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यूपी पंचायत चुनाव में भाजपा को भारी पड़े किसान और कोरोना

पिछले वर्ष दिसंबर से शुरू हुए किसान आंदोलन की तपिश को ठंड करने के लिए भाजपा ने हर संभव प्रयास किए थे. भाजपा पिछले एक वर्ष से पश्च‍िमी यूपी में पंचायत चुनाव के मद्देनजर व्यूह रचना कर रही थी. बावजूद इसके भाजपा को पंचायत चुनाव के नतीजों में पश्च‍िम यूपी के जिलों में आशा से विपरीत नतीजे मिल रहे हैं.

यूपी पंचायत चुनाव में वोट देने पहुंचे मतदाता (प्रतीकात्मक फोटो/पीटीआइ) यूपी पंचायत चुनाव में वोट देने पहुंचे मतदाता (प्रतीकात्मक फोटो/पीटीआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पंचायत चुनाव की मतगणना जारी है और पश्चि‍मी यूपी के छह जिलो में जिला पंचायत सदस्यों के 220 वार्डों में भाजपा को करीब 50 सीटें ही मिलती दिख रही हैं
  • शुगर बाउल के नाम से जाना जाने वाला जिला मुजफ्फरनगर भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं दे रहा है. यहां की 45 सीटों में से भाजपा 11 ही जीतती दिख रही है
  • भाजपा के स्थानीय नेताओं का अहंकार के चलते जनता से दूरी, बड़ी संख्या में दूसरी पार्टी से आए नेताओं को तवज्जो देना, पार्टी के भीतर गुटबाजी भी भाजपा के खराब प्रदर्शन की मुख्य वजहें हैं

पिछले वर्ष दिसंबर से शुरू हुए किसान आंदोलन की तपिश को ठंड करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हर संभव प्रयास किए थे. भाजपा पिछले एक वर्ष से पश्च‍िमी यूपी में पंचायत चुनाव के मद्देनजर व्यूह रचना कर रही थी. पंचायत चुनाव के पहले भाजपा ने पश्च‍िमी यूपी के जिलों को किसान आंदोलन कें प्रभाव से बचाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की फौज उतार दी थी. बावजूद इसके भाजपा को पंचायत चुनाव के नतीजों में पश्च‍िम यूपी के जिलों में आशा से विपरीत नतीजे मिल रहे हैं. पश्चि‍मी यूपी में कृषि कानूनों के विरोध में कई जिलों के किसानों ने दिल्ली जाकर आंदोलन में हिस्सा लिया था. भाजपा के नेता आंदोलन की शुरुआत से ही इसका कोई प्रभाव यूपी के किसानों पर न पड़ने का दावा कर रहे थे. इसके उलट भारतीय किसान यूनियन और राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं ने लगातार कृषि‍ कानून के विरोध में रैलियां शुरू कर दी थीं. पश्चिमी यूपी के डेढ़ दर्जन जिलों में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बीते चार महीनों में दो दर्जन से ज्यादा रैलियां कर कृषि‍ कानून के विरोध में जनमत तैयार करने में जुटे थे. इसकी काट के लिए भाजपा ने भी बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक दिग्गज नेताओं की पूरी फौज उतार दी थी. पंचायत चुनाव के जरिए पश्च‍िमी यूपी में पूर्ण वर्चस्व हासिल कर किसन आंदोलन को निष्प्रभावी बनाने की पूरी कोशि‍श भाजपा के शीर्ष नेताओं ने की थी. भाजपा ने मुख्य फोकस जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव पर किया था जिसके जरिए जिला पंचायत अध्यक्षों का चुनाव होना है. पंचायत चुनाव के प्रत्याशी भी भाजपा ने प्रदेश स्तर से काफी मंथन के बाद ही घोषि‍त किए थे. पंचायत चुनाव की मतगणना जारी है और पश्चि‍मी यूपी के छह जिलो में जिला पंचायत सदस्यों के 220 वार्डों में भाजपा को करीब 50 सीटें ही मिलती दिख रही हैं. मेरठ जिले में भाजपा के छह विधायक, एक सांसद और दो राज्यसभा सदस्य, दो विधान परिषद सदस्य हैं. यहां पर भाजपा 33 में से अबतक छह सीटें ही जीत पायी है. पिछले चुनाव में भाजपा के 10 सदस्य जीते थे. इस बार भाजपा का दावा 20 से ज्यादा सदस्यों के जीतकर आने का था.

