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लॉकडाउनः अकेले में खुश रहना पागलपन नहीं कला है

कोरोना काल में गैब्रियल ग्रेसिया मार्खेज के 1967 के उपन्यास वन हंड्रेड इयर ऑफ सॉलीट्यूड (One Hundred Years of Solitude)के शीर्षक की याद बार-बार आती है. एक सौ नहीं, अगर सौ दिन भी एकांत में रहना पड़ा तो क्या होगा?

एकांत में उम्मीद को बनाएं साथी एकांत में उम्मीद को बनाएं साथी

लॉकडाउन के 45 दिन बीत चुके हैं, आठ दिन बाकी हैं. पर क्या आगे लॉकडाउन खुलेगा? कुछ निश्चित नहीं. लॉकडाउन खुलने के बाद भी क्या अपने प्रियजनों के साथ हम घुल मिल पाएंगे? क्या भीड़ भरे बाजारों, सिनेमा घरों, चौपाटियों और रेस्त्रां की सैर कर पाएंगे? किसी दोस्त से गलबहियां कर पाएंगे? किसी अपने प्रिय मित्र से जीभरकर गले मिल पाएंगे? कब तक इंसानों से दूरी बनानी पड़ेगी? दरअसल, इन सवालों का जवाब हमारे पास फिलहाल नहीं है. क्या पता कुछ महीने, क्या पता साल! लेकिन क्या इस एकांत में हम जी पाएंगे? भीड़ के आदी हो चुके लोगों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग किसी सजा से कम नहीं.

कोरोना काल में गैब्रियल ग्रेसिया मार्खेज के 1967 के उपन्यास वन हंड्रेड इयर ऑफ सॉलीट्यूड (One Hundred Years of Solitude)के शीर्षक की याद बार-बार आती है. एक सौ नहीं, अगर सौ दिन भी एकांत में रहना पड़ा तो क्या होगा?

यह उपन्यास स्वप्नों और आकांक्षाओं का आख्यान है. वह एकांत को रचता नहीं, उसे प्राप्त करता है. वह आकांक्षा की एक अनवरत सदी रचता है ...लेकिन वह एकांत अर्जित करता है. लेखक कहता है, ''सॉलिट्यूड में इतिहास उसी तरह है, जैसे जंगल में पड़ा ध्वस्त जलपोत.'' मार्खेज का सॉलीट्यूड यानी एकांत उसकी मजबूरी नहीं बल्कि अर्जित किया हुआ था. लेकिन कोरोना क्राइसिस की जह से हमें जो एकांत मिला है, वह तो डर की वजह से उपजा है. डर कहीं संक्रमित होने का! डर पुलिस का हाथों मार खाने का! फॉदर ऑफ प्रोज और मशहूर दार्शनिक फ्रांसिस बेकन ने तो एकांत की परिभाषा और भी डराने वाले दी है. बेकन कहते हैं, '' एकांत यानी सॉलीट्यूड में दो ही लोग खुश रह सकते हैं, जंगली जानवर या फिर ईश्वर.'' लेकिन हम तो ठहरे इंसान. दरअसल एकांत में आपको खुद के साथ रहना होता है. आपकी कल्पनाएं जैसी होंगी आप वैसा महसूस करेंगे. अगर आप नकारात्मक सोच रखेंगे तो एकांत आपके लिए घातक साबित होगा पर दसूरी तरफ अगर कल्पनाएं सकारात्मक होंगी तो एकांत आपको डराएगा नहीं बल्कि भविष्य के बारे में योजनाएं बनाने का एक कैनवास मुहैया करवाएगा.

तो क्या करें? चुनाव आपके हाथ है. फिजिकल डिस्टेंसिंग वाले दौर में एकांत के डरावनी गलियों के चक्कर लगाते रहें? या फिर जुट जाएं अपने कैनवास को रंगीन करने में. मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स लगातार आगह कर रहे हैं, लॉकडाउन के बाद दुनिया मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम के भयावह दौर से गुजरेगी. और अपने आस पास देखिए लोगों में लक्षण भी नजर आने लगे हैं. लोग झल्ला रहे हैं. दफ्तर के साथियों के ऊपर बरस पड़ रहे हैं. एकांत और कई तरह के डर. नौकरी जाने, इएमआई न चुका पाने. परिवार का खर्च न वहन कर पाने जैसे न जाने कितने डर इस एकांत में वज्र बनकर गिर रहे हैं.

मशहूर मनोवैज्ञानिक ब्लेस पास्केल ने कहा था, अपने विचारों के साथ एकांत में रहना खुद को इलेक्ट्रिक शॉक देने जैसा है. पॉलिटिक्स ऑफ होप ऐंड डिसअपियर पर कई लेख लिख चुकी Shirley Le Penne कहती हैं, ''कोरोना की वह से मजबूरी में लिया गया एकांत शायद कम डरावना होता अगर हमें पता होता कुछ महीनों में सबकुछ ठीक हो जाएगा. जिंदगी पहले जैसी हो जाएगी. पर वैज्ञानिक तो यहां तक कह रहे हैं कि अब सोशल डिस्टेंसिंग दुनिया का एक जरूरी चलन होगा. इस चलन पर लोगों को सालों साल तक चलना ही होगा.''

तो क्या करें?

-फिजिलक डिस्टेंसिग को इमोशनल डिस्टेंसिंग में तब्दील न होने दें. लोगों से फोन, फेसबुक, स्काइप पर बात करें.

-पॉजिटिव साइकोलोजी होप या फिर उम्मीद के मनोविज्ञान पर टिकी है. इसीलिए इस धारा के मनोवैज्ञानिक कहते हैं, ''उम्मीद टूटने न दें. कोरोना महीनों या फिर सालों की मजबूरी बन सकती है लेकिन यह संकट अंतहीन नहीं हो सकता. ऐसा सोचें. कई महामारियां, पहले भी आई हैं, आती रहेंगी...हिम्मत रखें.''

-कॉग्निटिव बिहेवियर थिरैपिस्ट इस बात को मानते हैं कि संकट उतना बड़ा होता है जितना बड़ा हमारा दिमाग उसे दिखाता है. दिमगा को ट्रेंड करना है, बार-बार. डर जो हमने पाले हैं, डर कि यह संकट हमारा सबकुछ लेकर जाएगा. पैसा, रुतबा, नौकरी और पता नहीं क्या? तो यकीन मानिए जब यह संकट नहीं था तब भी सबकुछ जाने का डर हर पल था. और अगर यह सब चला भी गया तो सामान्य समय लौटेगा ही लौटेगा.

-प्रोसोशल बिहेवियर यानी उदारवादी व्यवहार अस्तित्व के सामने खड़े खतरे से घबराए मस्तिष्क को शांत करने का काम करेगा. इस संकट में घिरे व्यक्ति की मदद कर भी आप अपने अपने वजूद पर मंडरा रहे खतरे के डर से उबर सकते हैं. घर की मेड जो इस वक्त आपके घर नहीं आ सकती.उसका धंधा पानी बंद है, उसका वेतन जितना दे सकते हैं, जरूर दें, ड्राईवर, कार क्लीनर की आर्थिक मदद करें. हम जहां तक मदद कर सकते हैं मदद करें. अस्तित्ववादी मनोवैज्ञानिक कहते हैं, '' उदारवादी व्यवहार या किसी की मदद करने का आत्मसंतोष डगमगाते अस्तित्व के लिए बड़ा संबल बनकर उभरता है.''

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