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स्मृतिशेषः दिलीप साब एक्ट नहीं, रिएक्ट करते हैं

दूसरे के विचार को दिलचस्प नजरिया समझकर स्वीकार करना दिलीप साब ने सिखाया. मुझे उनके भीतर एक संत नजर आता था और एक शिक्षक भी

स्मृतिशेषः दिलीप साब एक्ट नहीं, रिएक्ट करते हैं स्मृतिशेषः दिलीप साब एक्ट नहीं, रिएक्ट करते हैं

सुभाष घई/ इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी 2019

मैंने जिंदगी में जो भी सीखा उसमें दो बंदों का हाथ रहा है. एक ओशो, दूसरे दिलीप कुमार. दिलीप साब के साथ मैंने तीन फिल्में कीं: विधाता, सौदागर और कर्मा. उनके साथ फिल्में करते वक्त मार्केट की ओर बहुत देखता था.

मार्केट क्या है; ऑडिएंस क्या है; कौन-सी चीजें पसंद करता है, कौन-सी नहीं. दिलीप साब के साथ रहने से मुझे संगत अच्छी मिल गई. कजर के टाइम उनसे मिला था. वे 55-60 के रहे होंगे. वहां से मेरी संगत बीसेक साल तक रही. एक उच्चतम नागरिक क्या होता है, उच्चतम कलाकार क्या होता है और उच्चतम सोच क्या होती है; ये तीन चीज़ें मैंने उन्हीं से सीखीं.

उस इनसान को मैंने बचपन से ही परदे पर देखा था. बहुत प्रभावित था. फिल्में बनानी शुरू कीं तो उनकी शैली भी सीखी: फिल्म के स्तर को कैसे एक गरिमा दी जाए, कोई हल्की/ओछी बात भी कैसे डिग्निटी के साथ कही जाए. गुलाम भी रहना है तो बादशाह की तरह रहो. बादशाहत रही उस इनसान में. दूसरे से बात करने की तमीज़. किसी दूसरे के विचार को एक दिलचस्प नज़रिया समझकर स्वीकार करना. कभी किसी के विचारों का मज़ाक नहीं उड़ाया उन्होंने. मेरे सामने कई लोग उनसे बहस करते. वे बिल्कुल शांत रहते. मुझे उनके भीतर एक संत नजर आता था और एक शिक्षक भी.

किसी फिल्म की कहानी के बारे में बात करने पर वे एक ही बात कहते: 'कमर्शियल फिल्म बना रहे हो. मुझे भी खेलकूद करना है उसमें, उठक-बैठक करा लो. मुझे मालूम है तुम बाज़ नहीं आओगे.' वे अपनी बात जिस गरिमापूर्ण ढंग से कहते हैं, उससे एक जिम्मेदारी बनती है. यह प्रेरणा भी मिलती है कि एक्सीलेंस लेवल पर काम हो. तभी आप देखिए कि उनके साथ की मेरी तीनों फिल्में न सिर्फ हिट हुईं बल्कि उन्हें इज्जत मिली. हिट होना और इज्जत मिलना अलग-अलग बातें होती हैं. इसके लिए मैं उनके और अपने बीच गुरु-शिष्य के रिश्ते को श्रेय दूंगा. हालांकि वे मुझे छोटा भाई मानते थे.

एक बार उन्हें स्टोरी सुनाने गया तो देखा कि गार्डन में लेटकर छोटे-छोटे बच्चों के साथ खेल रहे हैं. बोले, 'ठहरो अभी. फिल्में तो बनती रहती हैं. देखो, घर में चार-छह बच्चे आए हैं, कितना अच्छा लग रहा है. आधे घंटे बाद आना. तुम्हारा नखरा सहना पड़ा तो सह लूंगा मैं.' कभी-कभी सेट पर भी रूठ जाते: 'फलां सामान नहीं आया, विग नहीं आई, ये ठीक नहीं लग रही है. मैं काम नहीं करूंगा.' हम हंस पड़ते थे. उनके साथ मेरी तीसरी पिक्चर सौदागर बनते वक्त पूरी यूनिट ने उनका और राजकुमार का नाम चुन्नू-मुन्नू रख दिया. उसी दौरान एक दिन मैंने उनके घर फोन करके सायरा (बानो) जी को कहा कि चाइल्ड स्टार को उठा लीजिए. वे बोलीं कि आपके चाइल्ड स्टार अभी सोए हुए हैं. बाद में दिलीप साब को पता लगा तो वे भी हंसने लगे. उन्होंने सिखाया कि 'अपने भीतर मौजूद बच्चे को कभी मरने न देना. आप 70-80-90 के हो जाएं, कितने ही बड़े लीडर या बादशाह हो जाएं, आपके भीतर वो बच्चा मौजूद रहना चाहिए. एक कंधे पर बच्चे को रखो और दूसरे पर बूढ़े को, ताकि कभी बच्चा भटके तो दूसरी ओर से बुजुर्ग बोल दे कि आ भीतर वापस आ जा.'

