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शहरनामाः मुहब्बत से पगा शहर पूर्णिया

ऐसे समय में जब पूर्णिया में जंगल, धान और मछली के साथ प्रेम भी कम होता जा रहा है, हमें पूर्णिया के उस अंग्रेज कलक्टर को याद करना चाहिए जिसने स्थानीय युवती से प्रेम किया था. वैलेंटाइन डे के दिनों में युवा पीढ़ी को जानना चाहिए कि अपने उस प्रेम में आकर कलक्टर डुकरैल ने किसानों का लगान माफ कर दिया था. 

फोटोः गिरीन्द्रनाथ झा फोटोः गिरीन्द्रनाथ झा

शहरनामा/ गिरीन्द्रनाथ झा

(पूर्णिया जिले के 250 साल पूरे होने पर सीरीज का आठवां हिस्सा )

देश के एक ऐसे जिले की कहानी आज सुनाने का मन है, जिसकी स्थापना वैलेंटाइन डे पर हुई थी. बात 1770 की है, तारीख वही 14 फरवरी. जिले का नाम है, पूर्णिया. शहरनामा की आज की यह कहानी बड़ी दिलचस्प है. संत वैलेंटाइन की आत्मा मानो इस जिले में कहीं विचरण कर रही हो और कह रही हो हैप्पी वेलेंटाइन पूर्णिया, तुम इश्क़ करो, जियो और खूब तरक्की करो !

पूर्णिया जिला 14 फरवरी को 250 साल का हो जाएगा और इन गुजरे ढाई सौ सालों में पूर्णिया की अपनी यात्रा बड़ी रोचक रही है. भले इस कहानी का संत वैलेंटाइन से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन एक मानवतावादी और एक प्रेमी से जरूर उसका संबंध है- क्या पता संत वैलेंटाइन का कोई आर्शीवाद रहा हो. यह आशीर्वाद बदस्तूर आज तक बना हुआ है जल, जंगल, जमीन वाले इस पूर्णिया जिलाे के सिर पर.

पूर्णिया की आज की कहानी के नायक हैं जिला पूर्णिया के पहले सुपरवाइजर कलक्टर गेरार्ड डुकरैल. 

पूर्णिया भारत के सबसे पुराने जिलों में से एक है. हमारे एक मित्र सुशांत झा हैं, जो पेंगुइन इंडिया के हिन्द पॉकेट बुक्स के कमिशिनिंग एडिटर हैं. वे अक्सर बड़े रोचक अंदाज से डुकरैल की कथा सुनाते हैं. 

तो बात यह है कि डुकरैल साहब जब पूर्णिया के कलेक्टर बनकर आए तो यहां घने जंगल थे, पानी खराब था, इलाका अ-स्वास्थ्यकर था और आबादी कम थी. पूर्णिया में उस समय अभी के अररिया, किशनगंज, अधिकांश कटिहार और दार्जिलिंग तक के इलाके शामिल थे! 

उसी समय बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा (सन 1773-74) जिसमें सूबे की एक-तिहाई आबादी मर गई और पूर्णिया की करीब आधी. लोगों ने जान बचाने के लिए पहले जानवर बेचे, फिर जमीन बेची और आखिर में अपने बीवी-बच्चों तक को बेच दिया! डुकरैल ने बड़ी योग्यता से उस हालात में प्रशासन का ढांचा तैयार किया.

उसी समय पास के किसी गांव से एक स्त्री को सती बनाने की खबर आई. डुकरैल घोड़े पर सवार हुआ और उसने उस स्त्री की जान बचाई.

वह स्त्री किसी जमींदार की बहू थी जिसे एक बार डुकरैल ने अपने प्रशासनिक दौरे-के सिलसिले में कभी देखा था. दरअसल उस गांव के किसानों ने जमींदार से लगान माफ करने की प्रार्थना की थी. अकाल का समय था, किसान बिलख रहे थे. डुकरैल का उन्हीं दिनों उस गांव में जमींदार के आवास पर रात्रि विश्राम हुआ जहां किसानों ने अपनी व्यथा उसे सुनाई. डुकरैल ने बहुत हद तक लगान माफ कर दिया. वहीं उसने दरवाजे की ओट से ताकती एक जोड़ी सूनी, पथराई आंखें देखी थीं. 

