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शहरनामाः खेत पूर्णिया का जमींदार यूरोप के

पूर्णिया के जिला बने 250 साल पूरे होने वाले हैं. यहां कई यूरोपियन थे जिनकी जमींदारी थी. वहां नील की खेती भी होती थी. पूर्णिया के वैभवशाली इतिहास पर निगाह डाल रहे हैं गिरीन्द्रनाथ झा

फोटो साभारः पूरैनिया-ए हैंड बुक ऑफ पूर्णिया डिस्ट्रिक्ट फोटो साभारः पूरैनिया-ए हैंड बुक ऑफ पूर्णिया डिस्ट्रिक्ट

शहरनामा/ गिरीन्द्रनाथ झा

(पूर्णिया जिले के 250 साल पूरे होने पर सीरीज )

अंग्रेजी शासन के आरंभ में यूरोप के कई लोग पूर्णिया आए और यहां बस गए. उस वक्त पूर्णिया समचमुच पूरैनिया था, मतलब जंगल ही जंगल. शुरुआती दौर में यूरोपीय लोग शहर के मध्य स्थित सौरा नदी के आसपास बसे, जिसे आज हम रामबाग इलाके के नाम से पहचानते हैं. 

हालांकि बाद में ये सभी यूरोपियन सौरा नदी से पश्चिम की तरफ आने लगे और अपनी कोठी बनाने लगे. देश के अलग-अलग हिस्से में हम जो सिविल लाइंस देखते हैं, वह पूर्णिया में भी था. बस अंतर यही था कि लखनऊ, कानपुर आदि के सिविल लाइंस में अंग्रेज ऑफिसर रहा करते थे तो पूर्णिया में जेंटलमैन फार्मर! 

आज शहरनामा में हम ऐसे ही कुछ अंग्रेज जमींदारों की कहानी सुनाएंगे जो बरसों तक पूर्णिया में रहे, सिविल लाइंस बसाए, कोठी बनाए लेकिन खुद को जेंटलमैन फार्मर कहते रहे. 

पूर्णिया में सबसे अधिक सक्रिय यूरोपियन ज़मीन्दारों में एलेक्ज़ेन्डर जॉन फोर्ब्स और पामर का नाम आता है. एलेक्ज़ेन्डर जॉन फोर्ब्स 1859 ई0 में मुर्शिदाबाद के महाजन बाबू प्रताप सिंह से सुल्तानपुर परगना खरीद कर ज़मीन्दार बना और उसी के नाम पर सुल्तानपुर परगने में फोर्ब्सगंज (फारबिसगंज) नामक शहर बसाया गया. 

लेकिन फोर्ब्स पूर्णिया शहर में रहता था. वह शहर में काफी लोकप्रिय था. रेसकोर्स से लेकर तमाम तरह के क्लब बनाने में उसकी रुचि थी. 

आज शहर में जहां हम बालिका उच्च विद्यालय देखते हैं, उसी परिसर में फोर्ब्स की कोठी हुआ करती थी. वह कोठी गुजरे जमाने में यूरोपियन बाशिदों से गुलजार रहा करती थी. 

कहते हैं कि फ़ोर्ब्स को किसानी का शौक़ था. इसी शौक़ की वजह से उसने सुलतानपुर को चुना और जमकर खेती की. एक सुंदर सा घर बनाया. घर के आगे एक बड़ा सा तालाब, घर के पूरब और पश्चिम में दो तोप, जिसका चबूतरा अभी भी है. इसके अलावा बड़ा सा गराज. कुल मिलाकर एक सुंदर सी कोठी. 

1890 में अलेक्ज़ेन्डर फोर्ब्स और उनकी पत्नी डायना की मृत्यु मलेरिया से हो गयी. समय बदला और फ़ोर्ब्स परिवार ने सुलतानपुर एस्टेट को देश के मशहूर व्यवसायिक घराना जेके सिंघानिया के हाथों बेच दिया क्योंकि उस वक़्त यहाँ जूट की खेती बहुत होती थी. 

फारबिसगंज में भी फ़ोर्ब्स की एक कोठी है. उस घर में जो लोग अब रहते हैं, हमने उनसे भी बात की. पता चला कुछ साल पहले तक फ़ोर्ब्स के पोते और नाती यहाँ आते थे, अपने दादा-नाना के घर देखने, जिसमें एक का नाम एंड्रिल फ़ोर्ब्स था. वह लंदन में कहीं शिक्षक थे.

फोर्ब्स की तरह एक और अंग्रेज पूर्णिया में लंबे वक्त तक रहा, उसका नाम पामर था. उसने यहां के एक राजा की जमींदारी खरीद ली और यहां बस गया. पामर की एकमात्र बेटी, मिसेज डाउनिंग, उसकी उत्तराधिकारिणी हुई. मिसेज डाउनिंग के दो वारिस हुए - उसका बेटा सी. वाइ. डाउनिंग और बेटी मिसेज़ हेज़. 

