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अकेली पड़तीं मायावती

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती द्वारा दो वरिष्ठ विधायकों लालजी वर्मा और राम अचल राजभर को पार्टी से बाहर करना यह संकेत दे रहा कि पार्टी के भीतर अंदरूनी खींचतान बढ़ती जा रही है.

बसपा प्रमुख मायावती (फोटोः पीटीआइ) बसपा प्रमुख मायावती (फोटोः पीटीआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में यूपी कुल 403 विधानसभा सीटों में से 206 सीटें जीत कर सरकार बनाने वाली बसपा वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर सिमट गई थी
  • वर्ष 2019 में आंबेडकर नगर की जलालपुर विधानसभा सीट हारने के बाद बसपा के पास कुल 18 विधायक ही रह गए थे
  • वर्ष 2019 में आंबेडकर नगर की जलालपुर विधानसभा सीट हारने के बाद अब दो विधायकों के निष्कासन से बसपा के पास विधायकों की संख्या सात बची है

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने 3 जून की दोपहर तीन बजे जिस समय दो वरिष्ठ विधायकों राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को पार्टी से निकालने का आदेश जारी किया उस वक्त ये दोनों विधायक आंबेडकरनगर जिले में अलग-अलग बैठकें करके जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव के लिए रणनीति तय कर रहे थे. मायावती ने अपने इन दोनों विधायकों पर पार्टी विरोधी गतिविधि‍यों में शामिल रहने का आरोप लगाया. आंबेडकरनगर के दो वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से बाहर निकालने के निर्णय से यह संदेश गया है कि बसपा के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.

आंबेडकरनगर जिला मायावती की राजनीति का केंद्रबिंदु रहा है. मायावती आंबेडकर नगर से लोकसभा चुनाव लड़ती रही हैं. सबसे पहले मायावती वर्ष 1989 में बिजनौर लोकसभा सीट जीत कर संसद में पहुंची थीं. उसके बाद वर्ष 1998, 1999 और वर्ष 2004 में मायावती अकबरपुर (वर्तमान में आंबेडकर नगर) सीट से चुनाव जीतकर सांसद बनीं थीं. मायावती जब यहां से चुनाव नहीं लड़ी उसके बाद भी वर्ष 2009 और 2019 में आंबेडकर नगर लोकसभा सीट से बसपा उम्मीदवार ने जीत हासिल की. इससे जाहिर होता है कि आंबेडकर नगर बसपा की राजनीति के एक बड़ा केंद्र  हैं.

आंबेडकर नगर लोकसभा सीट के अंतर्गत पांच विधानसभा सीटें आती हैं. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में इनमें से दो अकबरपुर विधानसभा सीट से राम अचल राजभर और कटेहरी विधानसभा सीट से लालजी वर्मा ने चुनाव जीता था. वर्ष 1984 में बसपा की स्थापना के समय से ये दोनों नेता पार्टी के साथ थे. आंबेडकर नगर में इन दोनों बसपा नेताओं के बीच बेहतर तालमेल था. वर्ष 2017 में बसपा ने लालजी वर्मा को विधानमंडल दल का नेता बनाया था. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती ने राम अचल राजभर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. विधानसभा चुनाव में बुरी हार बाद मायावती ने राजभर को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर बसपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया था. आंबेडकर नगर में बसपा की अंदरूनी राजनीति में वक्त खींचतान शुरू हुई जब जुलाई, 2020 में मायावती ने बसपा नेता और पूर्व सांसद घनश्याम चंद खरवार का कद बढ़ाते हुए उन्हें गोरखपुर मंडल के साथ फैजाबाद (अयोध्या) मंडल का भी मुख्य सेक्टर प्रभारी बना दिया. आंबेडकर नगर के रहने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय फैजाबाद में इतिहास विभाग के पूर्व जयकरन वर्मा बताते हैं, “पिछले तीस वर्षों में आंबेडकर नगर में राम अचल राजभर और लालजी वर्मा बसपा के दो बड़े नेता थे. मायावती ने जैसे ही धनश्याम चंद्र खरवार का पार्टी के भीतर कद बढ़ाया, आंबेडकर नगर में बसपा संगठन का संतुलन गड़बड़ा गया.” संगठन में हुए बदलाव का असर आंबेडकर नगर में अप्रैल में संपन्न हुए जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में देखा जा सकता है. आंबेडकर नगर में जिला पंचायत सदस्य की 23 सीटों पर धनश्याम चंद खरवार ने अपने करीबियों को बसपा का समर्थ‍ित उम्मीदवार घोषि‍त किया था. पंचायत चुनाव में अपने करीबियों को तवज्जो न मिलने से लालजी वर्मा और राम अचल राजभर नाराज थे. इसी कारण लालजी वर्मा की पत्नी और आंबेडकर नगर की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष शोभा वर्मा ने बसपा के समर्थ‍ित उम्मीदवार के रूप में जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था. मायावती ने इसे अनुशासनहीनता माना. नाराज मायावती ने लालजी वर्मा और रामअचल राजभर को पार्टी से निकाल दिया.

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में यूपी कुल 403 विधानसभा सीटों में से 206 सीटें जीत कर सरकार बनाने वाली बसपा वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर सिमट गई थी. पिछले चार वर्षों के दौरान अनुशासनहीनता के आरोप में बसपा से 9 विधायक निलंबित हो चुके हैं. वर्ष 2019 में आंबेडकर नगर की जलालपुर विधानसभा सीट हारने के बाद अब दो विधायकों के निष्कासन से बसपा के पास विधायकों की संख्या सात बची है.

