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...तो शिवानंद तिवारी ने उपेक्षा के कारण छोड़ा RJD का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद?

लालू के खास माने जाने वाले शिवानंद तिवारी ने भी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से किनारा कर लिया है. जिस तरीके से बयान जारी कर शिवानंद तिवारी ने पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से छुट्टी ली है, उससे साफ लगता है कि आरजेडी से उनका मोह उपेक्षा के कारण भंग हुआ है.

आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी (फाइल फोटोः indiatoday.in) आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी (फाइल फोटोः indiatoday.in)

  • आरजेडी में छोड़ा पद, नहीं छोड़ी पार्टी
  • तिवारी का किनारा करना बड़ा झटका

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का बुरा दौर समाप्त होता नजर नहीं आ रहा. चारा घोटाला मामले में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव जेल में सजा काट रहे हैं. बड़े बेटे तेज प्रताप और छोटे पुत्र तेजस्वी के बीच अनबन की खबरें आती रहती हैं, तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या ने भी तलाक का मामला दायर कर रखा है. अपनी स्थापना के बाद पहली बार पार्टी लोकसभा चुनाव में खाता खोलने में भी विफल रही. लालू के खास रहे नेता नेपथ्य में नजर आ रहे हैं.

ऐसे हालात में लालू के खास माने जाने वाले शिवानंद तिवारी ने भी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से किनारा कर लिया है. जिस तरीके से बयान जारी कर शिवानंद तिवारी ने पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से छुट्टी ली है, उससे साफ लगता है कि आरजेडी से उनका मोह उपेक्षा के कारण भंग हुआ है. उन्होंने अपने बयान में लिखा है कि थकान का अनुभव कर रहा हूं. शरीर से ज़्यादा मन की थकान है. तिवारी यहीं नहीं रुके. उन्होंने आगे लिखा कि संस्मरण लिखना चाहता था. वह भी नहीं कर पा रहा हूं. इसलिए जो कर रहा हूं, उससे छुट्टी पाना चाहता हूं.

शिवानंद तिवारी ने पद छोड़ने का बताया यह कारण

शिवानंद तिवारी ने लिखा है कि संस्मरण लिखने का प्रयास करूंगा. लिख ही दूंगा ऐसा भरोसा भी नहीं है, लेकिन प्रयास करूंगा. इसलिए आरजेडी की ओर से जिस भूमिका का निर्वहन अब तक मैं कर रहा था, उससे छुट्टी ले रहा हूं. हालांकि, इस बयान से यह साफ है कि उन्होंने आरजेडी से नाता नहीं तोड़ा है, बल्कि केवल पार्टी में अपनी जिम्मेदारी से छुट्टी ली है. लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि आरजेडी में अपनी उपेक्षा से शिवानंद तिवारी काफी दुखी हैं और एक तरह से पार्टी को उन्होंने यह संदेश दे दिया है कि अगर उनकी उपेक्षा जारी रही तो वह पार्टी भी छोड़ सकते हैं.

नेता बदले, बदली पार्टी लेकिन नहीं बदली निष्ठा

घोर समाजवादी पृष्ठभूमि के नेता शिवानंद तिवारी जिस पार्टी में रहे, जिसके साथ रहे, उसके साथ पूरी निष्ठा के साथ रहे. चाहे वह लालू प्रसाद यादव हों या फिर नीतीश कुमार, पार्टी के साथ-साथ उनके तर्क बदलते रहे, लेकिन निष्ठा नहीं. तिवारी की गिनती ऐसे नेताओं में होती है, जो अपनी अपनी उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकते. जेडीयू से राज्यसभा सांसद रहते हुए राजगीर में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में गठबंधन सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर शिवानंद तिवारी का बोलना पार्टी के नेताओं को रास नहीं आया था.

नतीजा यह हुआ कि राज्यसभा का टिकट कट गया और पार्टी ने बक्सर से 2014 लोकसभा चुनाव लड़ने का फरमान जारी कर दिया. शिवानंद तिवारी ने राजनीति से संन्यास लेने की बात कह दी, लेकिन आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें न सिर्फ अपनी पार्टी में बुलाया, बल्कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बनाया.

मजबूती से रखते हैं अपनी बात

जब तक शिवानंद तिवारी जेडीयू में थे, तब तक उनके निशाने पर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव रहे. जैसे ही वह फिर से आरजेडी में वापस लौटे, उनके निशाने पर नीतीश कुमार आ गए. चारा घोटाला मामले में याचिकाकर्ता रहने के बावजूद जब आरजेडी अध्यक्ष को इसी मामले में सजा हुई, तिवारी ने उसका खुलकर विरोध किया. भले ही इसके लिए उन्हें अगड़े-पिछड़े की राजनीति में ही क्यों न जाना पड़ा हो, यही उनकी विशेषता भी है. वह अपनी बात को पूरी मजबूती से रखते हैं.

लालू काल में थी काफी पूछ

आरजेडी के मुखिया लालू प्रसाद यादव जब तक जेल नहीं गए थे, तब तक शिवानंद तिवारी की पार्टी में जबरदस्त पूछ थी. पढ़ने-लिखने वाले नेता हैं, इसलिए आरजेडी के लिए और महत्वपूर्ण थे. हालांकि, लालू के जेल जाने के बाद जब पार्टी की कमान उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव के हाथ में आई, तब अन्य वरिष्ठ नेताओं की तरह वह भी उपेक्षा के शिकार हो गए. पार्टी की नीतियों का निर्धारण हो, किसी विषय पर कोई स्टैंड लेने की बात, तेजस्वी ने अनुभवी नेताओं की राय लेने के बजाय पार्टी चलाने में नए लोगों की राय को तरजीह दी और यह शिवानंद तिवारी को रास नहीं आता था.

करते रहे पार्टी का बचाव, दी नसीहत भी

वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा के बावजूद तिवारी आरजेडी का बचाव करते रहे, लेकिन पार्टी का भविष्य उन्हें भयभीत भी करता रहा. शायद यही वजह रही कि उन्होंने कई बार नीतीश कुमार को फिर से महा गठबंधन का नेता बनने का न्यौता दिया और जमकर तारीफ भी की. लोकसभा चुनाव में हार के बाद जब तेजस्वी यादव पार्टी की बैठकों से, पार्टी के कार्यक्रमों से दूर थे और वह कहां हैं, किसी को यह भी जानकारी नहीं थी, तब तिवारी ने उन्हें नसीहत भी दी.

ऐसे समय में जब पार्टी का मुखिया जेल में है, लालू परिवार में भी सबकुछ ठीक नहीं चल रहा, तिवारी जैसे अनुभवी नेता का पार्टी की सांगठनिक जिम्मेदारियों से किनारा करना बड़ा झटका है.

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