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मैं जेहादी बनना चाहता था और कामयाब हुआ: वकास

'मैं जेहादी बनना चाहता था. इसके लिए मैंने कई बार लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर ताज मोहम्मद से मुलाकात की, लेकिन उसने हर बार मुझे लौटा दिया. मैंने उसका पीछा नहीं छोड़ा और आखिरकार एक दिन मैं अपने मकसद में कामयाब रहा.'

पुलिस की गिरफ्त में आतंकी वकास पुलिस की गिरफ्त में आतंकी वकास

'मैं जेहादी बनना चाहता था. इसके लिए मैंने कई बार लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर ताज मोहम्मद से मुलाकात की, लेकिन उसने हर बार मुझे लौटा दिया. मैंने उसका पीछा नहीं छोड़ा और आखिरकार एक दिन मैं अपने मकसद में कामयाब रहा.'

हम अभी तक यही मानते आए हैं कि कोई भी इंसान आतंकी नहीं बनना चाहता और किस्‍मत, परिस्थिति व कई मायनों में मजबूरी उसे आतंक की राह पर आगे बढ़ाती है. लेकिन दिल्‍ली पुलिस की गिरफ्त में आए पाकिस्तानी आतंकवादी जिया उर रहमान उर्फ वकास ने जो खुलासा किया है, वो चौंकानेवाला है. वकास ने बताया है कि उसके दिमाग में शुरू से ही जेहादी बनने का फितूर सवार था.

दिल्ली पुलिस की पूछताछ के मुताबिक आतंकवादी बनने से पहले वकास ने कई बार लश्कर-ए-तैयबा के रिक्रूटर ताज मोहम्मद से मुलाकात की. उसने बताया कि ताज मोहम्मद ने पहले पहल उसे बच्चा समझ कर वापस लौटा दिया, लेकिन जब वकास ने आतंकी ट्रेनिंग लेने की जिद पकड़ ली तो एक दिन ताज ने उसे ट्रेनिंग देने के लिए हामी भर दी. यही नहीं, इसके बाद वकास अपने जैसे 20-25 लड़कों को लेकर ताज मोहम्मद के पास पहुंचा और बस उसी दिन से उसकी जिंदगी बदल गई.

क्‍या और कैसे होती थी ट्रेनिंग
वकास ने पुलिस को बताया है कि नौशेरा इलाके में 21 दिनों तक दौर-ए-आम के नाम से उनकी पहली ट्रेनिंग चली. ट्रेनिंग के लिए सभी को सुबह साढ़े पांच बजे उठना पड़ता था और फिर अगले 12 घंटों तक लगातार ट्रेनिंग होती थी. इसमें दो घंटे कसरत के भी शामिल थे. सुबह आठ बजे नाश्ते के लिए ब्रेक मिलता था और 2 घंटे की दिनी तालीम भी दी जाती थी. सुबह दस बजे से जी-टू, एके-47 और 0.32 और 0.30 बोर के हथियार चलाने की ट्रेनिंग होती थी. इसके लिए वहां बाकायदा शूटिंग रेंज मौजूद था.

वकास ने कहा, 'हमें ट्रेनिंग के लिए सबसे पहले नौशेरा इलाके में ले जाया गया. ये बात है 2009 की है. वहां सभी लड़कों को 7-8 के ग्रुप में बांट दिया गया और हम सबकी ट्रेनिंग शुरू हो गई. अबु बकर, अब्दलुला और अजहर हमारे ट्रेनर थे और अबु मंजूर देख-रेख किया करता था.' वकास ने आगे बताया कि ट्रेनिंग के बाद उसकी मुलाकात जैश-ए-मोहम्मद के अब्दुर्रहमान से हुई.

अपने और अब्‍दुर्रहमान के मुलाकात के बारे में वकास ने कहा, 'उनके कहने पर मैं वजीरिस्तान के फाटा इलाके में पहुंचा. वहां हमे मरगज-ए-अक्सा नाम की एक जगह पर रखा गया और फिर 20-25 और लड़कों के साथ मेरी दूसरी ट्रेनिंग शुरू हुई. यहां नासिर भाई कैंप के इंचार्ज थे. लेकिन ये ट्रेनिंग बहुत मुश्किल थी, जिसकी वजह से कई लड़कों ने बीच में ही ट्रेनिंग छोड़ दी.'

