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साइकोलाजः अब 'सिंगल' नहीं खुद के साथ 'मिंगल' होने का नया चलन!

 अब 'सिंगल' नहीं खुद के साथ मिंगल होने का जमाना है. कोई पूछे मिंगल होने का कब तक इरादा है तो दें दो टूक जवाब, मैं तो खुद के साथ मिंगल हूं, कोई एतराज!

अकेले जिंदगी जिएं बिंदास अकेले जिंदगी जिएं बिंदास

हॉलीवुड अभिनेत्री 'एमा वॉटसन' का एक इंटरव्यु वोग पत्रिका में छपा. एमा सिंगल हैं. और वह फिलहाल किसी और के साथ नहीं बल्कि खुद के साथ ही मिंगल होना चाहती हैं. उन्होंने एक टर्म भी इसके लिए इजाद किया, 'सेल्फ पार्टनर्ड.' सेल्फ पार्टनर्ड यानी खुद का साझीदार, जोड़ीदार, जीवि साथी, हिस्सेदार कुछ भी कह सकते हैं. अगर आपसे कोई पूछे कि आपका पार्टनर कौन है? और आप जवाब में कहें, मैं खुद ही हूं....तो समझ जाइये वह खुद की पार्टनर खुद ही है. दरअसल,  इस टर्म को 'सिंगल' रहने वाली लड़कियां या लड़के कोई भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

ऐसे दर्जनों शोध हो चुके हैं जिनमें बार-बार यह तथ्य निकलकर आए कि सिंगल रहने वाली लड़कियां/लड़के, पुरुष/स्त्री अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं. खासतौर पर अगर 40 पार होने पर तो दिक्कतें ज्यादा बढ़ जाती हैं. डी पाउलो और मोरिस की 2006 में हुई रिसर्च इस बात का प्रमाण है कि दफ्तर, घर, मोहल्ले में 'सिंगल' कहकर कैसे भेदभाव किया जाता है. मनोवैज्ञानिक टर्म में हुए बदलाव को बेहद सकारात्मक ढंग से देखते हैं.

दरअसल 'सिंगल' शब्द में अकेलेपन का जो बोध वह नकारात्मकता के भाव से भरा है जबकि 'सेल्फ पार्टनर्ड' यानी खुद की जोड़ीदार में जो भाव है वह सकारात्मकता से भरा है. एमा भी कहती हैं, '' मैं इस बार 30 वें साल की दहलीज पर कदम रखने वाली हूं. यह सोचते-सोचते मैं भय से भर गई. दरअसल मैं उन सवालों की बौछारों से छिले हुए अपने व्यक्तित्व के बारे में सोचते-सोचते घबरा गई जो मुझसे अब किए जाने थे.'' सवाल कुछ यूं होते हैं, '' ओह माइ गॉड तुम तीस की हो गई. अब तक तुम्हारा कोई पार्टनर नहीं! शादी, बच्चे....कुछ नहीं.'' फिर लोग पूछेंगे, क्या कोई दिक्कत है? फिर मेरे हर व्यवहार में मेरे सिंगल होने का प्रमाण तलाशेंगे.

सोचिए, हॉलीवुड में अगर यह हाल है तो भारतीय घरों की आम महिलाओं और शायद पुरुषों से तो क्या-क्या सवाल पूछे जाते होंगे! सिंगल महिलाओं को लोग इस नजर से भी देखते हैं कि वे हमेशा दूसरी महिलाओं के मर्दों पर नजर गड़ाए बैठी होती हैं. वे थोड़ी सनकी होती है. उनके चरित्र की चाल जरूर बिगड़ी होगी...ऐसा नहीं है कि भारत में 'सिंगल' स्टेटस पर कुछ काम नहीं हुआ बल्कि यहां तो खूब काम हो रहा है.

लाइफस्टाइल पत्रिका पीआर पर्सन की संपादक अब तक पांच उपन्यास लिख चुकी हैं. उनकी 2018 की किताब स्टेटस सिंगल: द ट्रुथ अबाउट बीइंग ए सिंगल वुमन इन इंडिया में 3,000 अकेली महिलाओं के अनुभवों का वर्णन है. कुंडू 2020 में बेंगलूरू में, अकेली महिलाओं का पहला सम्मेलन आयोजित करने जा रही हैं. कुंडू ही नहीं बल्कि ऐसी कई औरतें सिंगलहुड को नकारात्मक नजरिए से देखने वालों पर लगातार प्रहार कर रही हैं.

दिल्ली में स्कूल ऑफ डेवलपमेंट ऐंड इंपैक्ट में संसाधन प्रबंधन की सलाहकार अर्चना मित्तल कहती हैं कि समाज अकेली महिलाओं को असफल घोषित कर देता है. वे बताती हैं, '' जब मैंने घर खरीदने का मन बनाया तो लोग यह जानना चाहते थे कि क्या यह फ्लैट मैं अपने खुद के पैसे से खरीद रही हूं या मेरा कोई गॉडफादर है जो आर्थिक रूप से मुझे सहारा दे रहा है. और जब मैं एक किराए की जगह में रह रही थी, तो मुझे सख्ती से कहा गया कि मैं अपने माता-पिता या [पुरुष] दोस्तों को अपने घर में नहीं ला सकती.'' संघर्षों की यह दास्तान यहीं नहीं खत्म होती. न जाने कितनी महिलाएं अकेले रहने की वजह से नहीं बल्कि समाज के रवैए की वजह से पीड़ित हैं. लेकिन अकेले रहने का फैसला करने वाली औरतों को ऑस्ट्रेलिया की एक महिलावदी लेखिका, सामााजिक कार्यकर्त्ता, फिल्म निर्माता इरिना डन की यह बात ''एक औरत बिना मर्द के बिल्कुल वैसे ही है जैसे एक मछली बिना साइकिल के!'' गांठ बांध लेनी चाहिए. और अब जब भी कोई आपसे आपके अकेले रहने पर सवाल उठाए या भेदभाव करे तो इस लाइन को सुनाकर उसका मुंह फौरन बंद कर दें.

सीनियर मनोवैज्ञानिक प्रतिभा यादव कहती हैं, '' आप अगर अपने फैसले संतुष्ट हैं तो दूसरों की राय से प्रभावित न हों...कोई भी जिंदगी बिना रुमानियत और बिना झमेलों के नहीं होती.  जो आपके सिंगल स्टेटस पर तंज करे उससे फौरन पूछिए, क्यों कभी इतनी पांबंदियां आपको अखरती नहीं? कभी मन नहीं होता खुद के साथ रहें. सिर्फ आप हों और आप ही अपनी जोड़ीदार हों.'' वे कहती हैं, '' शादी एक स्टेज है, जरूरी नहीं हर कोई उसमें पहुंचना चाहे. अपनी जिंदगी चुनने का हर व्यक्ति को पूरा अधिकार है. तो अगर आपका मन किसी और के साथ मिंगल होने का नहीं तो इसमें क्या हर्ज आप खुद के साथ ही मिंगल हो जाएं. 

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