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ग्वालियर में समर्पण नाट्य उत्सव

इस 1 और 2 फरवरी को ग्वालियर में ‘समर्पण थिएटर फेस्टिवल 2021’ का आयोजन किया गया. ग्वालियर के मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय के थिएटर-ग्रेजुएट प्रमोद पाराशर ने यह फेस्टिवल ‘भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान’ के सहयोग से और उन्हीं के प्रेक्षागृह में आयोजित किया.

ग्वालियर में 1 और 2 फरवरी को ‘समर्पण थिएटर फेस्टिवल 2021’ का आयोजन हुआ ग्वालियर में 1 और 2 फरवरी को ‘समर्पण थिएटर फेस्टिवल 2021’ का आयोजन हुआ
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान के निदेशक आलोक शर्मा इस आयोजन के उत्प्रेरक की भूमिका में थे
  • पहली प्रस्तुति ‘पार्क’ में पार्क की एक बेंच पर बैठने का झगड़ा है
  • दूसरे दिन की प्रस्तुति ‘रोमियो जूलियट’ दुश्मन खानदानों में पनप गई एक मोहब्बत की कथा है

इस 1 और 2 फरवरी को ग्वालियर में ‘समर्पण थिएटर फेस्टिवल 2021’ का आयोजन किया गया. इसमें लॉकडाउन लागू होने के साल भर बाद पहली बार कोई नाटक देखना नसीब हुआ. ग्वालियर के मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय के थिएटर-ग्रेजुएट प्रमोद पाराशर ने यह फेस्टिवल ‘भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान’ के सहयोग से और उन्हीं के प्रेक्षागृह में आयोजित किया. संस्थान के निदेशक आलोक शर्मा इस आयोजन के उत्प्रेरक की भूमिका में थे. मानसिंह तोमर कला एवं संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना हुए यूं तो दो दशक गुजर चुके हैं, पर रंगमंच के हलकों में इसकी ज्यादा चर्चा तब हुई जब कुछ साल पहले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स्नातक योगेन्द्र चौबे यहां रंगमंच विभाग के प्रमुख बनकर गए. उसी दौरान ऊर्जा का कुछ ऐसा संचार हुआ कि इस बीच यहां से पास होकर निकले रंगकर्मियों की एक अच्छी-खासी टोली आज मुखर ढंग से ग्वालियर में सक्रिय है, जिसकी बानगी फेस्टिवल के प्रमोद पाराशर निर्देशित दो नाटकों में देखने को मिली.

पहली प्रस्तुति ‘पार्क’ में पार्क की एक बेंच पर बैठने का झगड़ा है. अलग-अलग कारणों से नाटक के तीनों पात्र एक ही खास जगह पर बैठना चाहते हैं. अपने को सही साबित करने के लिए वे यहूदी, इजराइल और कश्मीर आदि का उदाहरण देते हैं. इस तरह झगड़े की मार्फत विस्थापन और बेदखली का डिस्कोर्स नाटक में खोंस दिया गया है. एक ही दृश्य-स्थिति, सतत मौजूद तीन पात्र, और बेंच का झगड़ा—यह है इस घटनाविहीन और शब्दबहुल नाटक का कुल ढांचा. रंगकर्मी आसान मंचीय ढांचे के कारण इसे बार-बार खेलते जरूर हैं, पर इसकी नाटकीयता वैसी आसान नहीं है. मैंने इस नाटक की तीन-चार प्रस्तुतियां पहले भी देखी हैं, लेकिन यह प्रस्तुति इस नाटकीयता को ज्यादा अच्छी तरह पहचान पाई है. इसके किरदारों में अपने मूड की शिद्दत कहीं ज्यादा है. अपनी जिद या खब्त में वे न सिर्फ ज्यादा अलग-अलग दिखाई देते हैं बल्कि उनका संघर्ष एक रोचक हाथापाई तक जा पहुंचता है. तीनों में से स्कूल मास्टर बने सौरभ शर्मा का गुस्सा देखने लायक है. वह बेंच पर बैठे पात्र को टांग से उठाकर गिरा देने पर आमादा है. इस तरह पात्रों की नीरस होती जा रही बहस के बीच लड़ाई का यह दिलचस्प ऐक्शन दृश्य है. इसी तरह नींद में खलल पड़ने से डिस्टर्ब तीसरे पात्र का पारा चढ़ गया है और वह विंग्स में से जाकर एक डंडा उठा लाया है. इस तरह यह डंडा भी एक किरदार बन गया है, जो बाद में खुद को जीनियस समझने वाले पात्र के काम आता है. डंडा ले आया किरदार बाद में किसी बालसुलभ वजह से नजरें भी चुरा रहा है. बाकी दोनों पात्रों की बहस से ऊबे इस पात्र को मोनू गुर्जर ने अच्छे से अंजाम दिया है. दरअसल उनकी बहस थोड़ी देर बाद बेबात की बात या बाल की खाल निकालने जैसी मालूम देने लगती है. लेकिन निर्देशक प्रमोद पाराशर ने मानव कौल के इस नाटक में पात्रों के जुझारू तेवरों से उसे दिलचस्प बनाए रखा है. उनकी परस्पर रस्साकशी करीब पौने दो घंटे की इस प्रस्तुति के दर्शकों को ध्यान छिटकने की मोहलत नहीं देती.

