scorecardresearch
 

स्मृतिः चले गए वसंत काशीकर

जबलपुर के ख्‍यात रंगकर्मी वसंत काशीकार का कोरोना से निधन हो गया

स्मृतिः चले गए वसंत काशीकर स्मृतिः चले गए वसंत काशीकर

राजेन्‍द्र शर्मा

मशहूर कथाकार उदय प्रकाश की कहानी "मौसा जी" का बुंदेली में "मौसा जी जैहिन्‍द" के नाम से नाटय रुपांतर कर देश के कोने कोने तक जाकर इसके अस्‍सी से अधिक मंचन करने वाले जबलपुर के ख्‍यात रंगकर्मी वसंत काशीकार जीवन के 71वें वर्ष में भी उत्‍साह से लबरेज थे. कोरोना काल में यू टयूब पर " कहत परसाई" के लेखन का पाठ कर रहे थे.

इस पाठ में हरिशंकर परसाई जी की रचनाओं को उचित आरोह अवरोह के साथ ऊंची आवाज़ में उसी अंदाज में पढते ,जिस अंदाज में हरिशंकर परसाई ने लिखा. कोरोना आपदा के कारण जबलपुर में सवा साल से ठप्‍प पडी रंगमंचीय गतिविधियों को कोरोना आपदा के जल्‍दी खत्‍म होने की उम्‍मीदें लगाये दुबारा से शुरु करना चाहते थे. अपने प्रिय कथाकार उदय प्रकाश,जिनसे उनका अनवरत संवाद बना था,को जबलपुर बुलाना चाहते थे . भोपाल में एक नाटक करने की योजना में व्‍यस्‍त थे परन्‍तु उन्‍हें क्‍या खबर थी कि कोरोना वायरस की जकड में ऐसे आयेगें कि 14 मई 2021 की सुबह इस दुनिया से रुखस्‍त होना पडेगा.

मध्‍य प्रदेश के जिले सागर में देवरी में 14 जनवरी 1951 को जन्‍मे वसंत काशीकर देवरी से प्राथमिक शिक्षा के उपरांत जबलपुर से हाई स्कूल तथा गवर्नमेंट साइंस कॉलेज जबलपुर से स्‍नातक कर स्‍टेट बैंक में नौकरी की. युवावस्‍था में ही हरिशंकर परसाई के निकटतम रहने का प्रभाव वसंत काशीकर पर ऐसा पडा कि स्‍टेट बैंक की नौकरी जरुर करते रहे परन्‍तु "बैंक का निखालिश बाबू" कभी नही बन पाये. उनके मस्तिष्‍क में हर समय कुछ न कुछ रचनात्‍मक करने की योजनायें चलती रहती. बचपन में कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर राधा बनने वाले वंसत काशीकर की अभिनय,निर्देशन में स्‍कूली दिनों से दिलचस्‍पी रही. सातवी कक्षा में पढते हुए उन्‍होनें ठाकुर का कुऑ नाटक का निर्देशन किया किन्‍तु सक्रिय रंगकर्म की शुरुआत 1976 में हरिशंकर परसाई के इस सीख से हुई कि आम आदमी तक अपनी बात पहुंचाने का थियेटर से बेहतर कोई साधन नही है . 1976 से अपनी अंतिम सांस तक बिना किसी इनाम-ईकराम की लालसा के वसंत काशीकर अपने मन का करने और लोंगों तक अपनी बात सहज रुप से पहुंचाने के लिए रंगमंच को समर्थित रहे .

बैंक की नौकरी से सेवानिवृति के बाद हरिशंकर परसाई द्वारा 1962 में बनायी गयी संस्‍था "विवेचना"  के तत्‍वानधान में नाटकों का निर्देशन शुरू किया. अनेक नाटकों में यादगार अभिनय भी किया. उदयप्रकाश की कहानी "मौसाजी" का बुंदेली में नाट्य रूपांतरण "मौसा जी जैहिन्‍द" उनके विस्मयकारी अभिनय कौन भूल सकता है ? इस नाटक के बात वसंत काशीपुर कही भी निकलते तो लोग उन्‍हें "मौसा जी " कहकर बुलाते थे . वसंत काशीकर ने  बुंदेली में केवल नाटय रुपांतर और अभिनय, निर्देशन ही नही किया गया. उन्हें संगीत नाटक अकादेमी से बुंदेली लोकनाट्य पर फेलोशिप भी मिली थी. उन्होंने बुंदेलखंड में घूम- घूम कर उत्कृष्ट शोधकार्य किया था जो किताब रुप में भविष्‍य में अग्रेत्‍तर शोध करने वाले छात्रों के लिए उपलब्‍ध है.

अपने जीवन के 40 से अधिक साल रंगमंच को समर्थित करने वाले वसंत काशीकर जबलपुर में तीन पीढ़ियों के सांस्कृतिक सेतु थे. वसंत काशीकर के सतत प्रयासों से ही जबलपुर में एक तरह से स्टेज कम पड़ने लगे पर नए नाटकों के मंचन का जैसे अटूट सिलसिला ही चल पड़ा. यह सिलसिला जबलपुर तक ही नही रुका. देश के कोने कोने तक वह नाटकों को मंचन करते. इसकी बदौलत जबलपुर का नाम नाट्य विधा में शीर्ष पर पहुंच गया. ग्रीष्मकालीन अवकाश में वसंत काशीकर हर साल नये कलाकारों के लिए आपने खर्च पर नाट्य शिविर लगाते, उन्हें बारीकियां बताते और उनकी कला को और मांजते. हिमांशु राय, अरुण पाण्‍डेय, विनय अम्‍बर जैसे युवा रंगकर्मी वसंत काशीकर ने ही तराशे है . 

वसंत काशीपुर के जाने से जबलपुर ही नही ,समूचा रंगमंच कुछ निर्धन जरुर हुआ है. क्‍या यह विस्‍मयकारी नही है कि वसंत काशीकर तो इस फानी दुनिया से अलविदा कह गये परन्‍तु उनके द्वारा अभिनीत "मौसा जी" हमेशा रहेगें .

(लेखक उत्‍तर प्रदेश वाणिज्‍य कर विभाग में अधिकारी हैं.)

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें