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कॉमेडी मैं पहली बार कर रही हूं: फातिमा सना शेख

दंगल गर्ल फातिमा सना शेख इन दिनों अपनी दो फिल्मों को लेकर चर्चा में हैं. एक है 'सूरज पे मंगल भारी' तो दूसरी 'लूडो' है.

फातिमा सना शेख फातिमा सना शेख
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सना की दो फिल्में, 'सूरज पे मंगल भारी' और 'लूडो', रिलीज होने जा रही हैं
  • ये दोनों कॉमेडी जॉनर की फिल्में हैं
  • सना पहली बार कॉमेडी कर रही हैं तो सेट पर नर्वस थीं

दंगल गर्ल फातिमा सना शेख इन दिनों अपनी दो फिल्मों को लेकर चर्चा में हैं. एक है 'सूरज पे मंगल भारी' तो दूसरी 'लूडो' है. ये दोनों फिल्में कॉमेडी जॉनर की होने से फातिमा को भरोसा है कि इन फिल्मों को देखकर लोग लॉकडाउन की वजह से अगर किसी तरह के तनाव में होंगे या परेशान होंगे तो उससे वो थोड़ा निजात पा लेंगे. फातिमा ने नवीन कुमार के साथ इन फिल्मों के अलावा और भी मुद्दों पर बातचीत की, पेश हैं मुख्य अंश:

लॉकडाउन के दौरान आप किस तरह समय गुजार रही हैं?

मेरे लिए अच्छी बात यह रही कि मैं लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से धर्मशाला आ गई थी. यहां मैं अपने परिवार के साथ हूं और दोस्तों के साथ समय बिता रही हूं. धर्मशाला में आबादी कम है. इसलिए यहां कोरोना के केस कम हैं. मैं भी कोरोना से बचने के लिए शुद्ध देसी काढ़ा पी रही हूं.

आपकी दो फिल्में, 'सूरज पे मंगल भारी' और 'लूडो', रिलीज होने जा रही हैं. 'सूरज पे मंगल भारी' में क्या कर रही हैं आप?

'सूरज पे मंगल भारी' में मैं मनोज वाजपेयी की बहन का रोल कर रही हूं. यह घरेलू और सिंपल महाराष्ट्रीयन लड़की है. उसकी एक अलग जिंदगी है जो उसके भाई और घर वालों को पता नहीं है. वो छुपकर दूसरी लाइफ जी रही है. बेसिकली ये उसका कैरेक्टर है.

आपके अपोजिट दिलजीत दोसांझ हैं. उनके साथ आपने किस तरह से अपना समीकरण बिठाया?

वो बहुत ही अच्छे ऐक्टर हैं. थोड़े शर्मिले से हैं, सो हीरोइन से ज्यादा घुलते-मिलते हैं नहीं. पर जब ऐक्टिंग करते हैं तो बहुत ही अलग किरदार हो जाता है उनका. उनके साथ काम करके बहुत अच्छा लगा. हां, कभी-कभार वो मजाक भी करते थे.

मनोज वाजपेयी और दिलजीत दोसांझ दोनों अलग-अलग मूड के कलाकार हैं. उनके साथ कितना सहज रहीं आप?

मुझे तो बहुत मजा आया दोनों के साथ काम करके. मनोज सर तो बेहतरीन ऐक्टर हैं. वो अपना हर रोल बेहतरीन और अलग करते हैं. मैं उनके साथ बैठती थी तो उनसे सवाल ही पूछती रहती थी कि आपने वो रोल कैसे किया. आधा समय मनोज सर के साथ ऐसे ही बीता.

उनसे ऐक्टिंग के कुछ नुस्खे पाया आपने?

वो वर्षों से काम करते आ रहे हैं. उनके अप्रोच बहुत अलग हैं. हर इंसान और हर ऐक्टर का अपना अप्रोच होता है. दूसरे का अप्रोच अपने लाइफ में एप्लाय करना बहुत मुश्किल है.

'सूरज पे मंगल भारी' और 'लूडो' में किस तरह की कॉमेडी है?

'सूरज पे मंगल भारी' में सिचुएशनल कॉमेडी है तो 'लूडो' में डार्क कॉमेडी है. मैं पहली बार कॉमेडी कर रही हूं तो सेट पर नर्वस थी. इसके लिए मैंने कोई तैयारी नहीं की. 'सूरज पे मंगल भारी' में अनू कपूर की टाइमिंग बहुत अच्छी है. मनोज सर ने भी कमाल किया है. दिलजीत की भी अच्छी है. सेट पर सबके साथ अलग किस्म की एनर्जी रहती है. सेट पर मजाक करते हैं तो वो सीन में भी आने लग जाता है.

