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नरभसलाल का वसुदैव कुटुंबकम

नरभसलाल लंबे अंतराल के बाद प्रकट हुए तो उनके पास देश की हर समस्या का सुपर सॉल्यूशन मौजूद था. और तो और नरभसलाल सबको खुद ही डिटेंशन कैंप में भर्ती हो जाने की सलाह भी दे रहे हैं. सुजीत ठाकुर की कलम से पढ़िए नरभसलाल के फंडे

सौजन्यः मेल टुडे सौजन्यः मेल टुडे

आखिरकार लंबे अंतराल के बाद मेरे परम मित्र नरभसलाल प्रकट हो गए. चेहरे पर गमछा लपेटे हुए. मुंह में पान दबाए हुए. कमरे में दाखिल होते ही गमछा हटाया. मैंने सवाल किया कि, “भाई कहां थे इतने दिनों तक ? कुछ पता नहीं चला, सब ठीक है न ? ” नरभसलाल ने मेरी तरफ देखा और बोले, “सुनों. हम जो कह रहे हैं न वह एकदम हर प्राबलेम का सुपरे सोल्यूशन है. यह जो सीएए, एनआरसी, एनआरपी सब हैं न बहुत शानदार है. मोदी के संगे अमित शाह और भाजपा के सभी लोग बार-बार जो कह रहे हैं न कि इसे ठीक से समझो वह सहीये कह रहे हैं. हम समझ गए हैं तो पूरा का पूरा प्राबलेम ही समझो खतमे है.” 

मैं कुछ समझा नहीं. पूछ लिया कि विस्तार से बताओ. उन्होंने बताना शुरू किया जो उन्ही के शब्दों में इस प्रकार से है.

“देखो मित्र. पूरा देश बार-बार एक्के बात से परेशान है ऐसा नहीं है. लेकिन सब में एक्के बात है कि सब समस्या का जड़ पेट है. कभी चावल महंगा तो कभी दाल कटोरी से गायब. अच्छा, चावल-दाल को तो छोड़ो प्याज भी उछल-उछलकर आग मूतता रहता है. गाय आ भैंस तो सड़के पर घूमता रहता है लेकिन मदर डेरी आ अमूल का दूध भी महंगा होता जाता है. पेट्रोल-डीजल को महंगाई की आग को और भड़का ही रहा है न. ऊपर से अस्पताल का खर्चा, बच्चा सब को पढ़ाने का खर्चा सब बढ़ता जा रहा है. 

सरकार भले बताए न बताए लेकिन ज्ञानवान जनता तो समझ गया है न कि ई सब बढ़ता ही रहेगा. तो फिर समस्या का समाधान क्या है. सरकार ने दूर का उपाय भले न सोचा हो लेकिन जनता को तो सोचना होगा न. सो अगर ठीक से सोचो तो एनआरसी, सीएए, एनआरपी में इन सब का सोल्यूशन है.”

मैंने पूछा, "कैसे?" 

नरभसलाल पान का पीक थूकते हुए बोले, “लो भला पूरा रामायण पढ़ गए सीता किसकी पत्नी?” 

मैं कुछ बोलता उससे पहले नरभसलाल का प्रवचन शुरू हो गया. बोले, “ धत्त बुरबक कहीं का. जो लोग कह रहे हैं न कि उनको सर्टिफिकेट का जुगाड़ करना होगा यह बताने के लिए वह भारत के नागरिक है वह एकदम गलत दिशा में सोच रहे हैं. अरे सरकार ने सबको मौका दिया है यह बताने के लिए कि वह भारत के नागरिक हैं ही नहीं. वैसे भी भारत का चिरपरिचित वाक्य है कि, वसुधैव कुटुंबकम. अर्थात पूरी दुनियां ही परिवार है. सो कागज-पतर छोड़ो. कोई पूछने आए तो बोलो की जो देश मन में आए उसी का नागरिक बता दो. अगर कहे कि पाकिस्तान से हो तो हां बोल दो. पाकिस्तान पसंद नहीं आए तो आसपास के किसी देश का नाम बोल दो. ऐसा करने से फायदा यह होगा कि, कोई भी अपनी नागरिकता नहीं बता पाएगा. 

इसके बाद थोड़ा सा घूस देकर या खिलापिला कर अधिकारियों की सिफारिश लगवान  ही न बचेगा. मैं तो घूस देकर अफसरों से लिखवा लूंगा कि यह भारत का नागरिक नहीं है. एकबार कागज में यह दर्ज हो जाए कि नरभसलाल भारत का नागरिक नहीं है. बस फिर सारे समस्या का समाधन हो गया.” 

