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यूपी के किसानों को नहीं पसंद आती एमएसपी

उत्तर प्रदेश में केवल कुछ ही किसान अपनी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के माध्यम से सरकारी एजेंसियों को बेचते हैं.

प्रतीकात्मक फोटो (रॉयटर्स) प्रतीकात्मक फोटो (रॉयटर्स)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • एमएसपी प्रणाली को किसानों की हितों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है
  • यूपी में हर वर्ष गेहूं की कुल पैदावार का दस फीसद से कम हिस्सा ही सरकारी एजेंसियां एमएसपी के जरिए खरीद पाती हैं
  • एमएसपी के तहत केवल कुछ ही फसलें यूपी में सरकार को बेची जाती हैं

उत्तर प्रदेश में केवल कुछ ही किसान अपनी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के माध्यम से सरकारी एजेंसियों को बेचते हैं. वहीं, बाकी लोग खुले बाजार में व्यापार करना पसंद करते हैं या निजी एजेंटों के साथ सौदा करते हैं, कभी-कभी विभिन्न कारणों से एमएसपी के नीचे भी जाकर सौदा करते हैं. अगर गेहूं की खरीद के सरकारी आंकड़ों को देखें तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती है. यूपी में हर वर्ष गेहूं की कुल पैदावार का दस फीसद से कम हिस्सा ही सरकारी एजेंसियां एमएसपी के जरिए खरीद पाती हैं.

कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर, केंद्र सरकार बुवाई के मौसम से पहले लगभग दो दर्जन फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है. एमएसपी के पीछे विचार यह है कि किसानों को एक गारंटीकृत मूल्य और सुनिश्चित बाजार दिया जाए और उन्हें मूल्य में उतार-चढ़ाव और बाजार की खामियों से बचाया जाए. हालांकि, एमएसपी प्रणाली को किसानों की हितों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है. यह किसानों को उनकी उपज का एक वाजिब दाम दिलाने में मदद करता है. अध्ययन से पता चलता है कि एमएसपी के तहत केवल कुछ ही फ़सलें यूपी में सरकार को बेची जाती हैं. इनमें गेहूं और धान दो प्रमुख फ़सल हैं. केंद्रीय नीति आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर देशव्यापी अध्ययन में निष्कर्ष निकाला है, “यह देखा गया है कि उत्तर प्रदेश में 28 प्रतिशत किसानों ने अपना अनाज एमएसपी के तहत बेचा, 63 प्रतिशत ने खुले बाजार में अपना अनाज बेचा और शेष 8 प्रतिशत अपने स्वयं के उपभोग के लिए रखा. अध्ययन के दौरान यह भी देखा गया है कि 82 प्रतिशत किसानों ने अपने खाद्यान्नों व फसलों को एमएसपी पर बेचने में विभिन्न चुनौतियों का सामना करने की सूचना दी है." नीति आयोग का यह नमूना अध्ययन 2016 में 2007-08 और 2010-11 के बीच संदर्भ अवधि के साथ प्रकाशित हुआ था, जिसमें 14 राज्यों के 36 जिलों (यूपी में छह) के किसानों को शामिल किया गया था.

लखनऊ के गिरि इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंटल स्टडीज ने भी यूपी के योजना विभाग से मिलकर वर्ष 2010 में एक सर्वे किया था. इसके मुताबिक, किसानों ने अपनी उपज का आधा से अधिक हिस्सा व्यापारियों को, 28.3 प्रतिशत थोक विक्रेताओं को, 25.8 प्रतिशत गांव के व्यापारियों को और केवल 14 प्रतिशत सरकारी एजेंसियों को बेच रहे थे. ये आंकड़े बताते हैं कि यूपी के कृषि‍ विपणन बाजार में सरकारी एजेंसियों की खरीद काफी कम थी. परिणामस्वरूप किसानों की उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता है. प्रगतिशील किसान रामेश्वर वर्मा बताते हैं, “सरकारी एजेंसियां किसान की उपज खरीद कर तुरंत उसका नकद भुगतान नहीं करती हैं. नकद भुगतान की लालच में किसान दूसरे लोगों को अपनी उपज कम कीमत में भी बेच देता है.” नीति आयोग के अध्ययन में यह भी पाया गया कि एमएसपी में तत्काल नकदी की अनुपलब्धता के कारण, छोटे और सीमांत किसानों ने उन व्यापारियों को बेचना पसंद किया, जो “स्पॉट पेमेंट” पर बने थे. रिपोर्ट के मुताबिक, “यह भी पाया गया कि कभी-कभी, छोटे और सीमांत किसानों ने धन की तत्काल आवश्यकता या बुवाई के मौसम से पहले लिए गए ऋण को चुकाने के लिए खुले बाजार का सहारा लिया. कुछ लोगों ने यह भी कहा कि एमएसपी बहुत कम था क्योंकि यह खेती की बढ़ती लागत को कवर नहीं करता था.”

