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शहरनामाः सतीनाथ का कथा अंचल था पूर्णिया

पूर्णिया महज एक शहर नहीं, इतिहास का एक दस्तावेज है. औपनिवेशिक चिन्हों के साथ इस शहर ने साहित्य को भी बहुत कुछ दिया है और इसमें सिर्फ रेणु नहीं सतीनाथ भादुड़ी जैसे बड़े बांग्ला लेखक भी हैं. रेणु तो जनमानस में जिंदा हैं पर भुला दिए गए सतीनाथ भादुड़ी को याद कर रहे हैं गिरीन्द्रनाथ झा

फोटोः गिरीन्द्रनाथ झा फोटोः गिरीन्द्रनाथ झा

शहरनामा/ गिरीन्द्रनाथ झा

(पूर्णिया जिले के 250 साल पूरे होने पर सीरीज का पांचवा हिस्सा )

पूर्णिया अंचल को देश-दुनिया में लोग ‘मैला आंचल’ की कथा भूमि के रूप में जानते हैं लेकिन 'मैला आंचल' से पहले सतीनाथ भादुड़ी ने 'ढोड़ाय चरित मानस' लिखकर साहित्य जगत में पूर्णिया का नाम अमर कर दिया. वे बांग्ला में लिखते थे. गूगल सर्च के इस दौर में हम मूल बात तक पहुंचने से बचते हैं लेकिन जब कोई शहर अपने जिला बनने का 250वां उत्सव मनाने जा रहा है, उस वक्त अपने शहर के उस लेखक को उसे याद करना होगा, जिसने पूर्णिया में रहकर बंगला साहित्य को समृद्ध बनाया, जिसने हिंदी साहित्य को फणीश्वरनाथ रेणु दिया. 

पूर्णिया शहर के मध्य में बंगलाबहुल एक मोहल्ला हैः भट्टा दुर्गा बाड़ी. यह मोहल्ला आज भी अपनी परंपराओं और संस्कृति को निष्ठा के साथ संजोेए हुए है. मोहल्ले में आश्विन और चैत्र मास में भगवती दुर्गा की भव्य प्रतिमा का पूजा अनुष्ठान, श्रद्धालुओं की भीड़, उत्सव के मध्य साहित्यिक सम्मेलन औऱ संगीत नृत्य के कलात्मक आयोजन होते हैं. शहर में यह भक्ति, साहित्य और कला की त्रिवेणी है. शहर के इसी मोहल्ले में 27 सितंबर, 1906 को भादुड़ी जी का जन्म हुआ था. 

नई पीढ़ी के लोग सतीनाथ भादुड़ी के नाम से आज भी अनभिज्ञ हैं, जबकि इसी शहर में उनका जीवन बीता, शब्द पके और अक्षरों ने पहचान बनाई. 

पूर्णिया को इस बात का मलाल होना चाहिए कि जिस शख्सियत ने पूर्णिया को पहचान दी उसे पूर्णिया ने कुछ नहीं दिया.

यहां एक बात का उल्लेख करना उचित होगा कि बंगला साहित्य की अनेक कालजयी कृतियों के रचनाकारों की जन्मभूमि बिहार की धरती रही है. देवदास, चरित्रहीन और श्रीकांत जैसे उपन्यासों के रचयिता शरतचंद्र भागलपुर में जन्मे थे. भुवनशोम और भीमपलासी के लेखक बलायचंद्र मुखोपाध्याय उर्फ बनफूल भी वहीं के थे. विभूतिभूषण मुखोपाध्याय दरभंगा के थे. इसी कड़ी में सतीनाथ भादुड़ी का भी नाम आता है. 

आगे चलकर एक लेखक के रूप में और एक राजनीतिज्ञ के रूप में पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित करने के बाद भी भादुड़ी जी ने अपनी जन्मभूमि से नाता नहीं तोड़ा. उनके साहित्य में स्थानीय जनजीवन के चित्रण की प्रामाणिकता कितनी है, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है, जब अनेक विद्वान बिहार में होने वाले सामाजिक राजनीतिक परिवर्तनों की बाबत यह कहते हैं कि इतिहास, समाजशास्त्र की हजार किताबें पढ़कर बिहार के परिवर्तन की गति जितनी समझ में आती है, उतनी अकेले भादुड़ी जी की 'ढोढ़ाय चरित मानस' और 'जागरी' पढ़कर समझ में आती है. 

