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शख्स‍ियत: अभि‍योजन में यूपी को अग्रणी बनाने वाले आशुतोष

हमेशा गुमनामी में रहने वाला अभि‍योजन विभाग पहली बार यूपी को देश में ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल का उपयोग करने में पहले नंबर पर खड़ा कर चर्चा में आया है.

लखनऊ स्थित अभ‍ियोजन न‍िदेशालय में मौजूद एडीजी आशुतोष पांडेय लखनऊ स्थित अभ‍ियोजन न‍िदेशालय में मौजूद एडीजी आशुतोष पांडेय
स्टोरी हाइलाइट्स
  • योगी ने बीते वर्ष 28 अगस्त को अभि‍योजन विभाग की कमान आशुतोष पांडेय को सौंपी थी
  • अभि‍योजन विभाग ने प्रॉसीक्यूटर के सारे काम का डिजिटलीकरण कर दिया
  • आशुतोष पांडेय ने पहली बार गवाहों की मॉनीटरिंग की योजना भी शुरू की

लखनऊ के गोमतीनगर में पिकप भवन के दूसरी ओर शांत की दिखने वाली बिल्ड‍िंग शालीमार टावर है. इसी बिल्ड‍िंग के चौथे तल पर अभि‍योजन निदेशालय में अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) आशुतोष पांडेय सुबह ठीक 10 बजे से अपने कक्ष में लगे कंप्यूटर एक खास आइसीजेएस पोर्टल पर विभाग के प्रॉसीक्यूटर्स की निगरानी में जुट जाते हैं. हमेशा गुमनामी में रहने वाला अभि‍योजन विभाग अब पहली बार यूपी को देश में ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल का उपयोग करने के मामले में पहले नंबर पर खड़ा कर चर्चा में आया है. पहली बार अभि‍योजन विभाग ने तकनीकी का उपयोग करके महिलाओं से अपराध करने वाले अपराधि‍यों को सजा दिलाने में यूपी को देश में पहला स्थान दिलाया है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले वर्ष 28 अगस्त को अभि‍योजन विभाग की कमान एडीजी आशुतोष पांडेय को सौंपी थी. अभी तक अभि‍योजन या प्रॉसिक्यूशन अलग-थलग विभाग हुआ करता था. आम जनता के बीच भी इस विभाग का कोई प्रभाव नहीं था जबकि उत्तर प्रदेश के सारे मुकदमों को उनकी परिणीति तक पहुंचाने की जिम्मेदारी अभि‍योजन विभाग की ही है. पिछले एक वर्ष के दौरान अभि‍योजन विभाग में लागू नवोन्मेषों ने वादी और गवाह के जरिए ही सजा दिलाने के सरकारी तौर तरीकों को बदल कर रख दिया है. किसी अपराध या अपराधी के बारे में सुचनाओं का आदान प्रदान जैसे किसी अपराधी की क्रिमिनल हिस्ट्री जानना हो तो पहले यह जानकारी संबंधि‍त थाने से मांगी जाती थी जिसमें काफी समय लगता था. अब केंद्र सरकार ने पूरे देश में “इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्ट‍िस सिस्टम” (आइसीजेएस) लागू किया है. आइसीजेएस का उद्देश्य वेब एपीआइ के माध्यम से अदालतों, पुलिस, अभि‍योजन, कारागार और फोरेंसिक प्रयोगशालाओं के बीच डेटा का आदान-प्रदान करके कुछ समय सीमा में न्याय वितरण की सुविधा प्रदान करना है. सीसीटीएनएस, ई-कोर्ट, ई-प्रिजन, ई-एफएसएल, ई-प्रॉसीक्यूशन जैसी सुविधाओं को आइसीजेएस के स्टेकहोल्डर्स के रूप में शामिल किया गया है.

अब आइसजेएस के जरिए देश में किसी भी अपराधी की क्रिमिनल हिस्ट्री जानी जा सकती है. देश के किस राज्य के किस जिले के किस थाने में किसी अपराधी ने क्या-क्या अपराध किया है? उस अपराधी की एफआइआर अब एक क्ल‍िक में मि‍ल जाती है. इस सुविधा से अपराधी के जमानत निरस्तीकरण और उसे सजा दिलाने की दिशा में एक बड़ी सुविधा पुलिस को मिली है. आइसीजेएस के जरिए यह भी जानकारी मिल जाती है कि किसी भी अभि‍युक्त की कोर्ट में पेशी की अगली तारीख कब है. इसका एक बड़ा फायदा यह है कि पुलिस, विवेचना अधि‍कारी, प्रॉसीक्यूटर्स को भी अपराधी के कोर्ट में पेशी और पिछली पेशी का विवरण ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल के जरिए अपने आप मिल जाती है.

यूपी में अभि‍योजन प्रक्रिया को त्वरित और प्रभावी बनाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर अभियोजन विभाग में तैनात 980 प्रॉसीक्यूटर्स को लैपटॉप देने की प्रक्रिया पिछले वर्ष शुरू की गई. प्रॉसीक्यूटर्स में एपीओ यानी असिस्टेंट प्रॉसीक्यूटिंग आफीसर, पीओ यानी प्रॉसीक्यूटिंग आफीसर, एसपीओ यानी स्पेशल प्रॉसीक्यूटिंग आफीसर, जिला स्तर पर अभि‍योजन विभाग का प्रमुख ज्वाइंट डारेक्टर होता है. रेंज स्तर पर प्रॉसीक्यूशन का प्रमुख एडीशनल डायरेक्टर होता है. अब तक 700 प्रॉसीक्यूटर्स को विभाग ने लैपटॉप दे दिया है. इन प्रॉसीक्यूटर्स का काम है कि जो मुकदमे, ट्रायल चल रहे हैं उनकी मॉनीटरिंग करें. प्रॉसीक्यूटर्स के लैपटॉप और तकनीकी से लैस होने का फायदा मुकदमों की चुस्त मॉनीटरिंग के रूप में सामने आया है. काम में किसी प्रकार की बाधा न आए इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सभी प्रॉसीक्यूटर्स को इंटरनेट की सुविधा के लिए डॉंगल दिया गया है. इसके अलावा आशुतोष ने हर महीने प्रॉसीक्यूटर्स की ट्रेनिंग कराने की योजना भी शुरू की है.

लखनऊ में पुलिस मुख्यालय की सिग्नेचर बिल्डिंग में हर महीने प्रॉसीक्यूटर्स की ट्रेनिंग कराई जा रही है. पहले केवल कनविक्शन यानी दोष सिद्ध और एक्वीटल यानी दोष मुक्त या यूं कहें कि मुकदमों के केवल नतीजे ही मालूम हो पाते थे. इन मुकदमों की पैरवी में प्रॉसीक्यूटर्स की भूमिका क्या रही? इसका कोई मूल्यांकन नहीं हो पाता था. अब आशुतोष ने शासन के निर्देश पर अभि‍योजन विभाग के सभी प्रॉसीक्यूटर्स के लिए केपीआइ यानी “की परफार्म‍िंग इंडीकेटर” तय कर दिए हैं. एनआइसी से इसका एक सॉफ्टवेयर तैयार कराया गया है. प्रॉसीक्यूटर्स ने कितने अपराधि‍यों की जमानत निरस्त कराई? कितने लोगों के बयान कराए? कितने मामलों में फाइनल आरग्यूमेंट किया? ऐसे कुल 77 बिंदुओं पर अभि‍योजन विभाग हर प्रॉसीक्यूटर्स के काम का मूल्यांकन कर रहा है.

अभि‍योजन विभाग ने एक प्रॉसीक्यूटर के सारे काम जो वह कोर्ट में करता है उसका डिजिटलीकरण कर दिया है. यह जानकारी आटोमैटिक इ-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल पर आ जाती है और इसके हिसाब से हर प्रॉसीक्यूटर्स के काम का मूल्यांकन होता है. अच्छा काम करने वाले प्रॉसीक्यूटर्स को विभाग की ओर से लगातार सम्मानित किया जा रहा है. इसी का नतीजा है कि यूपी पूरे देश में ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल का उपयोग करने के मामले में नंबर एक पर आया है. इस पोर्टल पर मौजूद पूरे देश के डेटा का 70 फीसद यूपी के द्वारा ही भरा गया है.  ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल पर यूपी ने 17 लाख डेटा भरा है जो कि देश में सबसे ज्यादा है. ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल पर आंकड़े दर्ज कराने वाले देश के टॉप-50 जिलों में 48 यूपी के हैं. ई-प्रॉसीक्यूशन पोर्टल पर आंकड़े भरकर अभि‍योजन की सूचनाओं को पूरी तरह डिजिटलीकरण करने वाले देश के टॉप-100 जिलों में यूपी के 74 (केवल अमेठी को छोड़कर) जिले हैं.