जिंदगी, समाज और सिनेमा के बारे में उनसे और ओशो से सीखी बातें अब मैं बच्चों को सिखाता हूं. दिलीप साब के काम करने का अपना तरीका होता था. एक छोटी-सी मिसाल बताता हूं. हमारी पहली पिक्चर थी विधाता. उनको जब मैंने साइन किया तो लोगों ने डरा दिया कि 'दिलीप साब तो डायरेक्टर को पीछे करके खुद स्क्रिप्ट लिखते हैं. उनके साथ पिक्चर बनाने में तीन साल लगेंगे; बहुत नखरे वाले स्टार हैं क्योंकि जो स्टार बन जाते हैं उनको सब कुछ स्टोरी में लिखने की आदत बन जाती है, समझते हैं हमी राइटर हैं. परफार्मर में और क्रिएटर में बहुत फर्क होता है.' तो वे भी स्टार-सुपरस्टार के दौर से गुजरे ही थे. मैंने जाकर सीधे बात की. स्क्रिप्ट सुनकर ओके कर ही चुके थे. मैंने कहा, 'दिलीप साब, एक बात पूछना चाहता हूं. लोग कहते हैं कि आप डायरेक्टर के काम में बहुत दखल देते हैं. आप बताइए कि विधाता को आप डायरेक्ट करेंगे या मैं? आज कर ही लेते हैं फैसला.' वे मुस्कराकर बोले, 'जानता हूं, लोगों ने तुमको बहुत कुछ बताया होगा. तुम्हीं डायरेक्ट करोगे क्योंकि तुम्हीं ने सुनाया है कि तुम क्या बनाना चाहते हो. मैं इसमें सिर्फ ऐक्टिंग करूंगा.' इसके बाद उन्होंने कभी, किसी भी सीन में हस्तक्षेप नहीं किया.

प्रोडक्शन से जुड़ी एक बात बताऊं. हमलोग गोवा के एक जंगल में विधाता की शूटिंग कर रहे थे. दिलीप साब को अगले दिन शूटिंग के लिए बॉम्बे से फ्लाइट से तीन बजे पहुंचना था. हम तीन बजे शूटिंग कर रहे थे, तो प्रोडक्शन मैनेजर उन्हें लेने गाड़ी से एयरपोर्ट गया. चार बजे दिलीप साब को मैंने किराए की टैक्सी से उतरकर आते देखा. असिस्टेंट से मैंने फौरन पूछा कि माजरा क्या है? उसने बताया कि रास्ते में ब्रेकडाउन हो जाने से गाड़ी लेट पहुंची. मैंने कहा, 'अब तो मरे! दिलीप साब चढ़ जाएंगे. टैक्सी लेके आए हैं.' अब देखिए स्टार कैसे होते हैं. उनके पास आते ही मैंने कहा, 'सॉरी सर. सुना आपके लिए गाड़ी नहीं पहुंची एयरपोर्ट.' वे बेफिक्री के अंदाज में बोले, 'तुम शॉट लो यार, ये प्रोडक्शन का काम है. ऐसा होता रहता है. गाड़ी नहीं आई तो क्या... मैं टैक्सी पकड़ के इधर बस हैलो कहने आ गया. अब होटल जा रहा हूं.' मैं इतना हैरान हुआ कि ये आदमी इतना सिंपल! ये सब चीज़ें क्या साबित करती हैं... इस बंदे के मुरीद आप कैसे नहीं बनेंगे.