पूर्व अतिरिक्त निदेशक (खाद्य और नागरिक आपूर्ति) ए.के. सिंह के अनुसार, कभी-कभी किसान अपने अनाज को खुले बाजार में भी बेचना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें एमएसपी से ऊपर की कीमत मिलती है. वह कहते हैं, "इस मायने में, एमएसपी एक उपयोगी प्रणाली है जो कभी-कभी निजी एजेंसियों को किसानों को बेहतर कीमत देने के लिए मजबूर करती है," गिरी इंस्टीट्यूटर ने भी अपने अध्ययन में पाया था कि किसानों को अपनी उपज को सरकारी एजेंसियों के बाजार में बेचने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा था. लगभग तीन-चौथाई किसानों ने अनुचित कटौती की शिकायत की थी. लखनऊ के एक किसान हरनाम सिंह वर्मा बताते हैं, “सरकारी एजेंसियां अक्सर किसान की उपज को घटिया बताकर कम कीमत पेश करती हैं. फसल बेचने निकला किसान के पास एजेंसियों के चंगुल में फंसने के अलावा कोई और चारा नहीं होता है.”

गिरी इंस्टीट्यूट के सर्वेक्षण में शामिल दो-तिहाई से अधिक किसानों ने बाजार से लंबी दूरी और परिवहन सुविधाओं की कमी के बारे में शिकायत की थी. देर से भुगतान और झूठी तौल, किसानों द्वारा सामना की जाने वाली अन्य सामान्य समस्याएं थीं. लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रमेश श्रीवास्तव बताते हैं, “एमएसपी एक महत्वपूर्ण तंत्र है जिसने किसानों को बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव से बचाए रखा है और सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पूल के लिए गेहूं और धान खरीदने के लिए प्रेरित किया.” यूपी में किसानों को एमएसएपी प्रणाली के साथ यह भी आशंका सता रही है कि सरकार आने वाले दिनों में पीडीएस प्रणाली को समाप्त कर सकती है. असल में किसानों को सबसे ज्यादा चिंता एमएसपी को लेकर है. इसीलिए वे हाल ही में संसद द्वारा पारित तीन कृषि सुधार बिलों का विरोध कर रहे हैं. किसानों को डर है कि नए कानूनों के लागू होने के बाद, केंद्र एमएसपी के जरिए किसानों को मिलने वाली सुरक्षा को हटा सकता है.

भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष राजवीर सिंह जादौन कहते हैं, “हम एमएसपी पर सरकार की मौखि‍क प्रतिबद्धता पर भरोसा नहीं कर सकते. सरकार अगर गंभीर है तो उसे कानून में खुद ही यह व्यवस्था करनी चाहिए कि एमएसपी जारी रहेगा.”  

यूपी में गेहूं खरीद का ब्योरा

वर्ष                       गेहूं की पैदावार                गेहूं की सरकारी खरीद (एमएसपी पर)

2013-14                  314.45                        6.86

2014-15                  314.45                         6.28

2015-16                   325                            22.67

2016-17                   347                            7.97

2017-18                   346                             36.99

2018-19                    350                             52.92

2019-20                    381                             37.04

नोट: सभी आंकड़े लाख मीट्रिक टन में हैं. स्रोत: यूपी खाद्य विभाग

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