गुमनामी में रह रहे अभि‍योजन विभाग को एक नई शक्ल देने वाले आशुतोष पांडेय मूलत: भोजपुर आरा के रहने वाले हैं. पटना के सेंट जेवियर्स कालेज और साइंस कालेज से पढ़ाई करने के बाद आशुतोष ने बिहार कालेज ऑफ इंजीनियरिंग जो आजकल नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी, पटना से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री ली. इन्होंने भूगोल और संस्कृत को लेकर सिविल परीक्षा की तैयारी शुरू की. वर्ष 1992 में आशुतोष पांडेय का चयन भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) में हुआ. इनकी शुरुआती पोस्टिंग बनारस और लखनऊ में रही. वर्ष 1998 से 2001 में मुजफ्फरनगर में एसएसपी रहने के दौरान आशुतोष ने अपराधि‍यों के खि‍लाफ बड़ी मुहिम शुरू की थी. इस दौरान क्राइम कैपिटल के रूप में जाना जाने वाले जिले मुजफ्फरनगर में सौ के करीब अपराधी मारे गए थे. यहां फि‍रौती के लिए अपहरण का अपराध पूरे देश में सबसे अधि‍क था. यहां हर तरह के अपराध में काफी कमी आई थी.

वर्ष 2005 में वाराणसी और वर्ष 2012 में लखनऊ के एसएसपी रहने के दौरान आशुतोष पांडेय ने सूदखोरी के खि‍लाफ अभि‍यान छेड़ा था. यूपी तकनीकी सेवाओं के एडीजी के रूप में तैनाती के दौरान आशुतोष पांडेय ने यूपी-कॉप मोबाइल ऐप तैयार कराया था. इसमें कोई भी व्यक्त‍ि बिना थाना गए अज्ञात  अभि‍युक्त के खि‍लाफ मुकदमा दर्ज करा सकता है. इस मोबाइल ऐप के जरिए 24 तरह की मोबाइल सेवाएं आम आदमी को घर बैठे मिल जाती हैं. पूरे देश में पहली बार ऐसी व्यवस्था लागू की गई थी. यूपी पुलिस के इस मोबाइल ऐप को बहुत सराहना मिली. केंद्र सरकार ने यूपी-कॉप को देश का सबसे अच्छा पुलिस मोबाइल ऐप माना. वर्ष 2018 में लखनऊ में हुए नेशनल साइंस कांग्रेस में यूपी-कॉप मोबाइल ऐप के लिए आशुतोष पांडेय को सम्मान प्राप्त हुआ. थानों की मॉनीटरिंग के लिए भी बने मोबाइल ऐप यूपीपीएमएस के लिए भी आशुतोष को केंद्र सरकार से सराहना मिली थी.

समय पर गवाहों की कोर्ट में गवाही न हो पाने से अपराधि‍यों को सजा दिलाने में कठिनाई आती है और कई बार तो अपराधी ऐसी ही युक्त‍ि लगाकर बच निकलते हैं. ऐसी स्थतियों ने निबटने के लिए आशुतोष पांडेय ने पहली बार गवाहों की मॉनीटरिंग करने की योजना भी शुरू की है. कितने गवाह बुलाए गए, कितने आए, कितनों से पूछताछ हुई, कितने बिना पूछताछ के ही लौट गए, इस सबकी जानकारी अभि‍योजन विभाग अब जुटाने लगा है. इन सारी जानकारियों को अभि‍योजन विभाग शासन और न्याय विभाग के साथ साझा करके ऐसे मुकदमों पर खास ध्यान दिया जा रहा है जिनमें गवाह नहीं आ रहे हैं या तारीखों पर बगैर गवाही के लौट रहे हैं. ऐसे मामलों में विभाग गवाहों की समय पर गवाही सुनिश्च‍ित करने के प्रयास कर रहा है ताकि अधि‍क के अधि‍क अपराधि‍यों को सजा दिलाई जा सके.

अभि‍योजन विभाग की मॉनीटरिंग का असर महिलाओं से जुड़े अपराध के अपराधियों को सजा दिलाने में भी दिखाई दे रहा है. “क्राइम अंगेस्ट वूमेन” में यूपी का प्रॉसीक्यूशन रेट 52 प्रतिशत है जो देश में सबसे ज्यादा है. आशुतोष के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती “क्राइम अंगेस्ट वूमेन” में यूपी के प्रॉसीक्यूशन रेट को 52 प्रतिशत से बढ़ाकर अधि‍कतम स्तर तक पहुंचाने की है. 

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