दूसरे दिन की प्रस्तुति ‘रोमियो जूलियट’ भी प्रकाश व्यवस्था की कुछ त्रुटियों को छोड़कर लगभग प्रोफेशनल कलेवर में थी. यह नाटक दो दुश्मन खानदानों में पनप गई एक मोहब्बत की कथा है, जिसमें एक ओर हत्याएं और इंतकाम है, दूसरी ओर अपराधबोध और इलहाम, और आखिरकार ये सारी चीजें एक ट्रैजेडी में अंजाम पाती हैं. इस क्रम में प्रस्तुति कई जुदा स्थितियों वाले एक कठिन दृश्य-विधान से होकर गुजरती है. पहले ही दृश्य में एक कॉमिक सिचुएशन के ठीक बाद हत्या घटित होती है, जिसमें पहले तो दोनों पक्षों के डरपोक सिपहसालार खोखली सूरमागिरी पर उतारू हैं लेकिन फिर स्थिति अचानक बदलती है और रोमियो एक मुठभेड़ में जूलियट के भाई को मार देता है. इस तरह जुदा सिचुएशन्स और ढेर सारे पात्रों वाला यह क्लासिक नाटक नए निर्देशक के लिए एक चुनौती पेश करता है. इसमें कोई हथकंडा काम नहीं कर सकता, क्योंकि यहां मोहब्बत और ग़ैरत या इंतकाम और दर्द सब अपने क्लासिक रूपों में हैं. ऐक्टिंग ऐसे नाटकों में और ज्यादा सीरियस मसला हो जाती है, क्योंकि चरित्र का फ्रेम ज्यादा कसा हुआ होने से कोई भी चूक यहां बहुत जल्द उजागर हो जाती है. इस लिहाज से निर्देशक का दृश्यों की विविधता और ऐक्टिंग दोनों पर ही ठीक से नियंत्रण बना रहा है. दिखाई देता है कि तलवारबाजी और कोरियोग्राफी पर काफी मेहनत की गई है. लेकिन प्रस्तुति का ट्रंप कार्ड है उसके कास्ट्यूम्स, जिन्हें मानसिंह तोमर यूनिवर्सिटी के फैशन डिजाइनिंग के छात्रों देशराज यदुवंशी और प्रियंका तोमर ने तैयार किया है. कास्ट्यूम ही हैं जिनसे प्रस्तुति का परिवेश बनता है, और ये यकीनन अपनी ऐतिहासिकता में भी काफी नवीनता लिए हुए हैं. प्रमुख भूमिकाओं में विशाल कर्ण, कनिका सैनी, धीरज सोनी, अशोक सेंगर, रुचि सचान, वैशाली मिश्रा, ऋषभ शुक्ला और उपेन्द्र सिंह रावत भी मंजे हुए अभिनेता साबित हुए हैं.  

इस मौके पर रायगढ़ यूनिवर्सिटी से आए वहां के रंगमंच विभाग के प्रमुख योगेन्द्र चौबे ने अपने उद्बोधन में लोक से सीखने की बात कही. उन्होंने कहा कि जो शास्त्र में नहीं है वह लोक में होता है, इसलिए रंगमंच के छात्रों के लिए लोककलाओं को जानना बहुत अहम है. नाटकों के अलावा गौरीप्रिया सोमनाथ के निर्देशन में भरतनाट्यम की नाट्य प्रस्तुतियां और विराज सिंह तोमर द्वारा कथक की प्रस्तुति भी आयोजन में शामिल थीं. बुद्धिजीवी और पत्रकार प्रमोद भार्गव ने दशावतार की अवधारणा को जैविक विकास के वैज्ञानिक सिद्धांतों से जोड़ते हुए व्याख्यान दिया.

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