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साइकोलोजः सबसे खतरनाक होती है, भ्रम की बुनियाद पर टिकी चरमपंथी सियासी सोच

पाश ने कहा था, सबसे खतरनाक होता है, सपनों का मर जाना. लेकिन आज अगर पाश होते तो कहते, भाई इससे भी खतरना होता है, ऐसी अधजल गगरी का चाय के अड्डों, यूनिवर्सिटीज की कैंटीनों और मीडिया दफ्तरों के गलियारों में छलक जाना.

हमें चाहिए आजादी, पर किससे! हमें चाहिए आजादी, पर किससे!

लोकतंत्र खतरे में है, हमें चाहिए आजादी, सांप्रदायिक ताकतें, धर्मनिरपेक्षता, बोलने का अधिकार, फासिस्ट, महिलाओं के हक, और न जाने क्या-क्या? बस कुछ यही शब्द हैं जो छौने बुद्धिमानों के गैंग में खासे प्रचलित हैं. इन कुछेक शब्दों को रटिए और दीजिए सियासी ज्ञान. न बड़ी-बड़ी थ्योरी पढ़ने का झंझट और न उनके अर्थ समझने की चिक-चिक.

हां, गेटअप पर काम किए बिना आप इस जमात में शामिल नहीं हो पाएंगे. जैसे शुद्ध सूती साड़ी लेकिन ब्रांड अंतरराष्ट्रीय होना चाहिए. जूलरी एंटीक ही हो. पुरुष हैं तो रंगीन कुर्ता और बढ़ी दाढ़ी, पर बेसलीके अंदाज में नहीं.

सरकारी योजनाओं की आलोचनाओं के लिए किसी विशेषज्ञ की तरह माथे पर बल डालकर आवाज में भारीपन लाकर बस इतना कहना है, सरकार तानाशाह हो गई है. अमुक नेता का रवैया फासिस्ट है. तानाशाही नहीं चलेगी. लोकतंत्र खतरे में है. वगैरह वगैरह. और फिर देखिए असर!

जरूरी तौर पर आपके चेहरे पर एक खास किस्म की गंभीरता तारी रहनी चाहिए. मुद्दा कुछ भी हो इन शब्दों की चाशनी बनाकर भाव-भंगिमा के रसगुल्ले डुबोकर बस फेंक मारिए सामने वाले पर. पर हर मामले के जानकार और आलोचना करने में माहिर ये लोग क्या वाकई मुद्दे की गहराई में उतरते हैं? येल साइकोलोजिस्ट लियोनिड रोजेनब्लिट और फ्रैंक किल ने श्रृंखलाबद्ध कई प्रयोग किए. उसके बाद इन दोनों ने हर मुद्दे पर बोलने के लिए उतावले इन कथित बुद्धिमानों की जमात के इस रवैए को ''इल्यूजन ऑफ एक्स्प्लेनेट्री डेप्थ'' का नाम दिया. मतलब ऐसे व्यक्ति को संबंधित मुद्दे पर गहरी जानकारी होने का भ्रम होता है. खैर, ईश्वर इन्हें माफ करना क्योंकि कथित बुद्धिमानों की इस जमात में शामिल इंसान यह नहीं जानता कि सोचने समझने की भी कोई सीमा होती है.

अब खतरा यह है कि इस तरह की बातें चहारदीवारी के भीतर हों तो कहा-सुनी तक सीमित रहती हैं. लेकिन जैसा की पाश ने कहा था, सबसे खतरनाक होता है, सपनों का मर जाना. लेकिन आज अगर पाश होते तो कहते, भाई इससे भी खतरना होता है, ऐसी अधजल गगरी का चाय के अड्डों, यूनिवर्सिटीज की कैंटीनों और मीडिया दफ्तरों के गलियारों में छलक जाना.

खासतौर पर पत्रकार इस मतिभ्रम के फेर में कुछ यूं उलझते हैं कि हंसी के पात्र बन जाते हैं. और कभी-कभी तो अफवाहों को फैलानेवाले जीते-जागते भोंपू बन जाते हैं. इस मतिभ्रम का शिकार दाएं और बाएं दोनों गलियारे में खड़े लोग हैं.

कुछ ऐसे ही लोगों की मानसिकता पर गहरे शोध के बाद मशहूर सेज पब्लिकेशन में ''पॉलिटिकल एक्स्ट्रीमिज्म इज सपोर्टेड बाइ एन इल्यूजन ऑफ अंडरस्टैंडिंग'' शीर्षक से एक शोध-पत्र प्रकाशित हुआ. प्रयोग के दौरान एक योजना पर अतिवादी राय रखने वाले लोगों से तथ्यपरक ढंग से सुबूतों के साथ इसे समझाने के लिए कहा गया तो लोग बुनियादी तथ्य भी नहीं बता पाए. दोबारा इन्हीं लोगों से इस योजना के बारे में अपनी राय देने के लिए कहा गया तो उन्होंने पहले के मुकाबले थोड़ा कम अतिवादी रवैए के साथ इस पर राय रखी. जितनी बार इस प्रक्रिया को किया गया राय कुछ कम अतिवादी होती गई.

कुल मिलाकर तथ्यों के उलझाऊ जंगल में उतरने के बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि भाई तथ्यों को समझना और खोजना हरेक के बस की बात नहीं. इसलिए बेहतर होगा कि अतिवादी रवैए की जगह संतुलित राय ही रखी जाए. सियासी ध्रुवीकरण में इस तरह की बहसों का बड़ा योगदान है. दरअसल आम और कुछ खास पेशे से जुड़े लोगों की बुद्धिमान दिखने और उस जमात का हिस्सा बनने की चाहत सियासत के खिलाड़ियों का हथियार बनती है. खरी बात तो है कि इस तरह के मतिभ्रम से भरी चर्चाएं ही तो चुनाव में जीत और हार का आधार बनती हैं.

शोधकर्ताओं ने बताया कि बुद्धिजीवियों की जमात से धिक्कारे जाने का डर और अतिआत्मविश्वास मिलकर अतिवादी सोच को जन्म देता है. इस सतही आत्मविश्वास और बात-विवाद में विनम्रता का भाव रखकर इस इल्यूजन यानी मतिभ्रम से बचा जा सकता है.

तो थोड़ा रुकें और सोचें कहीं हम इस मतिभ्रम का शिकार तो नहीं. क्योंकि अगर आज पाश होते तो वे शायद अपनी ही कविता की लाइन कुछ यूं बदलते, खतरनाक होता है भ्रम की बुनियाद पर टिकी चरमपंथी सियासी सोच का दूर-दूर तक फैल जाना. और उससे भी खतरनाक होता है, इस सोच का सियासी हथियार बन जाना.

(संध्या द्विवेदी इंडिया टुडे में विशेष संवाददाता हैं)

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