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भाजपा के भगत हो गए नरभसलाल

मेरे परम मित्र नरभसलाल इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे कि उनकी योग्यता देश के काम तभी आएगी जब वह सियासत में हिस्सेदार होंगे. काफी सोच विचार करने के बाद आखिरकार वह भाजपा के सदस्य बन गए.

फोटो सौजन्यः मेल टुडे फोटो सौजन्यः मेल टुडे

मेरे परम मित्र नरभसलाल इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे कि उनकी योग्यता देश के काम तभी आएगी जब वह सियासत में हिस्सेदार होंगे. काफी सोच विचार करने के बाद आखिरकार वह भाजपा के सदस्य बन गए. इस खुशी को बांटने के लिए मिठाई लेकर वह मेरे घर पधारे. मेरे मूंह में लड्डू ठूंसते हुए बोले की बहुत बड़ी खुशखबरी है. मैंने पूछा कि बेटे का प्रमोशन हो गया क्या? वह बोले, ‘नहीं यार वह जिस कंपनी में काम करता था वहां स्टाफ की छंटनी हो रही थी, सो कल ही वहां से भगा दिया गया’. 

तो बेटी की शादी तय हुई होगी? कुछ चिढ़ते हुए बोले, ‘नहीं यार. कोई रोजगार वाला योग्यवर मिले तब न शादी तय करूं.’ खैर मैंने पूछ लिया कि तो खुशखबरी क्या है? नरभसलाल चहकते हुए बोले, ‘यार मुझे भाजपा का सदस्यता मिल गया है न‘. 

मैंने बधाई देते हुए पूछ लिया कि यार तुम भाजपा के सदस्य ही क्यों बने, किसी दूसरी पार्टी के क्यों नहीं बने? बस मेरा इतना पूछना था कि नरभसलाल चालू हो गए. उन्होंने बताना शुरू किया या यों कहें कि उनकी कथा इस तरह से हैं.

‘भाजपा देश ही नहीं दुनियां का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है. पटना का जो गोलघर है न उससे भी बड़ा. चौड़ा इतना की फोर लाइन-सिक्स लाइन सड़क भी मूंहे ताकते रह जाए. लंबा इतना कि बार रे बाप, बड़का-बड़का रेलगाड़ी भी इसके सामने छोटा दिखता है. पार्टी में एक से एक बड़का नेता सब है. लंका में जो सबसे छोटा ऊ उनचास हाथ के जैसा पूरा व्यवस्था है. जिसका कोई नामो नहीं सुना है वह मंतरी-संतरी इसी पार्टी में बन सकता है. 

सो हमारा भी यहां पूरा चांस है कोई न कोई बड़ा पद मिलबे करेगा. दूसरा जो सबसे इंमपोर्टेंट बात है, जो मुझे भाजपा की तरफ खींच ले गया वह है इसके पास दूसरी पार्टी के नेताओं को गरियाने का कुब्बत. अब कांग्रेस में जाने का क्या फायदा था. वहां चला जाता तो भाजपा के किस नेता को गरियाता? 

यहां तो जमा-जमा दो-चार नेता ही है वो भी गरियाने लायक नहीं है. वाजपेयी, आडवाणी या जोशी ही ले-देकर हैं. लेकिन सच बताऊं, कांग्रेसी भी इन्हे गरियाना नही चाहते हैं. वाजपेयी तो अब रहे नहीं लेकिन बांकी दोनों नेता ऐसे हैं जो पार्टी में ही गरियाये बिना धकिया दिए गए हैं. इन्हें गाली देकर क्या फायदा? 

लेकिन भाजपा में रहते हुए हम कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को जम कर गरिया सकते हैं. नेहरू हों या इंदिरा या फिर राजीव या सोनियां, गरियाने लायक सभी हैं. राहुल तो इस लायक भी नहीं है कि उसे गरिया सकें. हां कभी-कभी जब कोई न मिले तो उसे भी गरिया कर अपनी बात कह सकते हैं.

तीसरा बात यह है जिस वजह से मैं भाजपा का सदस्य बना वह है इसका आधुनिक टेक्नालाजी का इस्तेमाल करना. बस मिस्स काल दो और हो गए सदस्य. न पार्टी दफ्तर जाने की जरूर न ही किसी के आग-पीछे घुमने की मजबूरी. झटके में मिस्स काल दो और बन जाओ सदस्य. अपना फोन नहीं भी हो तो भी किसी दूसरे के फोन से मिस्स काल देकर सदस्य बना जा सकता है. 

इसी फैसिलिटी की वजह से आज यह भी संभव है कि कई राज्य में तो पार्टी उतना वोट भी हासिल नहीं कर पाती है जितने की सदस्य होते हैं.

चौथा जो सबसे बड़ा कारण है वह है इस पार्टी की सदस्य बनना गंगा स्नान करने जैसा पुण्य का काम है. यहां आए नहीं के पुराने सारे पाप धुल गए. देखा नहीं बंगाल वाला वह नेता जो पहले टीएमसी में था. उस पर भ्रष्टाचार का आरोप था, कुछ दिन टीएमसी में ही रहता तो जेल चला जाता. लेकिन भाजपा में आते ही एकदम पवित्र हो गया. 

यहां पर एक बात जरूरी है यह बताना की चिदंबरम विदेश में पढ़ कर झुठ्ठे अपन बाप का पैसा डुबो दिया. भाजपा में चला जाता तो बच जाता. रह गया कांग्रेस में सो सड़ रहा है जेल में. इसी को कहते हैं बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करना. और वो कर्नाटक बाला कोई शिव  है वह भी पहुंच गए सही जगह पर. भाजपा में आ जाते तो मंत्री तो बनिये जाता न बुड़बक’. 

खैर मैंने टोकते हुए पूछा कि अच्छा नरभसलाल ये बताओ की समाजवादी पार्टी, राजद या वामपंथी दल यहां जाने की क्यों नहीं सोचे? नरभसलाल भड़क गए. बोले, ‘हम तुमको क्षेत्रीय दल के लायक लगते हैं क्या जी. हमारा स्टेचर नेशनल पॉलिटिक्स का है. वैसे भी समाजवादी पार्टी के साइकिल पर आज के जमाने में कौन चढ़ेगा, जब देश में बुलेट ट्रेन चलने वाला है. वैसे लेफ्ट में जाने का भी सोचा था. वहां तो लगभग पहुंच भी गया था लेकिन लैंडिंग में गड़बड़ हो गया. जैसे चंद्रयान, चांद पर पहुंचते-पहुंचते रह गया वैसे ही वामपंथी बनते-बनते मैं रह गया. 

दरअसल वहां जाने से पहले भगवान का प्रार्थना करने चला गया था और माथे पर तिलक लगाकर हाथ में प्रसाद लेकर उनके दफ्तर चला गया तो वहां के लोगों ने मुझे धकिया कर लगा दिया. वैसे भी वामपंथी बेकार ही है. वह उस मच्छर जैसे हैं जो रात को सोते वक्त कान के पास आवाज करते हुए उड़ता है लेकिन काटता नहीं है. हां यह बात सही है कि काटने वाला पार्टी ममता बनर्जी का है लेकिन बेचारी खुदे डरी हुई है. सो कुल मिला कर एक ही पार्टी बचा भाजपा, सो हम हो गए हैं भाजपाई.’

(सुजीत ठाकुर इंडिया टुडे के असिस्टेंट एडिटर हैं)

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