भादुड़ी जी ने जेल में रहते हुए 'जागरी' उपन्यास की रचना की. 1945 में कोलकाता के प्रज्ञा भारती नामक प्रकाशन से जागरी प्रकाशित हुई थी. बाद में इसका अंग्रेजी और उड़िया भाषा में भी अनुवाद हुआ.

1950 में जागरी को पहला रवींद्र पुरस्कार मिला था. यह बंगला भाषा का पहला उपन्यास है जो 1942 की क्रांति की राजनीतिक और उस वक्त के सामाजिक पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर रचा गया.

जागरी के अलावा उनकी प्रसिद्ध कृतियों में ढोढ़ाय चरित मानस, चित्रगुप्तेर फाइल, सत्तिभ्रमण काहिनी, अपरिचिता आदि है. हिंदी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन भाषा के जानकार भादुड़ी जी सबसे बड़ी खासियत थी कि वे पूर्णिया जनपद की बोली-बानी पर विशेष पकड़ रखते थे. ढोढ़ाय चरित मानस का इसका उदाहरण है. 

आज साहित्य में दलितों के प्रश्न अलग अलग तरीके से सामने आ रहे हैं लेकिन भादुड़ी जी अपने उपन्यास ढोढ़ाय चरित मानस में एक खास समुदाय के चरित्र को नायक बनाया, यह थी उनकी भविष्यदृष्टि.

40 के दशक में लिखा यह उपन्यास दलितों का प्रतिनिधित्व करता है. पूर्णिया की धरती, यहां के लोगबाग, पूर्णिया का प्राकृतिक सौंदर्य, इस उपन्यास को सजीवता और पूर्णता प्रदान करते हैं. इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद मधुकर गंगाधर ने किया है. 

भादुड़ी जी से जुड़ी कई कहानियां पूर्णिया के लोगों के जेहन में है. उन्होंने पूर्णिया में नशाबंदी को लेकर आंदोलन चलाया था साथ ही दुर्गा पूजा में पशुबलि पर रोक लगाने के लिए 1931 में सत्याग्रह किया था. 

एक बार पूर्णिया में रवींद्रनाथ टैगोर का जन्मोत्सव मनाने के क्रम में सभापति के रुप में सतीनाथ भादुड़ी मंच पर थे, तभी आर्किस्ट्रा पार्टी के कलाकारों ने फिल्मी गीत चला दिया. कहते हैं कि भादुड़ी जी ने विरोध करते हुए अपनी चादर उतारकर रवींद्रनाथ टैगोर की तस्वीर ढंक दी औऱ वे मंच से उतर गए. 

भादुड़ी जी ने अपने पिता इंदुभूषण भादुड़ी के नाम पर पुस्कालय की स्थापना की थी. भादुड़ी जी ने जिस घऱ में अंतिम सांस ली, वह घर भी 1966 में बिक गया. यह घर रेणु के गुरु का था, यह घर बंगला साहित्य का गढ़ था. उनकी स्मृति में अब केवल शब्द हैं, हालांकि उनका घर जिस मोहल्ले में उस गली का नाम भादुड़ी लेन कर दिया गया है. 

फरवरी की 14 तारीख को जब पूर्णिया जिला अपनी स्थापना के 250 साल मनाएगा, उस वक्त बंगला साहित्य के बड़े नाम सतीनाथ भादुड़ी जी को भी हमें याद करना होगा, जिन्होंने पूर्णिया को साहित्य-कला के क्षेत्र में बहुत कुछ दिया. दरअसल कुछ व्यक्ति, कुछ संस्थाएं, कुछ इमारतें ऐसी होती हैं, जिनसे शहर की पहचान बनती है, जिन्हें देखकर, यादकर लोगों में एक नई ऊर्जा का संचार होता है. शहर पूर्णिया को भादुड़ी जी के लिए कुछ करना होगा.

(पेशे से किसान और लेखक गिरीन्द्रनाथ झा पूर्णिया के नजदीक चनका नाम के गांव में रहते हैं और ग्राम-सुधार की दिशा में काम कर रहे हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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