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अवसाद मिटाने की दवा है संगीत: पंडित पारसनाथ

बनारस घराने के युवा बांसुरी वादक पंडित पारसनाथ का विश्वास है कि संगीत अवसाद मिटाने की दवा है. इसमें बांसुरी की धुनें भी हैं जो संगीत प्रेमियों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है.

पंडित पारसनाथ (फोटोः नवीन कुमार) पंडित पारसनाथ (फोटोः नवीन कुमार)

बनारस घराने के युवा बांसुरी वादक पंडित पारसनाथ का विश्वास है कि संगीत अवसाद मिटाने की दवा है. इसमें बांसुरी की धुनें भी हैं जो संगीत प्रेमियों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है. भगवान कृष्ण की बांसुरी जब बजती थी तो लोग मोहित हो जाते थे. वैसी ही जादुई आवाज आज हम पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी से सुनते हैं.

इस कोरोना महामारी के समय में बहुत सारे लोग अवसाद में भी घिरे हुए हैं. पारसनाथ कहते हैं, "एक संगीतज्ञ के नाते मेरे पिता पंडित अमरनाथ ने राग चंद्र कोष में संगीत की रचना की जो इंसान को अवसाद से दूर करता है." पारसनाथ कहते हैं, "अपने पिता से प्रेरित होकर मैं भी संगीत के जरिए लोगों को पॉजिटिव करने की कोशिश कर रहा हूं. पिछले दिनों ही लंदन में दुनियाभर के संगीतज्ञों ने अपनी प्रस्तुति दी और मैंने भी लोगों को कष्ट से दूर करने के लिए राग बैरागी में अपनी प्रस्तुति दी. मुझे विश्वास है कि सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा और पहले की तरह जिंदगी हो जाएगी."

पारसनाथ ने अपने पिता अमरनाथ से बांसुरी वादन में बनारस घराने की संगीत की शिक्षा ली और विरासत में मिले इस संगीत को आगे बढ़ा रहे हैं. पारसनाथ के शब्दों में, "लॉकडाउन में इंसानी गलतियों के बारे में पता चला. प्रकृति का दोहन हो रहा है. लेकिन प्रकृति अपने तरह से बदलती है. देखिए महामारी फैली है. इस दौरान सबसे दुख की बात यह भी रही कि गरीब लोग जान बचाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर भरी दोपहरिया में भी चले." पारसनाथ सकारात्मक सोच रखते हैं. इसलिए वे मानते हैं कि सब कुछ बदलेगा. ऐसे समय में लोग ज्यादा संगीत सुनें.

क्या शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है? इस पर पारसनाथ कहते हैं, "मैं ऐसा नहीं मानता. मेरे हिसाब से हिंदुस्तान के घर-घर में शास्त्रीय संगीत है. युवा पीढ़ी खूब पसंद करती है. मुझसे शास्त्रीय संगीत सीखने वालों में युवा ज्यादा हैं. हिंदुस्तान की पहचान शास्त्रीय और लोक संगीत से है. महान संगीतज्ञ पंडित रविशंकर ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को पूरी दुनिया में फैलाया."

ऐसा कहा जाता है कि पंडित रविशंकर फ्यूजन पर ज्यादा ध्यान देते थे? पारसनाथ ऐसा मानने से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "उनकी संगीत जीवन गाथा पर बोलने के लिए मैं बहुत छोटा हूं. लेकिन उन्होंने जिस तरह से दुनियाभर में लोगों को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का दीवाना बनाया उसकी कल्पना नहीं की जा सकती." पारसनाथ स्वीकार करते हैं कि शास्त्रीय संगीत को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए फ्यूजन अच्छा साधन है. वे बताते हैं, "मैंने जर्मनी में संगीत के एक समारोह में हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व किया था. वहां मैंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और बनारस घराने की मिट्टी की खुशबू बरकरार रखी थी. हम अपनी मिट्टी को कैसे छोड़ सकते हैं."

पारसनाथ ने 'ओ माय गॉड', 'सरबजीत', 'दंगल', 'तारे जमीन पर', 'पैडमैन' जैसी फिल्मों में बांसुरी वादन और बैकग्राउंड म्यूजिक दिया है. फिल्मी संगीत में शास्त्रीय संगीत को कितना महत्व मिलता है? पारसनाथ के शब्दों में, "मैं फिल्म संगीत को बहुत एंज्वॉय करता हूं. इसे बनाने में फिल्म के कई क्षेत्रों को ध्यान में रखा जाता है. इसलिए फिल्म संगीत में 10 से 20 फीसद ही शास्त्रीय संगीत होता है और उसकी आत्मा बरकरार रहती है." पारसनाथ मानते हैं कि वे जो भी संगीत बजाते हैं उसमें बनारस की मिट्टी की खुशबू रहती ही है. 'ओ माय गॉड' में मॉडर्न कृष्ण के रूप में अक्षय कुमार बांसुरी बजाते हैं जिसे लोगों ने पसंद किया है. इससे पहले 'हीरो' फिल्म में बांसुरी की धुनों पर लोग मोहित हुए थे. उसमें महान संगीतज्ञ पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने बांसुरी बजाई थी. उस धुन पर आज भी लोग मदमस्त हो जाते हैं. लोगों ने पारसनाथ के बांसुरी वादन को भी 'ओ माय गॉड' में सराहा.

क्या पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ बांसुरी पर संगत करने की इच्छा है? पारसनाथ नम्र भाव से अपनी भावना व्यक्त करते हैं, "भगवान कृष्ण ने बांसुरी को प्रचारित किया, उनके बाद पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने. बांसुरी की किताब के पहले पन्ने पर पंडित हरिप्रसाद चौरसिया का नाम है. उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी के लिए कार्य किया है. मैं उनके सामने बहुत छोटा हूं. उनसे संगत की बात सोच नहीं सकता. मगर मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि उन्हें मेरा नाम याद है."

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