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शख्स‍ियत: बेसहारा तीमारदारों के 'फूडमैन' विशाल

अपने मरीजों का इलाज करा रहे तीमारदारों को विशाल सिंह 'प्रसादम सेवा' के तहत मुफ्त भोजन मुहैया कराते हैं. इससे लखनऊ में रोजाना 1,000 तीमारदारों को मिल रहा भोजन.

प्रसादम सेवा में तीमारदारों के भोजन की व्यवस्था करते विशाल प्रसादम सेवा में तीमारदारों के भोजन की व्यवस्था करते विशाल
स्टोरी हाइलाइट्स
  • फूड फेडरेशन ऑफ इंडिया ने अपनी मुहिम 'सेव फूड, शेयर फूड, जॉय फूड' के लिए विशाल को साथ में जोड़ा है
  • लॉकडाउन में विशाल ने 7.5 लाख से अधि‍क भोजन के पैकेट जरूरतमंदों के बीच बांटे
  • राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विशाल को 6 नवंबर को राजभवन में सम्मानित किया है

दोपहर के करीब 12 बजे लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में न्यूरोलाजी विभाग के ठीक सामने एक हॉल के सामने गरीब तीमारदार जुटने लगते हैं. कुछ ही देर में हॉल में मौजूद लोग इन तीमारदारों की खातिरदारी करते हैं. इसके हाथ पैर धुलवाते हैं. तीमारदारों को हॉल के भीतर पंगत में बिठाया जाता है. इनके सामने एक छोटी मेज पर स्टील की थाली कटोरी में गरमागरम भोजन परोसा जाता है. यह 'प्रसादम सेवा' है जिसके जरिए अस्पताल आने वाले गरीब तीमारदारों के दोनों समय मुफ्त भोजन का प्रबंध किया जा रहा है. केवल केजीएमयू ही नहीं लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल और लोहिया इंस्टीट्यूट के कुल 1,000 गरीब तीमारदार 'प्रसादम सेवा' का लाभ रहे हैं. पिछले 12 वर्षों से अधि‍क समय से इस अनोखी सेवा का संचालन करने वाले 40 वर्षीय विशाल सिंह को अब लखनऊ के लोग 'फूडमैन' के नाम से पुकारने लगे हैं.

विशाल मूल रूप से फि‍रोजाबाद के शि‍कोहाबाद इलाके के रहने वाले हैं. इनके पिता सिंचाई विभाग में कार्यरत थे इसलिए विशाल की शुरुआती शि‍क्षा रुड़की में हुई. रुड़की में रहकर ग्रेजुएशन करने के बाद विशाल काम-धंधे की तलाश में लखनऊ आ गए. इस समय तक इनके पिता भी सरकारी सेवा से रिटायर हो गए थे और वे गुड़गांव में अपने बड़े बेटे के साथ रहने लगे. वर्ष 2003 में विशाल के पिता सांस की गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गए. गुड़गांव के एक निजी अस्पताल के आइसीयू में इनके पिताजी लंबे समय तक एडमिट रहे. विशाल एक बेहद साधारण परिवार से थे. पिता की बीमारी में काफी पैसा खर्च होने पर इनके परिवार की माली हालत काफी खराब हो गई. लंबे समय तक अस्पताल में रहने के दौरान विशाल ने तीमारदारों के दर्द को महसूस किया. इनके पास जो पैसे थे वो पिता की बीमारी में खर्च हो रहे थे. जो बच रहे थे वो आगे जरूरत पड़ने की आस में खर्च नहीं किए जा रहे थे. इसी दौरान ऐसा समय भी आया जब विशाल और उनके परिवारीजनो को भूखे पेट रह कर अस्पताल में भर्ती पिता की तीमारदारी करनी पड़ी. अस्पताल के बाहर सड़क के किनारे सोना पड़ा. कई बार लोगों से मांग कर अपने और परिवार के लिए भोजन का इंतजाम करना पड़ा. अस्पताल में कठिन समय गुजारने के दौरान विशाल ने संकल्प किया कि जब कभी समर्थ हुए तो वे अस्पताल में मरीजों के साथ रहने वाले गरीब तीमारदारों को मुफ्त में भोजन देने का काम करेंगे.

वर्ष 2003 में पिता की मौत के बाद विशाल लखनऊ आ गए. इनके पास भीषण अर्थ‍िक तंगी थी. हजरतगंज के पार्षद नागेंद्र सिंह चौहान की निगरानी में शनिमंदिर के सामने लगने वाले साइकिल स्टैंड में विशाल टोकन लगाने का काम करने लगे. विशाल तीमारदारों के लिए किए गए संकल्प को पूरा करने में ध्यान लगाए हुए थे लेकिन इनकी माली हालत इतनी भी नहीं थी कि वे अपने लिए दो समय के भोजन का इंतजाम कर सकें. साइकिल स्टैंड पर कुछ समय तक काम करने के बाद विशाल ने चाय की दुकान खोल ली. यहां से कुछ पैसे बचाकर 'इलेक्ट्रोड अर्थ‍िंग' का काम शुरू किया. यहां से इनकी आमदनी बढ़ी. विशाल की आर्थ‍िक स्थ‍िति में सुधार होना शुरू हुआ. इस व्यवसाय से कुछ पैसे बचाया तो कम आमदनी वालों के लिए छोटे-छोटे मकान बनाने के रियल एस्टेट व्यवसाय में भी हाथ आजमाया. यह व्यवसाय खूब फूला-फला और अब विशाल की संपन्नता का दौर शुरू हुआ. इसी समय वर्ष 2007 में अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर घर में खाना बनाकर लखनऊ की किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में तीमारदारों के बीच बांटने लगे. इस काम को एक संस्थागत रूप देने के लिए वर्ष 2009 में विशाल ने अपने पिता के नाम पर 'विजयश्री फाउंडेशन' संस्था की शुरुआत की. इसके बाद घर में ही भोजन बनवाकर केजीएमयू में अपने मरीज का इलाज करा रहे गरीब तीमारदारों को वे सुबह और शाम को बांटने लगे.

