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यूपी में आया मौसम दलबदलुओं का

वर्ष 2022 के विधानासभा चुनाव से पहले एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी ज्वाइन करने वाले नेताओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. बसपा से नाराज चल रहे नेताओं की पहली पसंद समाजवादी पार्टी बनी है.

समाजवादी पार्टी ज्वाइन करने के दौरान अख‍िलेश यादव के साथ आर.के. चौधरी समाजवादी पार्टी ज्वाइन करने के दौरान अख‍िलेश यादव के साथ आर.के. चौधरी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • लोकसभा चुनाव से पहले सपा छोड़ कांग्रेस ज्वाइन करने वाले आर.के. चौधरी और बाल कुमार पटेल ने घर वापसी की है
  • मेरठ की मेयर सुनीता वर्मा भी बसपा छोड़ सपा का दामन थाम चुकी है
  • विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही और तेज होगा दलबदल

बसपा के संस्थापक सदस्य आर.के. चौधरी 19 फरवरी को लखनऊ के 19 विक्रमादित्य मार्ग पर मौजूद समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रदेश कार्यालय में राष्ट्रीय अध्यक्ष अखि‍लेश यादव की मौजूदगी में एक बार फि‍र साइकिल पर सवार हुए. इससे पहले 22 दिसंबर 2017 को चौधरी सपा में यह उम्मीद लेकर शामिल हुए थे कि वह वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में दलितों की पासी उपजाति के बीच पार्टी का बड़ा चेहरा बनेंगे. सपा में शामिल होने के बाद चौधरी न केवल पासी समाज के बीच साइकिल को लोकप्र‍िय करने के लिए बैठकों की श्रृंखला शुरू की बल्क‍ि लखनऊ के मोहनलालगंज (सुरक्ष‍ि‍त) लोकसभा सीट से चुनाव की भी तैयारी करने लगे. लोकसभा चुनाव के पहले सपा और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने वर्षों से चली आ रही राजनीतिक दुश्मनी को भुलाकर चुनावी गठबंधन का ऐलान कर दिया. मोहनलालगंज (सुरक्षि‍त) सीट बसपा के खाते में गई और पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती यहां से बी.एल. वर्मा को उम्मीदवार बना दिया. चौधरी की सपा के टिकट पर मोहनलालगंज से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी धरी रह गई. मौका देखते ही चौधरी 6 अप्रैल, 2019 को कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस ने मोहनलालगंज सीट पर अपने पूर्व घोषि‍त उम्मीदवार रामशंकर भार्गव का टिकट काटकर आर.के. चौधरी को थमा दिया. चौध्ररी महज 4.73 प्रतिशत वोट पाकर अपनी जमानत जब्त करा बैठे. लोकसभा चुनाव के बाद सपा और बसपा के बीच जैसे ही दरारें पड़ीं आर.के. चौधरी एक बार फि‍र साइकिल की सवारी में अपना भविष्य तलाशने लगे. अंतत: अखि‍लेश यादव की हरी झंडी मिलते ही चौधरी सपा में शामिल हो गए. सपा के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, “आर.के. चौधरी दलित समाज के बड़े नेता हैं. सपा हमेशा से दलितों का सम्मान करती आई है. चौधरी के आने से सपा को वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मजबूती मिलेगी.”

बुंदेलखंड में कुर्मी बिरादरी के प्रभावी नेता और पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल भी 20 महीने कांग्रेस में बिताने के बाद पिछले वर्ष 8 नवंबर, 2020 को एक बार फि‍र सपा में शामिल हो गए. बाल कुमार पटेल अखि‍ल भारतीय कुर्मी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. वर्ष 2014 को बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट सपा के टिकट पर चुनाव लड़ कर हार गए थे. हारने के बाद भी बाल कुमार बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट पर जनता के बीच जाकर अपनी पकड़ मजबूत करते रहे. इस आस में कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी सपा उन्हें ही बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट से उम्मीदवार बनाएगी और वे यह सीट जीत कर अपनी पिछली हार का बदला ले लेंगे. जैसे ही वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव नजदीक आया, इलाहाबाद के तत्कालीन भाजपा सांसद और बड़े उद्योगपति श्यामाचरण गुप्त सपा में शामिल हो गए. सपा ने श्यामाचरण गुप्ता को बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट से पार्टी का उम्मीदवार बना दिया. यह बाल कुमार के लिए झटके से कम नहीं था. बिना देर किए बाल कुमार कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस ने इन्हें बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया लेकिन बाल कुमार चुनाव न जीत सके. अब कांग्रेस में गुमनामी के 20 महीने गुजारने के बाद बाल कुमार दोबारा सपा में शामिल हो गए हैं.

