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सैर-सपाटाः हिंदू देवताओं की भूमि बाली

बाली मुस्लिमबहुल देश इंडोनेशिया का हिस्सा है. लेकिन यहां हिंदू संस्कृति और स्थानीय परंपरा का अद्भुत मेल दिखाई देता है. दीपांश गोयल की कलम से बाली द्वीप का सफरनामा

फोटोः दीपांशु गोयल फोटोः दीपांशु गोयल

सैर-सपाटा/ दीपांशु गोयल

(पूर्वी एशियाई देशों के पर्यटन पर सीरीज)

बाली में आप कहीं भी जाएं तो फूलों से सजी छोटी टोकरियों पर नज़र ज़रूर जाएगी. दुकानों, घरों, समुद्री किनारों या फुटपाथों पर छोटी टोकरियां रखी दिखाई देती हैं. भगवान ब्रह्मा को चढ़ावे के तौर पर इन टोकरियों को रखा जाता है. स्थानीय भाषा में इन्हें चनंग सारी कहा जाता है. 

बाली आने पर हिन्दू संस्कृति का सबसे पहला उदाहरण यही नज़र आता है. 

ख़बूसरत समुद्री तटों, नारियल के पड़ों , जंगलों और पहाड़ों से भरा बाली सही मायने में किसी स्वर्ग जैसा लगता है. हिन्दू संस्कृति का अनोखा रूप इसकी ख़बूसरती को और भी बढ़ा देता है.

इंडोनेशिया दुनिया का सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश है. बाली इंडोनेशिया का ही एक हिस्सा है लेकिन यहां की अधिकांश आबादी हिन्दू है. करीब 600 वर्ष पहले इंडोनेशिया के मुख्य इलाके में मुस्लिम सत्ता आने के बाद जावा जैसे इलाकों की हिन्दू आबादी ने बाली में पनाह ली. धीरे-धीरे बाली में हिन्दू धर्म का ऐसा स्वरूप विकसित हुआ जिसमें बाली के स्थानीय विश्वासों के साथ हिन्दू और बौद्ध धर्म का मेल दिखाई देता है. 

इसी हिन्दू संस्कृति ने आज बाली को दुनिया भर में अलग पहचान दी है. 

बाली पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे मंदिरों की दुनिया में आ गए हैं. जिधर नज़र जाए हर तरफ मंदिर दिखाई देते हैं. इसका कारण यह है कि बाली की संस्कृति में मंदिरों का बड़ा महत्व है. लगभग हर घर या इमारत में एक मंदिर ज़रूर होता है. लोगों के घरों में निजी मंदिरों के साथ गांवों में सार्वजनिक मंदिर भी होते हैं. अमीर लोग विशाल निजी मंदिर बनवाते हैं. मंदिरों को बनाने में पत्थर, ईंट, बांस, लकड़ी, नारियल के पत्तों और घास का इस्तेमाल किया. 

लाल ईंटों और स्लेटी रंग पत्थर से बने मंदिर देखने में बहुत आकर्षक लगते हैं. मंदिरों को पत्थरों से बनी मूर्तियों और पत्थर पर उकेरी कला कृतियों से सजाया जाता है. मंदिरों के लकड़ी के दरवाजों पर शानदार नक्काशी की जाती है. कुछ घरों के मुख्य दरवाज़े भी बारीक नक्काशी से सजे दिखाई देते हैं. किसी घर के दरवाजे को देखकर उस घर की आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

ब्रह्मा, विष्णु और महेश यहां के प्रमुख देवता हैं. मंदिर में देवताओं की मूर्तियां नहीं होती. मंदिरों में पत्थर के बने ऊंचे मंच होते हैं जिनमें देवताओं का वास माना जाता है. इसके अलावा भगवान गणेश, देवी पार्वती और देवी श्री को भी पूजा जाता है. घरों के मुख्य दरवाजे से अंदर जाते ही भगवान गणेश की मूर्ति लगाई जाती है. 

होटलों, रेस्टोरेंट्स और दुकानों के बाहर भी भगवान गणेश की मूर्तिया दिखाई देती हैं. 

भोजन बनाने के बाद सबसे पहले भगवान को भेंट चढ़ाई जाती है. आमतौर से दिन में तीन बार भोजन बनता है तो तीन बार भगवान को भेंट चढ़ाई जाती हैं. ऊपर जिस चंगन सारी की बात की थी उनके ज़रिए यह भेंट भगवान को चढ़ाई जाती हैं. 

चनंग सारी भी यहां की संस्कृति का प्रमुख हिस्सा है. नारियल और सुपारी के पत्तों से बनी इन टोकरियों को बनाने में पूरे विधि विधान का पालन किया जाता है. महिलाएं घर में चंनग सारी बनाती हैं. इन टोकरियों में फूल के साथ भोजन की सामग्री रखी जाती है. चनंग सारी में बिस्कुट, टॉफी और सिगरेट जैसी चीज़ें भी रखी नज़र आती हैं. 

टोकरियों में फूलों को रखने का भी खास तरीका होता है. 

चनंग सारी में सफेद, लाल, पीले  और नीले या हरे रंग के फूल रखे जाते हैं. सफेद फूल पूर्व दिशा में रखे जाते हैं ये फूल ईश्वर का प्रतीक माने जाते हैं. लाल फूल दक्षिण दिशा में रखे जाते हैं इन्हें ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है. पीले फूल पश्चिम दिशा में रखे जाते हैं और इन्हें शिव का प्रतीक माना जाता है. नीले या हरे रंग के फूल उत्तर दिशा में रखे जाते हैं और उन्हें विष्णु का प्रतीक माना जाता है. 

मंदिरों में प्रवेश और पूजा के खास नियम हैं. आमतौर से मंदिरों में केवल बाली के हिन्दू ही जा सकते हैं. मंदिरों में काफी समारोह और अनुष्ठान किए जाते हैं. किसी समारोह या उत्सव के समय काफी बड़ी संख्या में स्थानीय लोग पारंपरिक कपड़ों में मंदिर जाते दिखाई देते हैं. 

बाली के हिन्दू धर्म में रामायण और महाभारत का भी बहुत महत्व है. रामायण और महाभारत से जुड़े चरित्रों की मूर्तियां बाली के चौराहों पर दिखाई देती हैं. 

बाली एयरपोर्ट से निकलते ही घटोत्कच और कर्ण के बीच हुए युद्ध को दिखाती विशाल मूर्ति लगी है. इसी तरह अलग- अलग चौराहों पर भीम, अर्जुन, भगवान कृष्ण, पांच-पांडवों और भगवान राम की मूर्तियां दिखाई देती हैं. बाली के प्रमुख मंदिरों में पुरा बैशाख, तनहा लोट और उलुवाटु मंदिर शामिल हैं. 

बाली कैसे जाएं 

भारत से बाली के लिए सीधी हवाई सेवा नहीं है. कुआला लम्पुर, सिंगापुर या जकार्ता से फ्लाइट बदलकर बाली पहुंचा जा सकता है. एयरएशिया, मलिन्डो एयर, मलेशियन एयरलाइन, गरूड़ इंडोनेशिया और सिंगापुर एयरलाइन्स जैसी एयरलाइन्स बाली को भारत से जोड़ती हैं.

(दीपांशु गोयल एक ट्रैवल ब्लॉगर और यूट्यूबर हैं. उनका ट्रैवल ब्लॉग दुनिया देखो काफी पढ़ा जाता है. घुमक्कड़ प्रकृति के गोयल हमारे लिए यह सीरीज लिख रहे हैं. यहां व्यक्त राय उनकी निजी है और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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