आज हेज़ साहब का भव्य आवास पूर्णिया कॉलेज का मुख्य भवन है. पामर को लेकर तरह तरह की कहानियां हैं लेकिन उन कहानियों के इतर यह अंग्रेज आज भी पूर्णिया की बोली-बानी में बसा हुआ है. 

दरअसल शहर में एक बांध है जो बाढ़ से शहर की सुरक्षा करता है. शहर के सीमांत में एक इलाका है- बाघमारा. यहीं से लेकर सौरा नदी के समानांतर बांध है, जिसे पामर ने बनवाया था. यह बांध लोगों की जुबान पे पामर बांध के नाम से चढ़ा है. 

ऊपर हमने जिस फोर्ब्स की कहानी सुनाई, उसकी कोठी के सामने भी एक मशहूर नीलहा किसान का घऱ हुआ करता था. कहते हैं कि शहर पूर्णिया में रेसकोर्स इसी किसान ने बनाया. उस अंग्रेज नीलहा किसान का का नाम था – विलियम टेरी. टेरी पर कई आरोप हैं. उसे एक जुल्मी की तरह याद किया जाता है. 

समय का फेर देखिए, टेरी का घर जहां था वहां अब डॉन बॉस्को स्कूल है.

पूर्णिया में नील की खेती सबसे पहले जॉन केली नामक अंग्रेज ने शुरु की. बाद में कई यूरोपियनों ने यहाँ जोर शोर से नील की खेती की. इनमें शिलिंगफ़ोर्ड-वंश सबसे अग्रणी था जिन्होंने नीलगंज, महेन्द्रपुर, भवबाड़ा जैसे जगहों में नीलहा कोठी बनवाया. शिलिंगफ़ोर्ड की कहानी भी खूब रोचक है. वह मशहूर शिकारी था. अभी भी पूर्णिया से धमदाहा की तरफ और सरसी इलाके के तरफ जब हम जाते हैं तो नीलहा किसान की कहानी सुनने को मिलती है.

पूरैनिया से पूर्णिया बनने की कथा में इन अंग्रेज जेंटलमैन फार्मर्स का सबसे अधिक योगदान है. शहर की बसावट को लेकर इन लोगों ने बहुत काम किया. एक तो पूर्णिया बहुत खुला-खुला था, दूर -दूर तक हरियाली. सौरा और कोसी नदी का असर और इन्हीं नदियों की छोटी-छोटी उपधाराएं शहर के आसपास से गुजरती थी. कुल मिलाकार माहौल खूबसूरत था, वैसे ही यह मिनी दार्जिलिंग नहीं कहलाता था. 

ऐसे में अंग्रेजों ने शहर और शहर से दूर सुंदर सुंदर कोठियां बनाई. दार्जिंलिंग के लोरेटो कॉन्वेंट ने 1882 में पूर्णिया में इन्हीं अंग्रेज जेंटलमैन फार्मर के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय की शुरुआत की थी. 

पूर्णिया जिला जो अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करने जा रहा है, उस पूर्णिया की कहानी में जल-जंगल-जमीन सबसे अधिक मुखर है. कई जमींदार हुए, हर 15-20 किलोमीटर पर एक राजा हुए, रजवाड़ों के अंग्रेज मैनेजर हुए. ऐसे में यह शहर, यह अंचल ढेर सारे बदलावों का गवाह रहा. जब हम अंग्रेज और पूरैनिया की बात करते हैं तो पूर्णिया जिला के पहले सुपवाइजर-कलक्टर डुकरैल को जरुर याद करते हैं. डुकरैल के जीवन पर एक खूबसूरत कहानी बिहार सरकार में भू राजस्व विभाग में अधिकारी सुबोध कुमार सिंह ने परती-पलार नाम की पत्रिका में लिखी थी, जिसका शीर्षक है- यह पत्र मां को एक साल बाद मिलेगा.

पूर्णिया को हमें समझने की जरुरत है, यहां की माटी को महसूस करने की जरुरत है. उस पूरैनिया के बारे में हमें समझना-बूझना होगा, जिसके बारे में कहा जाता है-

उत्तर में गिरिराज हिमाला,

दक्षिण  जन-तारिणी गंगा,

पश्चिम कोशी पूरब महानंदा

मिलि सभ जकरा बनबए धाम...

(पेशे से किसान और लेखक गिरीन्द्रनाथ झा पूर्णिया के नजदीक चनका नाम के गांव में रहते हैं और ग्राम-सुधार की दिशा में काम कर रहे हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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