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स्मृतिः अंति‍म सांस तक पिता की विरासत को सहेजते रहे लक्ष्‍मीनारायण गर्ग

हास्यकवि पद्मश्री स्वर्गीय काका हाथरसी के ज्‍येष्‍ठ पुत्र लक्ष्‍मीनारायण गर्ग इस फानी दुनिया से महाप्रयाण कर गये.

लक्ष्मीनारायण गर्ग लक्ष्मीनारायण गर्ग

राजेन्‍द्र शर्मा

हास्यकवि पद्मश्री स्वर्गीय काका हाथरसी के ज्‍येष्‍ठ पुत्र लक्ष्‍मीनारायण गर्ग इस फानी दुनिया से महाप्रयाण कर गये. आम जनमानस काका हाथरसी को हास्‍य कवि के रुप में जानता पहचानता है, बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि काका हाथरसी जिनका वास्‍तविक नाम प्रभुदयाल गर्ग था, ने शास्‍त्रीय संगीत, जो एक दौर में राजा-महाराजाओं के दरबारों तक सीमित था, को जनमानस तक पहुंचाने के लिए  “संगीत” नामक पत्रिका का प्रकाशन 1934 में शुरु किया था जो आज तक निर्बाध रुप से जारी है.

काका हाथरसी की इस विरासत को उनके ज्‍येष्‍ठ पुत्र लक्ष्‍मीनारायण गर्ग लगभग सत्‍तर वर्ष से संभाले थे.  गौरतलब है कि वर्ष 1955 से संगीत पत्रिका के प्रधान संपादक का गुरुत्‍तर दायित्‍व लक्ष्‍मी नारायण गर्ग के कंधों पर ही था.

अपने पिता प्रभुदयाल गर्ग ( हास्यकवि काका हाथरसी) के घर-आंगन में 29 अक्‍टूबर, 1932 को जन्‍मे बालक लक्ष्मीनारायण पर पिता के संगीत प्रेम की ऐसा प्रभाव पडा कि संगीत की विधिवत शिक्षा पाँच वर्ष की नन्‍ही उम्र से प्रारंभ कर दी थी.

हाथरस के श्रेष्ठ तबला-वादक पंडित लोकमान और पंडित  हरिप्रसाद से तबला-वादन सीखने के साथ साथ  कुछ अन्य प्रतिष्ठित गुरुओं से हारमोनियम, वायलिन, नृत्य की शिक्षा प्राप्त  करने  के बाद लक्ष्मीनारायण ने जयपुर के पंडित शशिमोहन भट्ट से सितार-वादन  की शिक्षा ली. 1954 में पंडित रविशंकर ने लक्ष्‍मीनारायण की सितार वादन में रुचि को देखा तो उन्‍हें अपना शिष्‍य बनाने में देर नही लगायी. उन दिनों लक्ष्‍मीनारायण दिल्ली में बंगाली मार्केंट और पटौदी हाउस स्थित पंडित रविशंकर के घर संगीत सीखने जाया करते थे. करीब दो वर्ष बाद पंडित रविशंकर के अमेरिका चले गये परन्‍तु लक्ष्‍मीनारायण कहां मानने वाले थे. लक्ष्‍मीनारायण 1962 में मुंबई चले गए. वहां पंडित रविशंकर की पत्नी अन्नपूर्णा देवी से उन्होंने सितार सीखा.

डॉ॰लक्ष्मीनारायण गर्ग वर्ष 1966 से 1968 तक ऑल इंडिया रेडियो, नई दिल्ली के ऑडिशन बोर्ड के सदस्य रहे. डॉ॰ लक्ष्मीनारायण को बृज संस्कृति से आत्‍मीय लगाव  था. अपने इस लगाव के कारण ही उन्‍होनें "'जमुना किनारे"' नामक फिल्म का निर्माण, निर्देशन और संगीत निर्देशन किया.

अपना संपूर्ण जीवन शास्‍त्रीय संगीत को समर्पित करने वाले डॉ॰लक्ष्मीनारायण ने 150 से भी अधिक पुस्तकों का लेखन, भाषांतर तथा सम्पादन किया है, जिनमें से "हमारे संगीत रत्न" और "कत्थक नृत्य" नामक पुस्तकें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत हो चुकी हैं. सन 1998-99 में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (संस्कृति विभाग) द्वारा उन्‍हें संगीत-लेखन के क्षेत्र में "सीनि‍यर फेलोशिप " प्रदान की गयी और सन 2008 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा "भरतनाट्यम" पुस्तक के लिए पुरुस्‍कृत किया गया. डॉ॰लक्ष्मीनारायण ने देश में ही देश के बाहर हांगकांग, अमेरिका, जापान. थाईलैंड, सिंगापुर तथा कनाडा आदि देशों में शास्‍त्रीय संगीत संबधी व्‍याख्‍यान किये.

डॉ॰लक्ष्मीनारायण का मानना था कि शास्‍त्रीय संगीत आनंद भर के लिए नही है अपितु शास्‍त्रीय संगीत से असाध्य रोगों का इलाज संभव है. ”संगीत से रोग चिकित्सा” नामक अपनी पुस्‍तक में ध्वनि, स्वर व राग से तमाम बीमारियों के इलाज के बारे में बताते हुए म्यूजिकथेरेपी, पिंडा उत्पत्ति, ध्वनि की उत्पत्ति, संगीत  चिकित्सीय प्रभाव, राग चिकित्सा, रोगों में स्वरों का प्रयोग, रोग चिकित्सा में संगीत का प्रभाव आदि की विस्तृत जानकारी दी गई है. इस पुस्‍तक की भूमिका पतांजलि योगपीठ के अध्यक्ष स्वामी बालकृष्ण ने लिखी है.

डॉ॰लक्ष्मीनारायण सत्‍तर बरस तक अपने पिता के लगाये बिरवे को बिना किसी विज्ञापन के पालते पोसते रहे और आज स्थिति यह है कि शास्‍त्रीय संगीत विषयक कोई छात्र शोध करना चाहें तो उसका शोध  “संगीत” पत्रिका के अंको का पढे बिना संभव ही नही है. हाथरस जैसे कस्‍बेनुमा शहर की डॉ॰लक्ष्मीनारायण ने अपने कृतित्‍व से राष्‍ट्रीय अंर्तराष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहचान कायम की है, इसके लिए हाथरस की धरती उनकी आभार रहेगी.

(राजेन्‍द्र शर्मा उत्‍तर प्रदेश वाणिज्‍य कर विभाग में वाणिज्‍य कर अधिकारी के पद पर नोएडा में कार्यरत हैं.)

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