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यूपी की राजनीति में क्यों खास हैं भूमिहार

यूपी में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार और पीएम मोदी के करीबी पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा की भूमिका को ले‍कर लगायी जा रही अटकलों ने अप्रत्यक्ष रूप में प्रदेश की राजनीति में भूमिहार जाति के प्रभाव की ओर भी इशारा किया है.

14 जनवरी को भाजपा में शामिल होते अरिवंद शर्मा 14 जनवरी को भाजपा में शामिल होते अरिवंद शर्मा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • योगी ने जिस तरह से बसपा विधायक और अपराधी मुख्तार अंसारी पर सख्त रवैया अपना उसके पीछे पूर्वांचल की भूमिहार जाति को सकारात्मक संदेश देने की रणनीति भी है
  • वर्ष 2005 में भाजपा के तत्कालीन विधायक और पूर्वांचल में भूमिहारों के बड़े नेता के रूप में उभर चुके कृष्णानंद राय की हत्या में जेल में बंद मुख्तार अंसारी पर आरोप लगे थे
  • एक अनुमान के मुताबिक यूपी में भूमिहारों की संख्या यूपी की कुल जनसंख्या का एक प्रतिशत ही है लेकिन प्रबल जातिगत एकता के चलते कोई भी राजनीतिक दल भूमिहारों को नजरंदाज नहीं कर सकता है

यूपी में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा की भूमिका को ले‍कर लगायी जा रही अटकलों ने अप्रत्यक्ष रूप में प्रदेश की राजनीति में भूमिहार के प्रभाव की ओर भी इशारा किया है. भाजपा के कुछ नेता अरविंद कुमार शर्मा को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका देने की पैरवी कर रहे हैं. इन नेताओं का दावा है कि अरविंद कुमार शर्मा को प्रदेश सरकार में बड़ी भूमिका देने से पूर्वांचल में भूमिहार जाति के बीच अच्छा संदेश जाएगा. मऊ के रहने वाले और 1988 बैच के गुजरात कॉडर के पूर्व आइएएस अधि‍कारी अरविंद कुमार शर्मा लंबे प्रशासनिक अनुभव के जरिये विकास कार्यों को और तेजी देने के साथ ही कार्यकर्ताओं में प्रशासनिक अमले को लेकर व्याप्त शिकायतों को दूर करने की पैरवी भी भाजपा नेता कर रहे हैं. अरविंद कुमार शर्मा के चर्चा में बने रहने के पीछे एक बड़ी वजह इनकी भूमिहार जाति है. वैसे तो मौजूदा भाजपा मंत्रिमंडल में दो बड़े भूमिहार नेता के रूप में कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही और बलिया से मंत्री उपेंद्र तिवारी हैं. कभी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल रहे पूर्व सांसद मनोज सिन्हा के जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर बनने के बाद से पूर्वांचल में भूमिहारों के कद्दावर व सक्रिय नेता की कमी खल रही थी. पूर्वांचल के कुछ भाजपा नेताओं का मानना है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में कोरोना काल के दौरान बचाव कार्य में उल्लेखनीय भूमिका अदा कर संक्रमण को थामने में अरविंद कुमार शर्मा की तारीफ है उसके बाद पार्टी पूर्वांचल में एक कद्दावर भूमिहार नेता के रूप में उन्हें सक्रिय कर सकती है.

हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) विधायक और अपराधी मुख्तार अंसारी पर सख्त रवैया अपना उसके पीछे पूर्वांचल की भूमिहार जाति को सकारात्मक संदेश देने की रणनीति भी है. वर्ष 2005 में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन विधायक और पूर्वांचल में भूमिहारों के बड़े नेता के रूप में उभर चुके कृष्णानंद राय की हत्या में जेल में बंद मुख्तार अंसारी पर आरोप लगे थे. वर्ष 1985 से गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट पर अंसारी फैमिली का कब्जा था. जब एक छत्र राज 2002 में कृष्णानंद राय ने तोड़ा तो अंसारी बंधुओं को करारा झटका लगा. कृष्णानंद राय अपने लोगों के साथ एक क्रिकेट मैच के उद्घाटन से वापस आ रहे थे. इसी दौरान घात लगाए बैठे लोगों ने उनके काफिले पर हमला कर दिया. कृष्णानंद राय को दिन दहाड़े मौत की नींद सुला दिया गया था. इससे पहले वर्ष 1991 में वाराणसी के चेतगंज इलाके में अवधेश राय हत्याकांड हुआ था जिसका इल्जाम भी मुख्तार पर ही है. अवधेश राय के छोटे भाई अजय राय वाराणसी से पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता हैं. जुलाई 2019 में सीबीआइ कोर्ट ने मुख्तार अंसारी को कृष्णानंद राय हत्याकांड से बरी कर दिया जबकि अवधेश राय हत्याकांड का प्रकरण प्रयागराज की एमपी-एमएलए अदालत में लंबित है. पूर्वांचल के एक विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. रामेश राय बताते हैं, “पूर्वांचल में भूमिहार नेताओं की हत्या कराने में मुख्तार अंसारी की भूमिका को लेकर भूमिहार समाज बेहद आक्रोशि‍त है. यह महज एक संयोग ही नहीं था कि जब अरविंद कुमार शर्मा की यूपी की राजनीति में एंट्री हो रही थी उसी दौरान योगी आदित्यनाथ सरकार पंजाब के रोपड़ जेल में बंद मुख्तार अंसारी को यूपी लाने में पूरी ताकत झोंक रही थी.” कृष्णानंद राय की पत्नी और मोहम्मदाबाद सीट से भाजपा विधायक अल्का राय ने मुख्तार अंसारी को यूपी लाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जिस तरह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताया इसने भी भूमिहार राजनीति में बन रहे नए समीकरण की ओर इशारा भी किया.

