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...तो इस साल दालें फिर होंगी महंगी !

इस बार खराब मानसून की वजह से दालों की पैदावार तय लक्ष्य से 10 फीसद कम हुई है.

फोटो साभारः इंडिया टुडे फोटो साभारः इंडिया टुडे

खराब मानसून इस बार दालों की पैदावार पर भारी पड़ेगा. अनियमित बरसात, पाले और ओलों ने दालों की फसल को नुक्सान पहुंचाया है. इस वजह से देश में 2019-20 के लिए तय किए गए दालों की पैदावार के लक्ष्य को धक्का पहुंचा है. इंडियन पल्सेस ऐंड ग्रेन एसोसिएशन (IPGA) की हाल ही में जारी रिपोर्ट के मुताबिक ''इस बार भारत सरकार ने 26.30 मिलियन टन (MT) दालों की पैदावार का लक्ष्य रखा था. लेकिन खराब मानसून की वजह से तय लक्ष्य से 10 फीसद दालें कम पैदा हुईं.'' बर्बाद मानसून ने सबसे ज्यादा उड़द और मूंग (खरीफ की फसल) को नुक्सान पहुंचाया है. मूंग की पैदावार में 30 फीसद और उड़द में इस साल तकरीबन 50 फीसद की कमी आई है. भारत में दुनियाभर में सबसे ज्यादा दालें खाई जाती हैं. यही वजह है कि दुनिया में भारत सबसे ज्यादा दालें आयात भी करता है.

हालांकि दालों के मामले में भारत धीरे-धीरे आत्मनिर्भर होने की तरफ बढ़ रहा है. 2016-17 में 23.13 मिलियन टन (MT) जबकि 2017-18 में 25.42 मिलियन टन (MT) की बंपर पैदावार हुई. 2018-19 में पैदावार थोड़ी गिरकर 23.22 मिलियन टन (MT) ही रही. लेकिन दालों की पैदावार के मामले में भारत लगातार आत्मनिर्भर होता जा रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. इससे पहले के दशकों में दालों की पैदावार 14-18 मिलियन टन ही होती थी. 2015-16 में दालों के दाम बेतहाशा बढ़े थे.

सरकार को बेहद आलोचना का शिकार होना पड़ा था. लेकिन उसके बाद सरकार ने न्यूनतम सर्थन मूल्य बढ़ाकर, दालों की खरीद और आयात पर टैरिफ और नॉन टैरिफ बैरियर लगाकर किसानों को दाल उगाने के लिए प्रोत्साहित कर उत्पादन को बढ़ाया. ऐसे में इस आइपीजीए ने दालों की कमी से निपटने के लिए जल्द ही दालों का आयात करने और आयात कर में छूट देने की मांग की है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो 2015-16 की तरह तो नहीं लेकिन दालों पर महंगाई छाएगी.

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