'दंगल' के बाद इस तरह के रोल में खुद को किस तरह से फिट किया?

वही तो मजा है. एक ही तरह के रोल करते रहोगे तो बोर नहीं हो जाओगे. लोगों को लगता है कि कॉमेडी आसान है. पर बहुत मुश्किल है. लोगों को हंसाना सबसे मुश्किल काम है. हर कैरेक्टर का अपना ही मजा है. हर कैरेक्टर की अपनी जर्नी होती है. मजेदार कैरेक्टर था तभी मैंने हां बोला.

कमल हासन, आमिर खान, मनोज वाजयेपी जैसे बड़े कलाकारों के साथ काम करना आसान होता है या परेशान होना पड़ता है?

बिल्कुल परेशानी की बात नहीं है. जितने भी बड़े ऐक्टर्स के साथ मैंने काम किए हैं वो सभी बहुत ही प्रोफेशनल और बहुत ही अच्छे ऐक्टर हैं. वो स्टार हैं और वो जानते हैं कि सामने वाला नर्वस हो सकता है. बहुत कोशिश करते हैं कि आपको अच्छा फील कराएं. मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई बल्कि अच्छा ही अनुभव मिला है.

'दंगल' के बाद आप गिनी चुनी फिल्मों में ही काम कर रही हैं?

'दंगल' के बाद मुझे जो भी फिल्में मिली उसमें से कुछ के बनने में टाइम लगा तो कुछ छूट गई. फिर कोरोना के कारण लॉकडाउन भी हो गया. टाइम लाइन का मेरे ऊपर कंट्रेल था ही नहीं. अब जब हम पीछे मुड़के देखते हैं तो अच्छा इतने साल में इतना ही काम किया.

आपकी तरफ से कोशिश रहती है कि ए ग्रेड की फिल्में की जाए?

कोशिश रहती है कि अच्छे लोगों के साथ काम किया जाए. अच्छी स्क्रिप्ट में काम करूं. बाकी तो ऊपर वाले की देन है. हिट और फ्लॉप अपने हाथ में नहीं होता है.

'दंगल' के बाद 'लूडो' में आप और सान्या मल्होत्रा साथ हैं?

असल में फिल्म में हमारा साथ में काम नहीं है. हमने साथ में एक शॉट किया है उसके अलावा कुछ नहीं है.

कोरोना काल में ओटीटी का क्रेज बढ़ा है. थिएटर और ओटीटी प्लेटफार्म को आप किस तरह से देखती हैं?

थिएटर की अपनी नॉवेल्टी है. ऐसे लग रहा है कि आप बाहर जा रहे हो, कपड़े पहन रहे हो. परिवार के साथ जाते हैं तो एक इवेंट बन जाता है. ओटीटी पर अपने समय के हिसाब से जो चाहो जब चाहो देख सकते हो. दोनों की अपनी अपनी ब्यूटी है. एक ऐक्टर के तौर पर फिल्म में जो नहीं कर सकते हैं वो ओटीटी में करने की आजादी मिलती है. ओटीटी में अपने को ज्यादा एक्सप्लोर कर सकते हैं. पर ऐक्टिंग तो ऐक्टिंग है चाहे आप कहीं पर करें, मेहनत तो उतनी ही है, काम उतना ही है.

लॉकडाउन के दौरान बॉलीवुड में कई तरह के विवाद पैदा हुए. लोग बॉलीवुड को अलग नजरिए से भी देखने लगे हैं. इससे आप जैसे कलाकारों पर किस तरह का असर पड़ता है?

कुछ असर नहीं पड़ता. ये जो भी बातें हो रही हैं, कोरोना खत्म होगा इंसान भूल जाएगा. लोग अपने काम में बिजी हो जाएंगे. खाली बैठे लोगों के पास अभी समय बहुत है जिसमें कई बातें आईं. कुछ करने को टाइम नहीं था इसलिए इतना डिस्कशन हो रहा है. लेकिन अब काम शुरू हो रहा है. लोग शूटिंग करने लगे हैं, विवाद भी ठंडे पड़ने लगे हैं.  

आगे किस तरह की फिल्में करना चाहती हैं?

अलग-अलग किस्म की फिल्में करनी हैं. अलग-अलग किस्म के रोल करने हैं. अलग-अलग किस्म के लोगों के साथ काम करना है. संजय लीला भंसाली, राजू हिरानी और फिर से अनुराग बासु के साथ काम करना चाहूंगी. लिस्ट तो बहुत बड़ी है. कभी न कभी मौका मिल जाएगा. 

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