तीमारदारों के बीच विशाल की सेवा देखकर वर्ष 2015 में केजीएमयू के तत्कालीन कुलपति प्रो. रविकांत ने इन्हें न्यूरोलाजी विभाग के सामने मौजूद हॉल आवंटित कर दिया. अब विशाल ने इस हॉल में तीमारदारों को बिठाकर भोजन कराना शुरू किया और इस व्यवस्था को 'श्री विजयश्री फाउंडेशन प्रसादम सेवा' नाम दिया. अब हॉल में तीमारदारों को पंगत में बिठाकर स्टील की थाली में भोजन कराना शुरू किया. जरूरतमंद तीमारदारों की मदद के लिए टोकन व्यवस्था लागू की गई. इसके तहत केजीएमयू के वार्ड में तैनात डॉक्टरों को टोकन दिया गया. डॉक्टर अस्पताल में भर्ती गरीब मरीजों के जरूरतमंद तीमारदारों को ये टोकन देते थे. यह टोकन दिखाकर तीमारदार केजीएमयू की प्रसादम सेवा में मुफ्त में भोजन ग्रहण करने लगे. शुरुआत 80 टोकन से हुई और एक वर्ष के भीतर यह 300 टोकन तक पहुंच गई. प्रसादम सेवा के तहत भोजन ग्रहण करने आने वाले तीमारदारों को यहां तैनात कर्मचारी हाथ पैर धुलाते हैं. इसके बाद इन्हें हॉल में भोजन कराया जाता है. विशाल ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भोजन का मानक तय किया है. तीमारदारों के लिए सुबह और शाम दोनों समय के भोजन में दाल, चावल, रोटी, सब्जी, पापड़, अचार या चटनी, सलाद और मीठा को शामिल किया गया. भोजन के दौरान हॉल में भजन बजते रहते हैं.

प्रसादम सेवा में ज्यादा समय देने के कारण विशाल का व्यवसाय उपेक्षि‍त हो गया. व्यवसाय में इन्हें घाटा होने लगा. यह बीमार पड़ गए. केजीएमयू में ही इनका इलाज चला. ठीक होने के बाद विशाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रसादम सेवा के लिए संसाधन का इंतजाम करने की थी. विशाल ने अपने संपर्क के लोगों से अपील की कि वे अपने या अपने बच्चों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह जैसे आयोजन प्रसादम सेवा के साथ तीमारदारों के बीच मनाएं. इसके बाद लोग आगे आना शुरू हुए. विशाल लोगों से पैसा नहीं बल्कि‍ राशन की मांग की. लोग खुद अपने हाथों से तीमारदारों को भोजन कराने लगे. इसका एक अच्छा संदेश गया और बड़ी संख्या में लोग विशाल से जुड़ने लगे. आज करीब 3,000 लोग प्रसादम सेवा से जुड़कर तीमारदारों के भोजन की चिंता कर रहे हैं. केजीएमयू के बाद वर्ष 2017 में लखनऊ के ही बलरामपुर अस्पताल में प्रसादम सेवा शुरू की गई. इसके बाद गोमतीनगर के राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइसेंज में भी प्रसादम सेवा की शुरुआत कर तीमारदारों को मुफ्त भोजन देना शुरू किया गया. कम खर्च में गुणवत्तापरक भोजन मुहैया कराने के लिए अब प्रसादम सेवा के तहत बनने वाला भोजन लोहिया इंस्टीट्यूट में विशाल द्वारा स्थापित किए गए आधुनिक किचन में तैयार किया जाता है और यहां से अस्पतालों में तीमारदारों के लिए भेजा जाता है.

आज लखनऊ में रोज 1,000 तीमारदारों को प्रसादम सेवा के जरिए नि:शुल्क भोजन मुहैया कराया जा रहा है. केंद्र सरकार की संस्था फूड फेडरेशन ऑफ इंडिया ने अपनी मुहिम 'सेव फूड, शेयर फूड, जॉय फूड' के लिए विशाल को साथ में जोड़ा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कोरोना संक्रमण के दौरान हुए लॉकडाउन में विशाल ने 7.5 लाख से अधि‍क भोजन के पैकेट जरूरतमंदों और प्रवासी मजदूरों के बीच बांटे थे. इसके लिए यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विशाल को 6 नवंबर को राजभवन में सम्मानित किया है. अब विशाल लखनऊ के सुल्तानपुर रोड पर बेसहारा बुजुर्गों और अनाथ बच्चों के लिए 'दादा दादी आश्रम' खोलने की तैयारियों में जुटे हुए हैं. 

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