो के पांच विधायक शामिल हो चुके हैं.

इससे पहले बरवाला से विधायक रणबीर गंगवा, हथीन से विधायक शेरसिंह रावत और फतेहाबाद से विधायक बलवान सिंह दौलतपुरिया बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. इसके अलावा मेवात इलाके से विधायक नसीम अहमद इनेलो छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं. यह सभी विधायक इनेलो के वफादार नेता रहे हैं, लेकिन इनेलो के कमजोर होने के बाद सभी उसका साथ छोड़ रहे हैं.

दरअसल हरियाणा के 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 47, इनेलो को 19 और कांग्रेस को 15 सीटें मिली थी, लेकिन हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) का कांग्रेस में विलय होने के बाद कुलदीप बिश्नोई और रेणुका बिश्नोई कांग्रेस विधायक हो गए और इनकी संख्या 17 हो गई.

इनेलो को 19 सीटें मिलने के चलते अभय चौटाला नेता प्रतिपक्ष बने थे, लेकिन 2019 आते-आते इनेलो के जींद से विधायक हरिचंद मिड्ढा और पिहोवा जसविंद्र संधू की मौत हो गई. इसके बाद इनेलो के दो धड़ो में बंटने के बाद पार्टी के विधायक नैना चौटाला, विधायक पिरथी नंबरदार, अनूप धानक, राजबीर फौगाट पार्टी से अलग हो गए. अब महज 8 विधायक बचे हैं. इसका नतीजा है कि हरियाणा में दूसरे नंबर की रही पार्टी से विधानसभा में विपक्ष का पद भी छिन गया है.

बता दें कि ओम प्रकाश चौटाला इनेलो के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. चौटाला और उनके बड़े बेटे अजय सिंह जूनियर बेसिक ट्रेनिंग टीचर्स भर्ती में घपला करने में 10 साल की जेल की सजा काट रहे हैं. चौटाला जेल से ही पार्टी के सारे अहम फैसले लेते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले कुनबे में छिड़ी राजनीतिक वर्चस्व को नहीं टाल सके. ओम प्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला के खिलाफ बड़े बेटे अजय सिंह चौटाला ने बगावत कर दी. जिसके चलते ओम प्रकाश चौटाला ने अजय चौटाला और उनके दोनों बेटे दुष्यंत और दिग्विजय को इनेलो से बाहर कर दिया.

चौटाला कुनबे में राजनीतिक वर्चस्व की जंग में इनेलो दो हिस्सों में बंट गई. एक तरफ अजय चौटाला ने अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) बना ली तो दूसरी तरफ अभय चौटाला ने पिता के साथ इनेलो की कमान अपने हाथ में ले ली. चौटाला परिवार में राजनीतिक बंटवारे के बाद बसपा अध्यक्ष मायावती ने इनेलो के साथ गठबंधन करने से मना कर दिया था.  

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले इनेलो के दो फाड़ का नतीजा था कि इनेलो और जेजेपी एक भी संसदीय सीट नहीं जीत सकी. यही नहीं देवीलाल की चौथी पीढ़ी के दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला जेजेपी से चुनावी मैदान में थे, लेकिन मोदी लहर में अपनी सीट नहीं बचा सके और ऐसे ही अभय चौटाला के नेतृत्व में उतरी इनेलो अपना खाता नहीं खोल सकी. जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में इनेलो दो सीटें जीतने में कामयाब रही थी.  

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