scorecardresearch
 

विष्णुचंद्र गुप्ता ने पिरोया था “सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे"

“सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे,” कारसेवकों के बीच एक नारा बन गया था. इस कविता की रचना शाहजहांपुर में जलालाबाद के रहने वाले विष्णुचंद्र गुप्ता ने की थी.

दिवंगत विष्णुचंद्र गुप्ता (फोटोः आशीष मिश्र) दिवंगत विष्णुचंद्र गुप्ता (फोटोः आशीष मिश्र)

“कोटि कोटि हिंदू जन का हम ज्वार उठाकर मानेंगे।

सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे।।

जय घोष हो रहा उसे सुने, कण कण में ज्वाला भर दी है।

राम लला के चरणों पर मुंडों की माला भर दी है।।

नर नारी बालक संत सभी, मिलकर अवधपुरी को जाएंगे।

फि‍र भी अधि‍कार न मिल पाया, हम उसे छीनकर मानेंगे।“

अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन के दौरान शायद ही कोई ऐसा रहा होगा जिसने मंदिर निर्माण के पक्ष में इस कविता के कुछ लाइनें न गायी हों. “सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे,” कारसेवकों के बीच एक नारा बन गया था जिसका उद्घोष करने चेतना की लहर दौड़ जाती थी. शायद ही आपको मालूम हो कि इस कविता की रचना शाहजहांपुर में जलालाबाद के रहने वाले विष्णुचंद्र गुप्ता ने की थी. करीब पांच साल पहले विष्णुचंद्र गुप्ता ‘विजीगीशु’ इस दुनिया से विदा लेकर चले गए. पांच अगस्त को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन करेंगे तो विष्णुचंद्र की लिखी कविता “सौगंध राम की खाते हैं” के जरिए देखा गया स्वप्न हकीकत में उतरेगा.

सौगंध राम की खाते हैं कविताशाहजहांपुर में जलालाबाद के आजादनगर में रहने वाले विष्णुचंद्र गुप्ता अपने शुरुआती जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के स्वयं सेवक रहे थे. गुप्ता ने अपने परिवार के जीवन व्यापन के लिए जलालाबाद के सदर इलाके में कॉपी-किताब की दुकान खोली थी. गुप्ता पुस्तक भंडार के नाम से खोली गई यह दुकान अब विष्णुचंद्र के बेटे विवेक गुप्ता संभालते हैं. शाहजहांपुर ही नहीं पूरे रुहेलखंड इलाके में संघ का प्रचार प्रसार करने में विष्णुचंद्र ने महती भूमिका अदा की थी. पहली जनवरी, 1934 को जन्मे विष्णुगुप्ता ने सबसे पहले 14 वर्ष की उम्र में जलालाबाद में चार-पांच लोगों को लेकर संघ की शाखा लगानी शुरू की. यह संस्कार भारती के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे. इन्होंने जलालाबाद में सरस्वती शि‍शु मंदिर की स्थापना कर गरीब बच्चों को शि‍क्षा दिलानी शुरू की.

विष्णुचद्र गुप्ता बचपन से कविताएं लिखते थे. इनके एक मित्र आचार्य राम मोहन मिश्र बताते हैं, “ दो दिसंबर, 1992 को अयोध्या आंदोलन के समय हम कई लोग विष्णुचंद्र गुप्ता के साथ जलालाबाद कस्बे में एक जगह पर गोष्ठी कर रहे थे. तभी शाम के वक्त एसडीएम आए और उन्होंने बताया कि अयोध्या में हालात काफी खराब हैं. ऐसे में गोष्ठी आदि करना ठीक नहीं होगा.” एसडीएम के सामने ही विष्णुचंद्र गुप्ता के मुंह से अनायास निकल पड़ा “सौगंध राम की खाते हैं.......मंदिर वहीं बनाएंगे.” इसके बाद सभी लोग अपने घरों को चले गए. रात में विष्णुचंद्र गुप्ता ने इस कविता को पूरा किया और उसे अपनी डायरी में लिखकर सहेजा. इसके बाद विष्णुचंद्र गुप्ता ने संघ के कार्यक्रमों में अपनी इस कविता का पाठ करना शुरू किया जिसे लोगों ने काफी पसंद किया.

सौगंध राम की खाते हैं कवितादेखते ही देखते संघ के शीर्ष नेतृत्व तक यह कविता पहुंच गई. संघ ने मंदिर आंदोलन को धार देना शुरू किया तो विष्णुचंद्र की इसी कविता की लाइनें एक उद्घोष बन कर गूंजने लगीं. आचार्य राम मोहन मिश्र बताते हैं, “विष्णु चंद्र गुप्ता के अंदर साहित्य सृजन की अजब शक्ति थी. वह भले ही शैक्षि‍क रूप से मजबूत नहीं थे लेकिन उनका साहित्यि‍क ज्ञान कमाल का था. उनके शब्द जोश भरने वाले थे.” बाद में विष्णुचंद्र गुप्ता की रचनाओं का संकलन 'सौगंध' नाम से प्रकाशि‍त हुआ. मातृवंदना, देशगान, आह्वान विष्णुचंद्र गुप्ता की लिखी अन्य रचनाएं थीं. इन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग का साहित्यरत्न पुरस्कार भी मिला. विष्णु गुप्ता ने अपनी रचना “सौगंध राम की खाते हैं” में शासन सत्ता को भगवान राम के आदर्श पर चलते हुए अनीति, कुशासन से दूर रहने का संदेश भी दिया है जो हमेशा प्रासंगिक रहेगा.

“राम ! राम राज्य के निर्माता, दीनों के भाग्य विधाता हैं।

राम ! अनीति के लिए वज्र, राक्षस दल के संघाता हैं।।

राम ! समता की प्रखर दृष्टि‍ ऋषि‍यों मुनियों के त्राता हैं।

राम ! अपृश्यता के नाशक , शबरी केवट के भ्राता हैं।।“

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें