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उपचुनाव के नतीजों का असर, तेज होगी पिछड़ों की राजनीति

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारी कर रही हैं.

भीम राजभर को बसपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर स्वागत करते पार्टी कार्यकर्ता भीम राजभर को बसपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर स्वागत करते पार्टी कार्यकर्ता
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मायावती ने भीम राजभर को बसपा के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी
  • सभी प्रमुख पार्टियों ने पिछड़ी जातियों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं
  • ओम प्रकाश राजभर भागीदारी संकल्प मोर्चा को मजबूत करने में जुट गए हैं

यूपी में सात सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनाव के नतीजे बहुजन समाज पार्टी (बसपा)  की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं. सात सीटों पर हुए इन उपचुनाव में बसपा एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकी और पार्टी के वोट शेयर में भी काफी गिरावट हुई. इन उपुचनावों में बसपा को वर्ष 2017 के‍ विधानसभा चुनाव में मिले 22.23 प्रतिशत वोट की तुलना में करीब चार प्रतिशत कम 18.97 प्रतिशत ही वोट मिले. खासबात यह रही कि कई कोशि‍शों के बावजूद मायावती को बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट नहीं मिल सके. उपचुनाव के नतीजों से गुस्साई मायावती ने फौरन बसपा के प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली को पद से हटा दिया. अति पिछड़ी जातियों में बसपा की सबसे ज्यादा पैठ राजभर समुदाय में मानी जाती है. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जब यूपी में भाजपा की लहर चल रही थी तब भी बसपा के राजभर समुदाय से आने वाले दो प्रमुख नेता सुखदेव राजभर और रामअचल राजभर चुनाव जीतकर विधायक बने थे.

बसपा के नए प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव करने के लिए मायावती ने अति पिछड़ी जाति राजभर समुदाय के नेताओं के नाम पर मंथन शुरू किया. पहला नाम राम अचल राजभर का आया. पूर्वांचल की राजभर जाति में पकड़ रखने वाले रामअचल राजभर पहले भी बसपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. लेकिन आय से अधिक संपत्ति‍ और अन्य मुकदमों में फंसे होने के कारण यह बसपा के प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ से बाहर हो गए. बसपा के काफी पुराने नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर अपनी बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण बसपा के प्रदेश अध्यक्ष नहीं बन सके. पूर्वांचल के जिले मऊ से आने वाले राजभर समुदाय के नेता भीम राजभर को मायावती ने दीपावली त्योहार के दिन बसपा के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी. मऊ में बसपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रहे भीम राजभर ने वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में मऊ सदर सीट पर कौमी एकता दल के तत्कालीन उम्मीदवार मुख्तार अंसारी को कड़ी टक्कर दी थी. भीम राजभर ने यह चुनाव महज चार हजार वोटों से भले ही हारा हो लेकिन बसपा का विश्वास इनपर बना रहा. बसपा ने भीम राजभर को मंडल प्रभारी मनोनीत किया और वर्ष 2017 में इन्हें छत्तीगढ़ राज्य का प्रदेश को-ऑर्डिनेटर बनाया. दिसंबर 2018 में इनका कार्यक्षेत्र बदल कर इन्हें बिहार राज्य की जिम्मेदारी दी गई. इस तरह मायावती ने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ी जातियों को साथ जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू किया है.

अब जबकि यूपी में वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में डेढ़ साल से भी कम का समय रह गया है, यहां की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने पिछड़ी जातियों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं. यह महज संयोग नहीं है कि भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा जैसी मुख्य पार्टियों के प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ी जाति से हैं. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह कुर्मी जाति से आते हैं, इसी जाति से सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम भी ताल्लुक रखते हैं. वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू सैंथवार पिछड़ी जाति का प्रतिनिधि‍त्व करते हैं. देवरिया में एक इंटर कालेज में प्राचार्य डॉ. आर. बी. पाठक कहते हैं, “विधानसभा उपचुनाव से पहले प्रदेश की सभी विपक्षी पार्टियों ने अपर कास्ट को अपनी ओर खींचने के प्रयास शुरू किए थे. यही वजह थी कि देवरिया विधानसभा उपचुनाव में सभी पार्टियों ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे. जिस तरह से भाजपा को उपचुनावों में एकतरफा विजय मिली उससे यह साबित हो गया कि अपर कास्ट भगवा दल के पीछे मजबूती से खड़ा है. ऐसे में अब सभी पार्टियों ने भाजपा से अन्य पि‍छड़ी जातियों को खींचने की रणनीति बनाई है. बसपा द्वारा राजभर समुदाय से प्रदेश अध्यक्ष को बनाना इसी दिशा में प्रयास है. आगे दूसरी विपक्षी पार्टियां भी ऐसी रणनीति अपनाती दिखाई दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.”

हालां‍कि विपक्षी पार्टियों के लिए खासकर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में सेंध लगाना आसान नहीं होगा. स्थानीय स्तर पर मौजूद पिछड़ी जातियों पर आधारित छोटी-छोटी पार्टियां भी बड़ी पार्टियों के सामने गठजोड़ तैयार कर रही हैं. वर्ष 2017 में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के सामने बागी तेवर दिखाने के बाद इन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसकी भरपाई के लिए भाजपा ने शि‍वपुर से विधायक अनिल राजभर को राज्यमंत्री से प्रोन्नत कर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया था. इसके अलावा पिछले वर्ष हुए विधानसभा उपचुनाव में अनिल राजभर को यूपी भाजपा ने स्टार प्रचारक भी बनाया था. पिछले वर्ष 2019 में छोटी पार्टियों को लेकर “भागीदारी संकल्प मोर्चा” बनाने वाले ओम प्रकाश राजभर वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद एक बार फि‍र इस मोर्चे को मजबूत करने में जुट गए हैं. ओम प्रकाश राजभर दावा करते हैं कि “भागीदारी संकल्प मोर्चा” में बाबू सिंह‍ कुशवाहा की जन अधि‍कार पार्टी, कृष्णा पटेल की अपना दल, प्रेम चंद्र प्रजापति का भागीदारी आंदोलन मंच, बाबूराम पाल की राष्ट्रीय उदय पार्टी, राम सागर बिंद की भारत माता पार्टी, राम करन कश्यप की भारतीय वंचित समाज पार्टी और अनिल चौहान की जनता क्रांति पार्टी शामिल है. राजभर कहते हैं, “यूपी की करीब सभी विधानसभा सीटों पर इन सभी पार्टियों को मिलाकर इनके डेढ़ से दो लाख वोट हैं जो अगले चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे.”

बिहार में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्वांचल के कुर्मी समुदाय को सकारात्मक संदेश देने की कोशि‍श की है. पूर्वांचल में भाजपा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए पिछड़ी जाति को साधने की भरपूर कोशि‍श करेगी. इस समय जबकि मिर्जापुर से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल समय-समय पर यूपी की भाजपा सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर कर रही हैं, नीतीश को सामने कर भाजपा पूर्वांचल के पिछड़ों के बीच नए समीकरण तैयार करने की कोशि‍श भी करेगी. बहरहाल वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारी कर रही हैं. आने वाले दिनों में इस दिशा में नए-नए प्रयोग सामने आएंगे.

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