उस समय डुकरैल को उसे पहचान नहीं पाया कि वो कौन है. 

दो दिन बाद सौरा नदी के तट पर एक भीड़ एक स्त्री को घेरकर जा रही थी, नारे लग रहे थे और ढोल-नगाड़े बज रहे थे. स्त्री बिलख रही थी और जान बचाने की भीख मांग रही थी. डुकरैल को पता चला कि वह भीड़ स्त्री को सती बनाने ले जा रही है. वह नदी में कूदकर उस पार पहुंचा और अपने पिस्तौल से फायर कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया. 

लोगों ने थोड़ा प्रतिरोध किया लेकिन ये वो दौर था जब हिंदुस्तान में अंग्रेजी इकबाल कायम होने लगा था और एक गोरा और वह भी गोरा अफसर सैकड़ों हिंदुस्तानियों के मन में भय पैदा करने के लिए काफी था.  

डुकरैल कंवारा था, इंग्लैंड में उसकी विधवा मां उसके लिए किसी लॉर्ड की बेटी का रिश्ता ढ़ूंढ रही थी. लेकिन वह सामान्य घर का था इसलिए उसे एक तरह से सुदूर हिंदुस्तान के मलेरिया ग्रस्त इलाके में पोस्टिंग पर भेज दिया गया था. 

डुकरैल ने उस सती बनाई जा रही जमींदार की विधवा बहू से शादी कर ली और दोनों कई बच्चों के मां-बाप बने. रिटायर होने के बाद डुकरैल उसे लेकर लंदन चला गया. जिसकी कहानी कई सालों बाद तालिब अली नाम के एक भारतीय यात्री ने लिखी. 

यह घटना उस समय की है जब सती प्रथा के खिलाफ कानून नहीं बना था और विलियम बेंटिक और राजा राममोहन राय का शायद जन्म भी नहीं हुआ था. लेकिन लोगबाग डुकरैल को भूल गए.

पूर्णिया निवासी और ऑक्सफोर्ड में पढ़ा चुके इतिहासकार डॉ रामेश्वर प्रसाद, जिन्होंने पूर्णिया की स्थापना पर शोध किया था, ने बिहार सरकार से आग्रह किया कि पूर्णिया में डुकरैल के नाम पर कम से कम सड़क का नाम होना चाहिए. डुकरैल के जीवन पर एक खूबसूरत कहानी बिहार सरकार में भू राजस्व विभाग में अफसर सुबोध कुमार सिंह ने 'परती-पलार' नामकी एक पत्रिका में (जनवरी-जून 2013 अंक) में लिखी थी, जिसका शीर्षक है- "यह पत्र मां को एक साल बाद मिलेगा".

डुकरैल के नाम पर अररिया जिले में एक गांव है जो अपभ्रंश होकर डकरैल बन गया है. ये वही गांव है जहां उस दुर्भिक्ष के समय बतौर कलेक्टर डुकरैल ने कर माफ कर दिया था और जिस के जमींदार की बहू उसकी पत्नी बनी थी. वैलेंटाइन डे के दिन ही डुकरैल पूर्णिया का कलेक्टर बनकर आया था 

आज पूर्णिया बदल चुका है, जंगल कम हो गए हैं, सौरा नदी सिमट गई है लेकिन इन सबके बावजूद पूर्णिया अपने पुरैनिया को बचाकर रखे हुए है. ऐसे वक्त में जब प्रेम हम सबके बीच से गायब  होता जा रहा है, ऐसे समय में पूर्णिया जिला के पहले सुपरवाइजर कलक्टर डुकरैल की कथा हम सबको सुनानी चाहिए. डुकरैल ने प्रेम में पड़कर वाकई वह काम किया जिससे संत वेलेंटाइन की आत्मा बहुत खुश हुई होगी! हैप्पी वैलेंटाइन डे! 

(पेशे से किसान और लेखक गिरीन्द्रनाथ झा पूर्णिया के नजदीक चनका नाम के गांव में रहते हैं और ग्राम-सुधार की दिशा में काम कर रहे हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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