शामली जिले की तीन विधानसभा सीटों में से भाजपा के दो विधायक हैं. सांसद भी भाजपा का ही है. एक विधायक सुरेश राणा प्रदेश सरकार में मंत्री हैं. इसके बावजूद भाजपा जिला पंचायत सदस्यों की 19 सीटों में से केवल चार पर ही आगे चल रही है. पांच सीटों पर रालोद और छह सीटों पर निर्दलीय बढ़त बनाए हुए हैं. शुगर बाउल के नाम से जाना जाने वाला जिला मुजफ्फरनगर भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं दे रहा है. यहां की 45 सीटों में से भाजपा 11 ही जीतती दिख रही है. भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष यशपाल पंवार चुनाव हार गए हैं. रालोद अध्यक्ष अजित सिंह के इलाके बागपत जिले में भी भाजपा पिछड़ती दिख रही है. बागपत में जिला पंचायत सदस्यों के 20 वार्डों में रालोद आठ ओर सपा, भाजपा को चार-चार सीटें मिलती दिख रही हैं. बिजनौर में भी भाजपा की दुगर्ति हुई है. यहां जिला पंचायत सदस्य के 56 वार्डों में सपा को 20, रालोद को तीन, बसपा को 10 और भाजपा को केवल आठ सीटों पर बढ़त मिली है.

पूर्व मुख्यमंत्री ओर वरिष्ठ भाजपा नेता कल्याण सिंह के गढ़ अलीगढ़ में भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं है. यहां जिला पंचायत चुनाव में भाजपा को उसके ही गढ़ अतरौली में कड़ी टक्कर मिली है. अतरौली विधानसभा क्षेत्र में अतरौली और बिजौली ब्लॉक को मिला कर जिला पंचायत के कुल आठ वार्ड हैं, जिसमें पार्टी सात वार्ड पर चुनाव हार गई है. केवल एक वार्ड पर जीत मिली है. आलम ये रहा कि पूर्व सीएम कल्याण सिंह, एटा सांसद राजवीर सिंह राजू भैया, प्रदेश के वित्त राज्यमंत्री संदीप सिंह के पैतृक इलाके में पार्टी वार्ड नंबर पांच, छह व आठ पर बुरी तरह से हारी है. अलीगढ़ में भाजपा जिलाध्यक्ष चौधरी ऋषिपाल सिंह भी साख नहीं बचा सके. उनके गृह क्षेत्र के वार्ड नंबर तीन पर भी करारी शिकस्त हुई. जिला पंचायत के सभी 47 वार्डों पर प्रत्याशी उतारने वाली इकलौती भाजपा को जिले में कुल नौ सीटों पर जीत मिली है. पार्टी से समर्थन नहीं मिलने पर बागी हुए छह नेता बड़े अंतर से चुनाव जीते हैं. अलीगढ़ इंटरमीडियट कॉलेज के प्रवक्ता रमेश प्रताप बताते हैं, “कृषि‍ कानूनो के विरोध में किसान नाराज तो थे ही लेकिन 15 अप्रैल के आते आते जैसे ही कोरोना का प्रकोप बढ़ा और भाजपा सरकार उसे थामने मे लाचार दिखी तो इसका असर पंचायत चुनाव के नतीजों पर देखा जा सकता है. इसके अलावा भाजपा के स्थानीय नेताओं का अहंकार के चलते जनता से दूरी, बड़ी संख्या में दूसरी पार्टी से आए नेताओं को तवज्जो देना, पार्टी के भीतर गुटबाजी भी भाजपा के खराब प्रदर्शन की मुख्य वजहें हैं.” इसके अलावा भाजपा ने पंचायत चुनाव में अपने सांसदों, विधायकों या अन्य जनप्रतिनिधि‍यों के घरवालों को टिकट न देने का निर्णय लिया था. ऐसे में इन नेताओं ने पंचायत चुनाव से अपने को तटस्थ कर दिया. पार्टी के अधीकृत उम्मीदवारों के पक्ष में खुलकर समर्थन नहीं दिया क्योंकि इन्हें स्थानीय राजनीति में एक अन्य केंद्र के उभरने का डर सता रहा था. पंचायत चुनाव ने भाजपा को वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा सबक दिया है.

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