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नहीं रहे विजेश जोशी, ढह गया सहारनपुर के रंगमंच का स्‍तम्‍भ

सहारनपुर के रंगकर्मी विजेश जोशी का 25 मई की दोपहर को निधन हो गया. जोशी के निधन से सहारनपुर के रंगमंच का बडा स्‍तम्‍भ ढह गया है .

विजेश जोशी नहीं रहे विजेश जोशी नहीं रहे

राजेन्‍द्र शर्मा

सहारनपुर के रंगकर्मी विजेश जोशी का 25 मई की दोपहर को निधन हो गया. जोशी के निधन से सहारनपुर के रंगमंच का बडा स्‍तम्‍भ ढह गया है.

29 अप्रैल 1951 को रंगकर्मी पिता आरआर जोशी के ज्येष्ठ पुत्र के रुप में जन्मे विजेश जोशी किसी संस्थान से प्रशिक्षित रंगकर्मी नहीं है, इसके बावजूद अभिनय, निर्देशन, लेखन, मेकअप, मंच सज्जा में विजेश जारी की दक्षता रही है. हो भी क्यों न, आईटीसी में कार्यरत उनके पिता आरआर जोशी स्वयं एक रंगकर्मी थे. 

पिता के सानिध्य में विजेश जोशी ने दस बरस की उम्र में आई टी सी ड्रामाटिक क्लब में मंचित नाटक आस्तीन का सांप में बाल कलाकार की भूमिका निर्वाह कर अपने रंगमंचीय जीवन की शुरुआत की थी. उसके बाद तो नाटकों में अभिनय करने का सिलसिला चल निकला. 

हर भूमिका में अपना सौ फीसदी झोंक कर उस भूमिका को सजीव बना देने वाले जोशी को उनकी अभिनय क्षमता के बल पर ही वर्ष 1971 में बीस बरस की उम्र में आई टी सी ने नौकरी की पेशकश की ,जिसे विजेश जोशी ने स्वीकारा किन्तु पढाई जारी रखी .
इसी बीच मध्यजवर्गीय परिवारों की जड मानसिकता कि 1975 में विजेश जोशी का विवाह मृदुल शर्मा से हो गया. युवावस्‍था में ही रंगकर्म के प्रति विजेश जोशी की प्रतिबद्वता की खूशबू अब शहर से बाहर देहरादून, दिल्ली तक पहुंचने लगी थी और दिल्‍ली, मुम्‍बई के रंगकर्मी उन्‍हें दिल्‍ली,मुम्‍बई आने के लिए दवाब बनाने लगे थे. परन्‍तु विजेश जोशी अपनी माटी से जुडे थे और सहारनपुर में ही रहकर रंगमंच को एक नई दिशा देने का मन बना चुके थे .

सहारनपुर जैसे छोटे शहर की अपनी सीमा, अपने साधन होते है परन्तु जहां चाह वहां राह. 1979 में श्री केके सिन्हा आईएएस प्रशिक्षु की सहारनपुर में पोस्टिग हुई. सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान सक्रिय रंगकर्मी रह चुके थे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कहावत है कि नशेडी नशेडी को ढूंढ ही लेता है. दिल्ली से आये सिन्हा ने सहारनपुर आते ही विजेश जोशी को ढूंढ लिया. उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि छोटे शहरों में बिना किसी प्रशिक्षण के स्टेज के हर काम में पारंगत रंगकर्मी भी होते है. 

विजेश जोशी और के के सिन्हा की गलबहियां रंग लायी और नाटय संस्था की स्थापना हुई . सिन्हा का काम करने का अपना तरीका था  उनकी सोच थी कि रंगमंच मौज मस्ती या दिल बहलाव या अपनी आत्म संस्तुष्टि भर के नही, रंगमंच समाज के लिए समाज को सुशिक्षित करने के लिए करना है. इस सोच के तहत स्कूल, कालेज, व्यापार, चिकित्सा, और सरकारी नौकरी से जुडे ऐसे लोगों को ढूंढा गया जिनकी रंगमंच में रुचि थी. 

आधुनिक रंगमंच से सहारनपुर जैसे छोटे शहर के रंगकर्मियों को अवगत कराने के उददेश्य से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक सुरेंद्रनाथ के निर्देशन में पहली थिएटर वर्कशॉप का आयोजन हुआ. इस वर्कशाप से विश्वविजय बहल, प्रवेश धवन, अरविन्द नैब, रामकिशन भारती, डॉ गिरीश डांग, जितेन्द्रु तायल जैसे पूर्व में रंगमंच से जुडे रंगकर्मी प्रशिक्षित हुए. वर्कशाप की परिणति के रुप में डाकतार प्रशिक्षण सभागार में ईडीपस नाटक का मंचन किया तो नाटक की गूंज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक पहुंची. इसके बाद मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित नाटक शतरंज के खिलाड़ी का मंचन केके सिन्हा के निर्देशन में हुआ. 

शतरंज के खिलाडी नाटक का निर्देशन करते समय केके सिन्हा ने शहर के दूसरे ग्रुप से जुड़े रंगकर्मियों जावेद खान सरोहा, शम्स तबरेज आदि को भी इस गुहार से जोड़ा कि हमें बेहतर रंगकर्म करना है, बेहतर रंगकर्म के लिए ग्रुपों की परिधि से बाहर आना होगा. जावेद खान सरोहा ने शतरंज के खिलाड़ी के खिलाडी में नवाब साहब की मुख्य भूमिका की थी. इन पंक्तियों के लेखक ने भी इस नाटक में पतंगबाज की भूमिका निर्वाह की थी.

उस समय तक सहारनपुर शहर में नाटकों में महिला पात्र के लिए कोई महिला रंगकर्मी नहीं थी. हालांकि इससे पूर्व डी के बरुआ के निर्देशन में मंचित नाटक इतिहास जाग रहा है में उनकी बेटी अभिनय कर चुकी थी परन्तु यह केवल उस एक नाटक तक ही सीमित रहा. स्त्री पात्र या तो पुरुष रंगकर्मी ही करते या दिल्ली से उस समय मधु शर्मा आदि प्रोफेशनल आर्टिस्टो को बुलाया जाता. इसमें दो दिक्कत आती. एक तो यह कि नाटक का बजट बिगड़ जाता. दूसरे यह कि दिल्ली से बुलाई जाने वाली प्रोफेशनल महिला आर्टिस्ट उसी दिन दोपहर को सहारनपुर पहुंचती जिस दिन नाटक का मंचन होना होता. हल्की-फुल्की रिहर्सल कर वह स्टेज पर होती. वि‍जेश जोशी और के के सिन्हा‍ ने इस दिशा में प्रयास प्रारम्भ किये और शतरंज के खिलाड़ी के लिए पहली बार शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार की बेटी आभा मित्तल को उसकी पिता की सहमति के साथ स्टेज पर उतारा गया. 

आभा मित्तल के स्टेज पर आने के बाद तो अनेक महिला रंगकर्मी रंगमंच की ओर आकर्षित हुई और उन्होंनें बेहतर काम किया. विजेश जोशी 1982 से ही बाल रंगमंच को समर्थित रहे. हर वर्ष ग्रीष्‍मकालीन अवकाश में वह बाल रंगमंच शिविर लगाते.
विजेश जोशी के इस फानी दुनिया से जाने से सहारनपुर रंगमंच का स्‍तम्‍भ ढह गया है. 

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