जैसे-जैसे वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है एक पार्टी छोड़ दूसरी ज्वाइन करने वाले नेताओं की संख्चा में इजाफा होता जा रहा है. लखनऊ में जय नरायण डिग्री कालेज में एसोसिएट प्रोफेसर बृजेश मिश्र बताते हैं, “यूपी में हमेशा से लोकसभा और विधानसभा चुनाव के पहले बड़े पैमाने पर नेता अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्ष‍ि‍त करने की आस लेकर एक पार्टी से दूसरी पार्टी की शरण में जाते हैं. बड़ी संख्या में ऐसे नेता दलबदल करते हैं जिनका चुनाव में टिकट किन्हीं कारणों से कट जाता है. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के पहले भी बड़े पैमाने पर दलबदल देखने को मिलेगा, जिसकी शुरुआत हो चुकी है.” बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से नाराज नेताओं की पहली पसंद साइकिल बनी है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने वाली बसपा और सपा की राहें चुनाव के बाद अलग हो गई थीं लेकिन इनके बीच तल्खी तब चरम पर पहुंची जब पिछले वर्ष 28 अक्तूबर को राज्य सभा चुनाव के दौरान भाजपा से करीबी दिखाने वाली बसपा के विधायकों ने अपनी पार्टी से बगावत कर दी. बसपा विधायक चौधरी असलम अली, असलम राइनी, मुज्तबा सिद्दीकी और हाकिम लाल बिंद ने राज्य सभा चुनाव के चुनाव अधि‍कारी को बसपा प्रत्याशी के नामांकन में अपने हस्ताक्षर को फर्जी बताया और नाम वापस लेने की अर्जी दी. इन विधायकों ने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखि‍लेश यादव से भी मुलाकात की थी. इससे गुस्साई बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सपा को हराने के लिए भाजपा का सहयोग करने की घोषणा कर दी थी.

16 जनवरी को बसपा से निष्कासित पूर्व विधायक योगेश वर्मा अपनी पत्नी सुनीता वर्मा जो कि मेरठ की महापौर हैं, के साथ सपा में शामिल हो गए. मेरठ विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रमेश चौधरी बताते हैं, “पश्च‍िमी यूपी की दलित राजनीति में पकड़ रखने वाले योगेश वर्मा के सपा में आने से पंचायत चुनाव में साइकिल मजबूत होगी. योगेश अपनी पत्नी सुनीता वर्मा को मेरठ का मेयर निर्वाचित कराकर अपनी राजनीतिक क्षमता जाहिर कर चुके हैं.” बरेली से बसपा के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह, मिर्जापुर से पूर्व विधायक श्रीराम भारती, राठ के पूर्व विधायक अनिल अहिरवार, बसपा सरकार में मंत्री रहे तिलक चंद अहिरवार, पूर्व विधान परिषद सदस्य महेश आर्या, पूर्व मंत्री राजेंद्र कुमार, पूर्व विधायक बब्बू खान, मुजफ्फरनगर से पूर्व विधायक अनिल जाटव, पूर्व सांसद दाउद अहमद, अलीगढ़ से कोल विधायक जमीरउल्लाह हाथी का साथ छोड़ साइकिल की सवारी शुरू कर चुके हैं. जमीरउल्लाह कहते हैं, “यूपी में सपा की एकमात्र पार्टी है जो अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देगी. बसपा ने भाजपा से अंदरूनी गठबंधन कर जनता के साथ छल किया है.” बड़ी संख्या में दूसरी पार्टियों के नेताओं के सपा में आने से वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले टिकट की होड़ और गुटबाजी शुरू होने की आशंका जताई जा रही है. नरेश उत्तम बताते हैं, “प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर मैंने स्वयं सपा ज्वाइन करने वाले हर नेता से बात की है. सभी नेताओं की कोई विधानसभा चुनाव में टिकट जैसी कोई शर्त नहीं है.”

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