मैंने फिर टोका, "कैसे?" तो उनका जवाब था, ” कि जैसे ही अफसर लिखेगा कि नरभसलाल भारत का नागरिक नहीं है तो अगला ठिकाना कहां होगा. अरे यार अगला ठिकाना डिटेंशन कैंपे में होगा न. वहां रहना, खाना-पीना, बिजली, डाक्टर सब मिलेंगे न फोकट में. सुना है कि टीवी भी लगा होगा. आराम से फिल्म देखेंगे या सीरीयल. और मन की बात का प्रसारण भी डीडी पर देख सकेंगे न. अब तुम्ही बताओ की अभी बाहर रह कर खाना का जुगाड़ करो, इलाज का इंतजाम करो. तरह-तरह के टैक्स दो. नौकरी कहां मिलेगा यह सोचो. डिटेंशन कैंप में सब समस्या से मुक्ति मिलेगी.” 

मैं  नरभसलाल की बात से परेशान हो गया. बोला यार कुछ भी बोले जा रहे हो. नरभसलाल मुस्कुराए. बोले “ गुस्सा थूको. ऐसा नहीं है कि डिटेंशन कैंप में काम नहीं कराया जाएगा. जरूर करया जाएगा. लेकिन यार डिटेंशन कैंप से बाहर रहते हुए नौकरी खोजते-खोजते जूते घिस जाएंगे लेकिन नौकरी मिलेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं. लेकिन कैंप में बिना तलाशे ही कोई न कोई काम में लगा दिए जाओगे.

अब जरा सोचो. किसान बेचारा दिन-रात एक कर फसल उगाता है और बाद में सैकड़ों की तादाद में आत्म-हत्या करता है सो अलग. कैंप में आने के बाद खेती से भी मुक्ति और आत्महत्या का स्कोप भी खत्म. कैंप में रहेंगे सो स्कूटर-कार चलाने की जरूरत भी नहीं होगी सो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े न बढ़े क्या फर्क पड़ेगा. ऊपर से ये जेएनयू जैसी जगह पर भी जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. झूठ्ठे का नारेबाजी का क्या मतलब. 

मान लो कि फीस नहीं बढ़ा तो पढ़लिख कर क्या करेगा. नौकरी मिलेगी क्या. तो जब नौकरी मिलेगी ही नहीं तो हल्ला से क्या फायदा. आ जाओ डिटेंशन कैंप में. सब भाईचारे के साथ रहेंगे. वसुधैव कुटुंबकम की तरह. हां एक खतरा है कि डिटेंशन कैंप से सरकार यदि निकाल कर उस देश में भेज दे जहां का वह हमें नागरिक मानती हो तो फिर दिक्कत होगी.” 

अब मेरी बारी थी. मैंने नरभसलाल की चिंता दूर की. मैंने कहा, ‘भाई, नरभसलाल. हमारा देश दुनिया के लिए अनुकरणीय बन रहा है. हमारे देश की देखा-देखी दूसरे मुल्क भी डिटेंशन कैंप बनाएंगे. वहां भी हम उसी कैंप में रखे जाएंगे. और मान लो कि उस देश ने हमें अपना नागरिक मान ही लिया तो फिर वहां भी पुराने धंधे में लग जाएंगे. पुराना धंधा मतलब महंगाई से त्राहि-त्राहि करेंगे, सरकार बोलेगी नौकरी के लिए बंपर वेकैंसी है और हम नौकरी को चिराग लेकर खोजते रहेंगे, सरकार बोलेगी किसी की नागरिकता नहीं लेंगे और हम प्रदर्शन करते रहेंगे, सरकार कहेगी कि देश खुले में शौच से मुक्त हो गया और हम लोटा लेकर सड़क के किनारे बैठे रहेंगे, सरकार कहेगी कि पुलिस बाले ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग नहीं किया और हम सिर फुड़वा कर अस्पताल से जेल की सैर करते रहेंगे, और इससे भी बात नहीं बेनेगी तो मंदिर-मस्जिद तो लड़ने के लिए परमानेंट और अचूक उपाय है ही. 

यदि इससे भी काम नहीं चला तो फिर संसद तो हैं ही आगे का जुगाड़ फिर करने के लिए. आपस में लड़ाने की जो इंपैक्ट मंदिर-मस्जिद को तोड़ने से नहीं होता है वह तो संसद के जरिए कानून बना कर पैदा किया ही जा सकता है. इसलिए वसुधैव कुटुंबकम पर यकीन रखो. जब पूरी दुनियां ही अपना परिवार है तो डिटेंशन कैंप पूरी दुनियां के लिए एक कमरा ही होगा न. अब डिटेंशन कैंप हिटलर के देश में हो या गांधी के देश में क्या फर्क पड़ता है. 

नरभसलाल मेरी बातों से प्रभावित हुए और पान की दुकान की तरफ चल पड़े.

(सुजीत ठाकुर इंडिया टुडे के असिस्टेंट एडिटर हैं)

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