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यूपी: महामारी में कराह रहे ब्लड बैंक

कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रकोप के चलते ब्लड बैंक में स्वैच्छ‍िक रक्तदान में गिरावट. प्रदेश के सभी ब्लड बैंकों में रिजर्व कोटे का एक तिहाई खून ही मौजूद. मरीजों को हो रही दि‍क्कतें.

प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो
स्टोरी हाइलाइट्स
  • निगेटिव ब्लड ग्रुप वाले खून की सबसे ज्यादा कमी
  • हीमोफीलिया और थैली‍सीमिया के मरीजों की बढ़ी दिक्कतें
  • कोविड वैक्सीन लगवाने के दो हफ्ते बाद किया जा सकेगा रक्तदान

उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज (केजीएमयू) में सामान्य दिनों में 3,000 यूनिट तक ब्लड मौजूद रहता है लेकिन कोरोना काल में डोनेशन न होने की वजह से यहां पर महज 600 यूनिट खून ही बचा है. हालांकि कोविड काल में ब्लड बैंक से खून लेने वालों की संख्या भी कुछ कम हुई है, बावजूद इसके केजीएमयू के ब्लड बैंक से करीब 80 से 90 यूनिट ब्लड रोज दिया जा रहा है. कोरोना मरीजों की जान बचाने के लिए 20 से 30 यूनिट ब्लड रोज बगैर डोनर के भी देना पड़ रहा है.

वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल के सबसे बड़े ब्लड बैंक बीएचयू, वाराणसी में 2,000 यूनिट ब्लड हमेशा रिजर्व स्टाक के तौर पर रहता है. वर्तमान में यहां पर केवल 1,400 यूनिट ब्लड ही बचा है. इसी तरह वाराणसी के जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में 200 यूनिट ब्लड के रिजर्व स्टाक के मुकाबले केवल 60 यूनिट ब्लड ही बचा है.

लखनऊ और वाराणसी ही नहीं प्रदेश के सभी जिलों के ब्लड बैंकों में रिजर्व स्टाक का एक तिहाई ब्लड ही मौजूद है. कोरोना महामारी में खून की कमी झेल रहे ब्लड बैंक से कोविड मरीजों के अलावा हीमोफीलिया और थैलीसीमिया के मरीजों को भी दिक्कतें हो रही हैं. एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश के सभी बड़े ब्लड बैंक से 10 से 15 यूनिट खून रोज हीमोफीलिया या थैलीसीमिया के मरीजों के लिए दिया जाता है. ब्लड बैंक में खून की कमी से इन मरीजों के सामने भी जीवन का संकट खड़ा हो गया है. बीएचयू ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. संदीप कुमार के मुताबिक, सामान्य दिनों में जहां आम आदमी बड़ी संख्या में स्वैच्छ‍िक रक्तदान के लिए आगे आते थे लेकिन कोरोना संक्रमण के डर से लोग इस वक्त घरों से बाहर निकलने में डर रहे हैं. इस कारण ब्लड बैंक में रक्त की कमी होती जा रही है.

सबसे ज्याद कमी निगेटिव ग्रुप वाले खून की है. प्रयागराज के एसआरएन मेडिकल कालेज मे ब्लड बैंक की प्रभारी डॉ. वत्सला मिश्रा बताती हैं कि सामान्य दिनों में भी निगेटिव ब्लड ग्रुप के डोनर काफी कम मिलते हैं. कोरोना काल में तो यह और भी मुश्क‍िल हो गया है. यही कारण है कि निगेटिव ब्लड ग्रुप के खून की भीषण कमी पैदा हो गई है. ब्लड बैंक में खून की कमी के पीछे कोरोना वैक्सीन लगाने के बाद बरतने वाले एहति‍यात की ओर भी चिकित्सक इशारा कर रहे हैं. पिछले वर्ष स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी गाइडलाइन में कोरोना वैक्सीन लगवाने वालों को तुंरत रक्तदान करने से परहेज करने को कहा गया था. इसके मुताबिक वैक्सीन लगवाने के 28 दिन बाद ही रक्तदान किया जा सकता था. एक व्यक्त‍ि को दो बार वैक्सीन लगती है. कोरोना वैक्सीन की पहली डोज लगवाने के चार से छह हफ्ते बाद दूसरी डोज लेने का प्रावधान किया गया है. ऐसे में कोरोना वैक्सीन लगवाने वाले व्यक्त‍ि को दो महीने तक रक्तदान से दूर रहना पड़ता है. इससे ब्लड बैंकों में स्वैच्छ‍िक रक्तदान लगातार घटता जा रहा था. इसे दूर करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अब कोविड वैक्सीन की दूसरी डोज लगवाने के दो हफ्ते बाद रक्तदान करने की अनुमति दी है. ब्लड बैंकों में खून की कमी दूर करने के लिए सभी मेडिकल कालेजों और अस्पतालों ने स्वयंसेवी संस्थाओं, समाजसेवियों से रक्तदान करने की अपील की है. 

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