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साइकोलाजः मानव सभ्यता का यह अहम हिस्सा विलुप्ति की कगार पर और हम बेफिक्र !

धरती से संसाधनों का विलुप्त होना दुनिया पर एक बड़ा संकट है. लेकिन यह संकट संसाधनों के अति इस्तेमाल के कारण आया, पर भरोसे की विलुप्ति का कारण इसका न्यूनतम से भी न्यूनतम इस्तेमाल है. सियासत से लेकर समाज तक मानव सभ्यता को जोड़ने वाला भरोसे के इस पुल अब लगभग गायब होने की कगार में है. इस बेफिक्री का खामियाजा वर्तमान पीढ़ियों ने चुकाना भी शुरू कर दिया है.

साभार-इंडिया टुडे साभार-इंडिया टुडे

अतीत के अनुभव वर्तमान और भविष्य की पीठ पर कुछ यूं लद जाते हैं कि कितना भी झटकों यह उतरने का नाम ही नहीं लेते. सियासत पर से लोगों का भरोसा इतना उठ चुका है कि किसी कोई गंगा सिर पर उठा लेकिन लोग मान ही नहीं सकते कि सफेद पोशाक के भीतर नेता जी बेदाग होंगे. नेता दर नेता कुछ इस तरह से जनता का भरोसा लूटते गए कि अब तो नेता और धोखा एक दूसरे के पर्यावाची हो चले हैं. कुछ यही हाल घर, दोस्तों और परिचितों के बीच भी है. लोगों के बीच बने भरोसे के पुल की हालत देश में बने पुलों जैसी हो गई है. हलकी सी भी बारिस इने तोड़ सकती है. यह भरोसा ही तो है जिससे एक दूसरे लोग जुड़ते हैं. कैसे यह बताने की जरूरत नहीं. लेकिन फिलहाल भरोसे का यह पुल मानव सभ्यता के बीच अवशेष की तरह ही बचा है. अपने बीच से विलुप्त होती जातियों, भाषाओं, पशुओं और पक्षियों के लिए तो कुछ लोग आंदोलन भी चला रहे हैं लेकिन मानव समाज के सबसे प्रारंभिक हिस्से के विलुप्त होने की खबर भी किसी को नहीं लग रही.

खैर, हमने जब धरती के संसाधनों को नहीं छोड़ा फिर मानव सभ्यता को खत्म करने से आखिर गुरेज क्यों होगा? फिर भी भरोसे के विलुप्त होने या कहें धीरे-धीरे कम होने की एनाटोमी (शारीरिकीय) तो समझ ही लेनी चाहिए, क्या पता कुछ लोग इसे बचाने की मुहिम में निकल पड़ें!

मस्तिष्क के कामकाज में छिपा है इस सवाल का जवाब

दरअसल मस्तिष्क एक अलमारी की तरह है जो हमारे बुरे और अच्छे अनुभवों को सहेजकर रखता है. मजेदार बात यह है कि हम कई बार उस संदर्भ को भूल जाते हैं जिससे हमें बुरे अनुभव मिले थे, लेकिन उस अनुभव का कड़वापन हमेशा दीमाग के किसी कोने में बना रहता है. ब्रेन का एक हिस्सा होता है ट्रस्ट नेटवर्क (जहां विचार और भावनाएं मिलती हैं) यह क्षेत्र सामाज से मिले अनुभव और फिर उसके आधार पर दूसरे लोगों के बारे में हमारी राय बनाने का काम करता है. अब जैसे ही हम किसी व्यक्ति के बार में सोचते हैं तो उससे या वैसे ही किसी व्यक्ति से जुड़े अनुभव इस नेटवर्क को झकझोर देते हैं. अगर अतीत के अनुभव ठीक हुए तो विश्वास जमता है और नहीं तो विश्वास टूट जाता है.

तो क्या अतीत के अनुभव बदले जा सकते हैं?

पुराने घाव भर जाते हैं लेकिन टीस तो बची ही रहती है. बस इसी टीस को खत्म करने के लिए 'कॉग्निशन थिरैपी'. दीमाग की अलमारी से पुराने डेटा डिलीट कर वहां पर नए डेटा करीने से भरने हैं...पर इसे करना आसान नहीं, क्योंकि धारणाएं टूटते-टूटते ही टूटती हैं.

लेकिन असल सवाल यह है कि क्या जर्जर हो चुके भरोसे के पुल की मरम्मत करने के लिए कोई आंदोलन चलेगा? क्या व्यक्तित्व के विलुप्त होते इस अहम हिस्से को बचाने की कोई मुहिम चलाई जाएगी या जैसे रीढ़ की हड्डी का सबसे निचला हिस्सा जिसे कॉडल कहते पूंछ के अवशेष के रूप में याद किया जाता है वैसे ही हम कभी व्यक्तित्व के इस अहम हिस्से के बारे में इतिहास में पढ़ेंगे? हालांकि सियासत से लेकर समाज तक इसे खत्म करने की होड़ मची है उससे तो साफ है कि जल्द ही 'भरोसा' इतिहास हो जाएगा. 

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