10 दिन की ट्रेनिंग और धमाका
वकास के अनुसार इसी ट्रेनिंग के दौरान उसे पहली बार विस्फोटकों का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी गई. उसने हाईड्रोजन पैराक्साइड, पोटैशियम क्लोराइड और अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल करना सीखा. दस दिन की इस ट्रेनिंग में उसे इलेक्ट्रॉनिक सर्किट जोड़ने और धमाकों को अंजाम देने का तौर-तरीका बताया गया और इस तरह बेगुनाहों की जान लेने और कत्ल-ए-आम मचाने के लिए एक आतंकवादी बन कर तैयार था.

हथियार चलाने से लेकर बम चलाने तक की ट्रेनिंग हासिल करने के बाद वकास खून-खराबे के लिए तैयार हो चुका था. वो अब्दुर्रहमान से मिला और अब्दुर्रहमान ने उसे कराची के एक होटल का पता बताते हुए अगले हुक्म तक वहीं रुकने को कहा. इसके बाद उसकी मुलाकात जावेद नाम के एक शख्‍स से हुई. लेकिन ये जावेद दरअसल इंडियन मुजाहिद्दीन के संस्थापकों में से एक रियाज भटकल था.

...और शुरू हुआ मुलाकातों का सिलसिला
रियाज से वकास की कई बार मुलाकात हुई और रियाज ने ही सितंबर 2010 में उसे एक पाकिस्तानी पासपोर्ट थमाते हुए कराची से कठमांडू जाने की सलाह दी. साथ ही यह भी बताया कि वहां उसकी मुलाक़ात तहसीन उर्फ मोनू नाम के एक शख्स से होगी. तहसीन अख्तर वही इंसान है जो बाद में आईएम का इंडिया चीफ बन गया. वकास की मानें तो तब मोनू ने ही उसे नेपाल के काठमांडू एयरपोर्ट पर रिसीव किया और इसके बाद वे सरहद लांघ कर नेपाल से हिंदुस्तान में दाखिल हो गए.

वकास के मुताबिक नेपाल आने के दौरान कराची की फ्लाइट में उसकी मुलाक़ात असदुल्ला अख्तर उर्फ हड्डी से हुई और तब से लेकर दोनों साथ-साथ रहने लगे. मोनू उन दोनों को लेकर सबसे पहले दरभंगा पहुंचा, जहां उसकी मुलाक़ात पहली बार यासीन भटकल के हुई और बस इसके बाद शुरू हो गई हिंदुस्तान को धमाकों से दहलाने की एक नई और खौफनाक साजिश.

खराब हो गईं दो ऊंगलियां
पुलिस की पूछताछ में वकास ने बताया कि भारत आने के बाद उन्‍होंने पहला धमाका 2010 की 7 दिसंबर को बनारस में किया. ये धमाके हाईड्रोजन पैराक्‍साइड से किए गए थे. वकास ने कहा, 'तब यासीन भाई, मोनू भाई और असदुल्लाह भाई हम सारे लोगों ने मिल कर काम किया था. असदुल्लाह भाई कोलकाता से केमिकल लेकर आए थे और मैंने आईईडी बनाई थी. तभी इत्तेफाक से एक आईईडी बनाते वक्त धमाका भी हो गया और मेरी दो ऊंगलियां भी खराब हो गईं.'

वकास ने पूछताछ में हिंदुस्तान में अपने पकड़े जाने से पहले अंजाम दिए गए एक-एक धमाकों का तफ्सील से ब्यौरा दिया है और बताया है कि किस तरह मोबाइल फोनन से दूर रह कर और नाम और ठिकाने बदल-बदल कर यासीन की अगुवाई में आईएम के लोग हिंदुस्तान को लहूलुहान करते रहे और सुरक्षा एजेंसियां हर धमाके के बाद उनका पीछा करती रहीं.

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