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मां ने जन्म देते ही पटरी पर फेंका, कट गए पैर, आठ साल बाद डेनमार्क से आई ममता

प्रयागराज के खुल्दाबाद स्थ‍ित राजकीय शिशु गृह में रहने वाले दिव्यांग बच्चे को डेनमार्क के डॉक्टर दंपति ने गोद लिया. इस बच्चे को जन्म लेते ही मां ने पटरियों पर फेंक दिया था. ऊपर से ट्रेन गुजरने से पैर कट गए थे.

डेनमार्क से आई महिला की गोद में मुन्नू डेनमार्क से आई महिला की गोद में मुन्नू
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सरोजनी नाएडू बाल चिकित्सालय के डॉक्टरों के अथक प्रयास से बच्चे की जान बची थी
  • डेनमार्क के डॉक्टर दंपति ने ऑथराइज्ड फॉरेन एडाप्शन एजेंसी (आफा) में आवेदन कर रखा था
  • “सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी” (कारा) की आधि‍कारिक वेबसाइट के जरिए भी दंपति ने भारत में भी अपनी खोज शुरू की

ये कहानी वर्ष 2013 में जन्म लेने वाले मासूम मुन्नू की है जिसने इस दुनिया में आंख खोलते ही मां की गोद नहीं मिली. जिस मां ने इसे जन्म दिया था उसी ने इस नवजात को ट्रेन की पटरियों पर मरने के लिए फेंक दिया था. मात्र छह दिन के इस नवजात के ऊपर से ट्रेन गुजर जाती है, जिसमें उसके दोनों पैर कट गए. रगड़ खाने से हाथों की उंगलियां भी बुरी तरह छिल चुकी थीं, लेकिन सांसों ने साथ नहीं छोड़ा. लहूलुहान हालत में यह बच्चा बलिया चा‍इल्ड लाइन को मिला. यहां से इसे प्रयागराज के खुल्दाबाद स्थ‍ित राजकीय शिशु गृह लाया गया. शि‍शु गृह के अधीक्षक हरीश श्रीवास्तव बताते हैं, “बच्चे को प्रयागराज के सरोजनी नायडू बाल चिकित्सालय में भर्ती कराया गया. यहां के डॉक्टरों के अथक प्रयास से बच्चे की जीवन बच पाया. सरोजनी नायडू बाल चिकित्सालय के डॉक्टरों ने बच्चे का कई बार ऑपरेशन किया. बच्चे के एक हाथ की अंगुलि‍यां तो कुछ ठीक हो गई लेकिन दूसरा हाथ खराब हो गया. बच्चे का जीवन तो बच गया लेकिन यह दोनों पैरों से दिव्यांग हो गया. राजकीय शि‍शु गृह खुल्दाबाद के धीरे-धीरे यह बच्चा बड़ा होने लगा. यहां उसके पढ़ाई की व्यवस्था की गई. इसे मुन्नू नाम दिया गया. जिस मुन्नू को जन्म लेते ही एक क्रूर घटना से वास्ता पड़ गया था उसके लिए नियति ने कुछ और ही सोच रखा था.

डेनमार्क में एक डॉक्टर दंपति लंबे समय से नि-संतानता का दंश झेल रहे थे. यह डॉक्टर दंपति कृत्रिम अंग बनाने के विशेषज्ञ हैं. यह गोद लेने के लिए दिव्यांग बच्चे की खोज कर रहे थे. इसके लिए इन्होंने ऑथराइज्ड फॉरेन एडाप्शन एजेंसी (आफा) में आवेदन कर रखा था. उनकी 10 वर्षों की तलाश जारी थी. इसी दौरान केंद्र सरकार की “मिनिस्ट्री आफ विमेन एंड चाल्ड डेवलेपमेंट” की “सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथारिटी” (कारा) की आधि‍कारिक वेबसाइट के जरिए भी दंपति ने भारत में भी अपनी खोज शुरू की. इनकी खोज खुल्दाबाद स्थित राजकीय शिशु गृह आकर पूरी हुई जहां इन्होंने आठ साल के हो चुके मुन्नू को गोद लेने का निर्णय लिया. यहां आकर पूरी हुई. आफा की लंबी प्रक्रिया के बाद बृहस्पतिवार, 18 फरवरी को बच्चे को डेनमार्क से आई उसकी “मां” के सुपुर्द किया गया. डेनमार्क से मुन्नू को गोद लेने महिला अपनी मां के साथ प्रयागराज आई थी. महिला के पति किन्ही कारणों से नहीं आ पाए थे. गोद लेने की प्रक्रिया के दौरान शिशु गृह का माहौल काफी भावुक रहा. सभी की आंखें नम थीं लेकिन शि‍शु गृह की व्यवस्था से जुड़े लोगों के चेहरे पर संतोष के भाव थे कि मुन्नू को अब ममता की छांव मिल सकेगी. 14 महीने में शिशु गृह के 40 बच्चों को माता-पिता मिले हैं. 2020 में शिशु गृह के कुल 35 बच्चों को गोद लिया गया था. इनमें से सात बच्चों को विदेशी दंपतियों ने गोद लिया. वहीं जनवरी में तीन तथा फरवरी में अब तक दो बच्चों को गोद लिया जा चुका है. इनमें से एक बच्ची को स्पेन के दंपति ने गोद लिया है.

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