लखनऊ में विद्यांत पीजी कालेज में अर्थशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और दलितों के आर्थिक-सामाजिक ढांचे का अध्ययन करने वाले मनीष हिंदवी बताते हैं, “बसपा के संस्थापक कांशीराम के समय से पार्टी से जुड़े करीब सभी नेता मायावती का साथ छोड़ चुके हैं. इसके फलस्वरूप मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति कारगर साबित नहीं हो पा रही है.” कांशीराम के सहयोगियों के रूप में राज बहादुर, आरके चौधरी, दीनानाथ भास्कर, मसूद अहमद, बरखूराम वर्मा, दद्दू प्रसाद, जंगबहादुर पटेल, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और सोनेलाल पटेल जैसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त हुआ करती थी. बाद में स्वामी प्रसाद मौर्य, जुगुल किशोर, सतीश चंद्र मिश्र, रामवीर उपाध्याय, सुखदेव राजभर, जयवीर सिंह, ब्रजेश पाठक, राम अचल राजभर, इंद्रजीत सरोज, मुनकाद अली और लालजी वर्मा जैसे नेता भी बसपा के सहयोगी बने. मनीष हिंदवी बताते हैं, “ मायावती के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण कई नेताओं ने या तो बसपा छोड़ दी या फिर वे पार्टी से निकाल दिए गए.”

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बसपा के तत्कालीन विधानमंडल दल के नेता स्वामी प्रसाद ने पार्टी छोड़ दी थी. बाद में मौर्य भाजपा में शामिल हो गए थे. इसके बाद बसपा के वरिष्ठ ब्राह्मण नेता और पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक भी बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे. वर्तमान में स्वामी प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक यूपी की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. वहीं बसपा का मुस्ल‍िम चेहरा रहे नसीमद्दीन सिद्दीकी ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद बसपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी. यूपी कांग्रेस ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को संगठन के मीडिया सेल का चेयरमैन बनाया है. बसपा के राज्यसभा सदस्य व राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा इकलौते वरिष्ठ नेता हैं जो पिछले दो दशकों से मायावती के साथ हैं. नाम न छापने की शर्त पर मायावती के एक करीब बसपा नेता बताते हैं, “बहन जी (मायावती) लगातार पार्टी के पदाधि‍कारियों के बारे में नेताओं से फीडबैक ले रही हैं. इसमें जिन नेताओ के बारे में पार्टी के विरोध में काम करने की जानकारी मिलती है उनपर तत्काल कार्रवाई की जा रही है. पार्टी वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ऐसे नेताओ के साथ नहीं जाना चाहती जो किसी भी रूप में बसपा को नुकसान पहुंचा रहे हों.”

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से नाराज नेताओं की पहली पसंद साइकिल बनी है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने वाली बसपा और सपा की राहें चुनाव के बाद अलग हो गई थीं लेकिन इनके बीच तल्खी तब चरम पर पहुंची जब पिछले वर्ष 28 अक्टूबर को राज्य सभा चुनाव के दौरान भाजपा से करीबी दिखाने वाली बसपा के विधायकों ने अपनी पार्टी से बगावत कर दी. बसपा विधायक चौधरी असलम अली, असलम राइनी, मुज्तबा सिद्दीकी और हाकिम लाल बिंद ने राज्य सभा चुनाव के चुनाव अधि‍कारी को बसपा प्रत्याशी के नामांकन में अपने हस्ताक्षर को फर्जी बताया और नाम वापस लेने की अर्जी दी. इन विधायकों ने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखि‍लेश यादव से भी मुलाकात की थी. इससे गुस्साई बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सपा को हराने के लिए भाजपा का सहयोग करने की घोषणा कर दी थी. 16 जनवरी को बसपा से निष्कासित पूर्व विधायक योगेश वर्मा अपनी पत्नी सुनीता वर्मा जो कि मेरठ की महापौर हैं, के साथ सपा में शामिल हो गए. पश्च‍िमी यूपी की दलित राजनीति में पकड़ रखने वाले योगेश वर्मा अपनी पत्नी सुनीता वर्मा को मेरठ का मेयर निर्वाचित कराकर अपनी राजनीतिक क्षमता जाहिर कर चुके हैं. बरेली से बसपा के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह, मिर्जापुर से पूर्व विधायक श्रीराम भारती, राठ के पूर्व विधायक अनिल अहिरवार, बसपा सरकार में मंत्री रहे तिलक चंद अहिरवार, पूर्व विधान परिषद सदस्य महेश आर्या, पूर्व मंत्री राजेंद्र कुमार, पूर्व विधायक बब्बू खान, मुजफ्फरनगर से पूर्व विधायक अनिल जाटव, पूर्व सांसद दाउद अहमद, अलीगढ़ से कोल विधायक जमीरउल्लाह हाथी का साथ छोड़ साइकिल की सवारी शुरू कर चुके हैं. जमीरउल्लाह कहते हैं, “यूपी में सपा की एकमात्र पार्टी है जो अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देगी. बसपा ने भजपा से अंदरूनी गठबंधन कर जनता के साथ छल किया है.” 

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