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ में इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुशील पांडेय यूपी की जातीय संरचना पर शोध कर चुके हैं. सुशील पांडेय बताते हैं, “पूर्व में ऐसे ब्राह्मण जो बड़े जमींदार रहे इन्हें भूमिहार कहा गया है. यह काफी शिक्षि‍त जाति है. पूर्वांचल और बि‍हार में इन्हें भूमिहार ब्राह्मण भी कहा जाता है. इनकी संख्या भले ही कम हो लेकिन जातिगत रूप से इनमें जो एकता है वही इन्हें राजनीतिक रूप से मजबूत बनाती है.” सुनील पांडेय के मुताबिक पूर्वांचल में गाजीपुर भूमिहारों का एक बड़ा केंद्र है. इसके साथ घोसी, मऊ, देवरिया से लेकर गोरखपुर तक भूमिहार अच्छी तादाद में मौजूद हैं. यह जातियां अपने नाम के साथ सिंह, राय, सिन्हा के अलावा ब्राह्मणों के सरनेम जैसे शर्मा, तिवारी का उपयोग करती हैं. वहीं पश्चिम में त्यागी एक महत्वपूर्ण भूमिहार जाति है. इसी जाति से आने वाले अश्वनी त्यागी को भाजपा ने विधान परिषद का सदस्य बनाने के साथ संगठन में ब्रज क्षेत्र के प्रभारी के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका दी है. एक अनुमान के मुताबिक यूपी में भूमिहारों की संख्या यूपी की कुल जनसंख्या का करीब एक प्रतिशत ही है लेकिन प्रबल जातिगत एकता के चलते कोई भी राजनीतिक दल भूमिहारों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है.

यूपी में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा या फिर बसपा व सपा की, भूमिहार नेताओं को तवज्जो हमेशा मिली है. राजनरायण, गौरी शंकर राय, झारखंडे राय, गेंदा बाबू, त्रिवेणी राय, कृष्णानंद राय, रासबिहारी, विश्वनाथ राय, पंचानन राय, कल्पनाथ राय, कुंवर रेवती रमण सिंह ने राजनीति में भूमिहार जाति का प्रतिनिधि‍त्व पूरी ताकत के साथ किया. अगर घोसी, मऊ, देवरिया और गाजीपुर के पुराने चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो घोसी के झारखंडे राय लंबे समय तक निर्वाचित होते रहे. इसके बाद जनता दल से चुनाव जीतने वाले राजकुमार राय भी भूमिहार ही थे. कल्पनाथ राय और घोसी तो एक-दूसरे की पहचान बन गए थे. भाजपा की कल्याण सिंह सरकार में सूर्यप्रताप शाही भूमिहार कोटे से फिट हुए तो बसपा सरकार में पूर्वांचल के भूमिहार नेता जगदीश राय को ऊंची कुर्सी मिली थी. वर्ष 2012 में सत्ता में आई अखिलेश सरकार में वाराणसी के मनोज राय से लेकर नारद राय और गोरखपुर के पीके राय तक को लालबत्ती से नवाजा गया. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भूमिहार समाज में कमल की पैठ बनाकर पूर्वांचल में भाजपा के झंडे तले भूमिहारों को एकजुट करने वाले मनोज सिन्हा को केंद्र सरकार में दो मंत्रालय मिल गए. वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद सिन्हा को जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भाजपा सरकार ने भूमिहार जाति को यूपी के वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव तक थामे रखने की भरसक कोशि‍श की है.

यूपी में भूमिहार किसी एक राजनीतिक दल के साथ लगातार नहीं जुड़े रहे. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भूमिहारों ने समाजवादी पार्टी को अपना समर्थन दिया तो पांच साल बाद यह साइकिल से छिटक कर भाजपा के खेमे में आ खड़े हुए. अब वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में यह किस करवट बैठेंगे वह तो नतीजे ही बताएंगे लेकिन सभी पार्टिंयां इन प्रभावशाली वोट बैंक को अपने कब्जे में करने के लिए सारे दांव आजमाएंगी.

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