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नहीं रहे फैज की पंक्तियों के व्याख्याकार देवी प्रसाद त्रिपाठी

क्या संयोग है कि जिस फ़ैज की कुछ पंक्तियों पर अभी भारत में विवाद हो रहा है, उसका एक महत्वपूर्ण व्याख्याकार इसी दौरान दुनिया से कूच कर गया.

देवी प्रसाद त्रिपाठी देवी प्रसाद त्रिपाठी

देवी प्रसाद त्रिपाठी (डीपी त्रिपाठी) से दो दफा मिला. एक बार IIC में फ़ैज अहमद फ़ैज पर एक कार्यक्रम था और दूसरी बार ग्वालियर में डॉ लोहिया पर एक कार्यक्रम में जिसका आयोजन आईटीएम विश्वविद्यालय के रमाशंकर सिंह ने किया था. IIC वाला कार्यक्रम सन् 2013 या 14 का रहा होगा जिसमें फैज की बेटी भी पाकिस्तान से आईँ थीं जिन्होंने वहां ‘फैज घर’ बनाया था. वहां अतुल तिवारी ने क्या शानदार तरीके से फैज और लखनऊ के एक लेखक (संभवत: अली सरदार जाफ़री) के बीच की बातचीत सुनाई थी जिसमें फैज ‘हां जी हां जी’ बोलते थे और लखनऊ वाले ‘जी हां, जी हां’ बोलते थे.

क्या संयोग है कि जिस फ़ैज की कुछ पंक्तियों पर अभी भारत में विवाद हो रहा है, उसका एक महत्वपूर्ण व्याख्याकार इसी दौरान दुनिया से कूच कर गया.उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी और दिल्ली के सारे ‘हू एंड हू’ उसमें उपस्थित थे. दिल्ली वाले बड़े पत्रकार तो लगभग 90 फीसदी थे, नेताओं की भी लाइन लगी थी. पहली बार मैंने एनसीपी के वरिष्ठ नेता देवी प्रसाद त्रिपाठी को धुली हुई उर्दू में बोलते देखा था. उन्होंने पूरे तीन घंटे खालिस उर्दू में ही सभा का संचालन किया.

मेरे पिताजी ज्यादातर समय समाजवादी राजनीति में थे और डीपीटी से उनका आपातकाल के जमाने से परिचय था. मैंने अपना परिचय दिया तो बड़े प्यार से मिले और अपने खास अंदाज में चश्मे के भीतर से आंखें उठाते हुए उन्होंने पापा का हालचाल पूछा था.

कभी शायद हंस में रवींद्र कालिया का कोई संस्मरण छपा था या उनकी किताब ‘गालिब छूटी शराब’ का धारावाहिक था जो ‘एक शराबी की डायरी’ की शक्ल में छप रहा था. कालियाजी ने बड़े प्यार और शरारतपूर्ण ढ़ंग से देवी प्रसाद त्रिपाठी का वर्णन किया था. डीपीटी के इलाहाबाद वाले घर में ही राजीव गांधी और ज्योति बसु की खुफिया मुलाकात हुई. देवी प्रसाद त्रिपाठी अंग्रेजी के इनसाक्लोपीडिया थे और उर्दू पर मातृभाषा के समान अधिकार रखते थे. बेनजरी भुट्टो की शादी में डीपीटी भारत से कुछेक मेहमानों में संभवत: शामिल थे.

उनके जेएनयू और छात्रसंघ की अध्यक्षता वाली बात तो बहु-प्रचारित ही है. वे नेपाल मामलों के जानकार भी थे. जब नेपाल में उथल-पुथल मची थी तो उस शांति वार्ता में भी वे पर्दे के पीछे थे. बाबू प्रसाद भट्टराई और प्रचंड की मुलाकात उन्हीं के वसंतकुंज वाले घर पर सीताराम येचुरी और अन्य भारतीय नेताओं से हुई थी.

उनको दूसरी बार मैंने ग्वालियर में देखा. शायद 2016 की बात होगी. लोहिया मामलों के युवा अध्येता मित्र अभिषेक रंजन सिंह के बुलावे पर मैं ग्वालियर गया था. आईटीएम यूनिवर्सिटी में डॉ लोहिया पर एक व्याख्यान था जिसके आयोजक विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर रमाशंकर सिंह थे. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद उसमें मुख्य अतिथि थे और बिहार के मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी वहां उपस्थित थे.

भोजन के दौरान फिर से करीब से डीपी त्रिपाठी को सुनने का मौका मिला. उनकी मुस्कुराहट सम्मोहक थी. वे कई विषयों पर अपनी राय दे रहे थे. नीतीश कुमार उन्हें गुरुवत सम्मान दे रहे थे. किसी ने लेखक-पत्रकार बनवारी का जिक्र किया तो डीपी त्रिपाठी ठठाकर हंस पड़े. वे बोले, ‘बनवारी तो प्रसिद्ध हिंदू चिंतक बन गए हैं’.

डीपी त्रिपाठी देख नहीं पाते थे लेकिन उनकी मेधा अद्भुत थी. वे कई विषयों के जानकार थे और कई विधाओं में रुचि रखते थे. वे रूपरंग से बहुत सुंदर नहीं थे और मैंने कहीं बहुत पहले पढ़ा था कि उनके रूपरंग और हिंदी का बचपन में किसी ने मजाक उड़ाया था और यहीं वो जिद थी कि वो कई भाषाओं के जानकार बन गए. पता नहीं इसमें कितनी सचाई है.

वे शुरू में वामपंथी थे लेकिन बाद में उससे दूर होते गए. हालांकि वाम के मूल सिद्धांतों के प्रति उनका अनुराग बना रहा. शायद वे जीवन के उत्तरार्ध में लोहिया और गांधी के ज्यादा करीब आ गए थे या बहुत सारे महान विचारों के करीब आकर सबके हो गए थे.

आज लेखक प्रभात रंजन से बात हो रही थी कि लेखक-कवियों-बुद्धिजीवीयों का राजनीति में आना या उन्हें पद देने का सिलसिला कम होता जा रहा है. शायद ये समाज का ही रिफ्लेक्शन है. डीपी त्रिपाठी ऐसे ही बुद्धिजीवी थे जिसकी संख्या हर दल में कम होती जा रही है.

(सुशांत झा हिंद पॉकेट बुक्स-पेंगुइन इंडिया में कमिश्निंग एडिटर हैं और उन्होंने रामचंद्र गुहा की गांधी श्रृंखला का पेंगुइन के लिए हिंदी अनुवाद किया है)

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