विधाता में एक सीन है जिसमें संजय दत्त उनसे कहता है, 'मैं घर छोड़कर जा रहा हूं क्योंकि आप क्रिमिनल हैं.' इस पर वे कहते हैं कि 'अच्छा जाओ तुम, मैं भी अदालत में बोलूंगा कि अगर मैं चोर हूं तो ये मेरी औलाद है. वो सीन बड़ा लंबा, तीन पेज का था. एक ही शॉट करना था उनको. पैकअप टाइम हो गया था. पूरी यूनिट आगरा से वापस जाने वाली थी. तैंतीसवां टेक मैंने ओके किया था. थक गए थे रात में. टेक खत्म हुआ तो मैं बोला कि 'ये लास्ट टेक, पैकअप!' आधी यूनिट जा चुकी थी. दिलीप साब ने मुझे कमरे में बुलाया और कहा कि 'तुमने जो तैंतीसवां टेक लिया वो ठीक नहीं आया, सुबह मैं फिर से टेक दूंगा.' मैंने यूनिट को वापस बुलाया, सुबह साढ़े छह बजे उन्होंने एक टेक दिया. फर्स्ट टेक, ओके, पैकअप. वो सीन पिक्चर में है.

दिलीप कुमार और राजकुमार में प्रतिद्वंद्विता के किस्से के बारे में बताऊं. दिलीप साब सौदागर के रूप में हमारे साथ तीसरी पिक्चर कर रहे थे और राजकुमार पहली. राजकुमार बहुत इनसिक्योर थे. दिलीप साब से मैंने कहा कि राजकुमार साब को मुकाबले में लाना है. मैं जानता हूं कि उनसे आपके ताल्लुकात अच्छे नहीं हैं. वे बोले, 'तुम फिल्म बनाओ, ताल्लुकात की बात मत करो. वो थोड़े टेढ़े बंदे हैं, शहजादे हैं. उसको तुम संभालो. मुझको तकलीफ दोगे तो चलेगा. उसके सामने मुझे दो-एक बार डांट दिया करो, ताकि उसको अच्छा लगे. सब कुछ इतना आसान कर दिया उन्होंने मेरे लिए. राजकुमार कुछ बोल नहीं सके और बाद में वे दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए. कई बार ऐसा होता कि राजकुमार को महत्व देना पड़ता था और यह बात दिलीप साब को बताता तो वे कहते, 'हां हां, ठीक है.' अब एक सीन के फ्रेम में दोनों को देखें तो? दिलीप साब दिलीप साब हैं, राजकुमार को हमने साफ कह दिया. दिलीप कुमार कैरेक्टर प्ले कर रहे थे पर राजकुमार तो राजकुमार प्ले कर रहे थे.

दिलीप साब की ऐक्टिंग की शुरुआत के दिनों में सोहराब मोदी टाइप थिएट्रिकल ऐक्टिंग होती थी. खून खून होता है, पानी पानी होता है जैसे डायलॉग होते थे. पृथ्वीराज (कपूर) जी भी थिएटर से थे, राजकपूर भी. थिएटर का इफेक्ट सब ऐक्टर्स में था कि जब तक थिएट्रिकल नहीं होंगे आप असर नहीं डाल सकते. दिलीप साब ने एक किस्सा बताया. उनकी पहली फिल्म अमिय चक्रवर्ती के निर्देशन में देविका रानी की थी. ऑडिशन टेस्ट के लिए उन्हें एक सीन दिया गया. उन्होंने कहा, 'मुझको ऐक्टिंग-वेक्टिंग बिल्कुल नहीं आती थी. मेरे दोस्त ने यह कहकर फोटो भेज दिया था कि तू कोशिश तो कर, कुछ हो जाएगा. मैं डरते-डरते वहां पहुंच गया. मुझे सीन देकर कहा गया कि असिस्टेंट आपको समझा देगा. असिस्टेंट ने मुझे पढ़के सुनाते हुए कहा कि इस तरह से बोलो. मैं डर गया. ऐसे कैसे बोलूं? उसने कहा, ऐसे ही बोलते हैं स्टार लोग. भले तुमको डायरेक्टर ने बुलाया है लेकिन बोलना ऐसे ही होगा. लंच-ब्रेक हुआ तो मैं डायरेक्टर के पास गया, बोला, दादा, ये सीन जो आपने दिया है, असिस्टेंट कहता है कि ऐसा बोलो. आप बताइए कि मैं ऐसे ही बोलूं या जैसे मैं बोलना चाहता हूं वैसा बोलूं? उन्होंने कहा, जैसा तुम चाहते हो वैसा बोलो. मैंने सीन पढ़ा और रिएक्ट किया. जब शॉट शुरू हुआ तो मैंने रिएक्ट कर दिया सीधे-सीधे. मैंने मन में बोल दिया कि भाड़ में जाए करियर, आता हो या न आता हो मैं तो ऐसा नहीं बोलूंगा. तो मैंने सीधे-सीधे बोल दिया और सेलेक्ट हो गया.' दिलीप साब किसी सीन में हमेशा रिएक्ट करते हैं, एक्ट नहीं करते. दिलीप साब को कभी भी देखिए, मौन वाले दृश्यों में उनकी परफॉर्मेंस ज्यादा पॉवरफुल है. वे बात करने से पहले और उसके बाद जैसे देखते हैं उसे देखकर आप यह समझ सकते हैं.

मुग़ले-आज़म के बारे में पूछने पर दिलीप साहब बताते कि 'मैं 5-5, 6-6 घंटे शीशे में देखता रहता था कि तू दिलीप कुमार नहीं, इस वक्त तू सलीम है. उस वक्त शॉट्स भी 5-5, 6-6 घंटे के बाद होते थे. और मैं (शीशा देखते-देखते) बीमार हो गया. एक ट्रेजिडी किंग बन गया मैं. उसका मुझ पर इतना साइकोलॉजिकल असर पड़ा कि लंदन में महीना भर साइकोलॉजिस्ट और साइकेट्रिस्ट के पास गया. मुझे लगता कि सब मुझे खाने को दौड़ रहे हैं, मुझसे कुछ अपेक्षा कर रहे हैं. हिल गया था मैं.' तो डाक्टर ने उनको बोला कि ट्रेजिडी करते-करते तुमने अपने प्रोफेशन को बहुत गंभीरता से ले लिया. अब तुम कॉमेडी फिल्म करो. लौटकर उन्होंने राम और श्याम की, कोहिनूर की. क्या होता था कि स्क्रिप्टराइटर्स हर पिक्चर में उन्हें मार देते थे. इसके लिए सीन में घुलना होता था. और दिलीप साब पीते थे सीन को.

ऐक्टिंग में पहले भी अच्छे लोग थे, आज भी हैं. अमिताभ बच्चन हैं, दूसरे ऐक्टर हैं. लेकिन वो अपना एक स्कूल था. दिलीप साब पार्टी में आएं तो अमिताभ हों या आमिर खान या मैं, सब खड़े हो जाते. फिल्म करना तो उन्होंने 1995 में ही बंद कर दिया था. लेकिन वे तो दिलों में हैं. इतिहास में हैं. एकेडमिकली भी हैं, ऐज़ अ ह्यूमन बीइंग भी और ऐज़ अ फिलॉस्फर भी.

हर पेड़ अपनी जड़, अपना एक डीएनए लेकर आता है. शम्मी कपूर अपनी तरह के स्टार थे, देव आनंद और राजेश खन्ना अपनी तरह के. ये अलग-अलग पेड़ हैं. लेकिन कुछ दरख्त ऐसे होते हैं जो बरगद बनते हैं और 500-600 साल जीते हैं. अब यह सब चूंकि एक डेमोक्रेटिक आर्ट है तो तुलना न फिल्मों की करनी चाहिए न ऐक्टिंग की. उन्होंने कभी किसी को कमजोर करने की कोशिश नहीं की. वे कहते, 'मुझे अच्छा काम करना है. सुभाष, एक अच्छा सीन दो यार, जिसमें बात हो, अदा हो...बात कहो तो वह किसी को लगे! सुभाष, पूरी पिक्चर तुम जैसी बनाना चाहते हो बना लो, पर दो सीन मुझे परफॉर्मेंस के लिए दे देना.' इतनी भूख थी उनमें, किसी न्यूकमर की तरह.

उनके बारे में कहा गया कि वे उच्चतम श्रेष्ठ कलाकार हैं. पर मैंने उनमें कलाकार से ऊपर एक इनसान को देखा, जिसकी सोच बड़ी यूनिवर्सल रही और उतनी ही नेशनल. मुल्क से उन्हें बहुत प्यार रहा है. इनसानियत का उनका पर्सपेक्टिव बहुत विशाल है. मैं नहीं समझता कि अपने ही समय में कोई आदमी क्लासिक बनता है. हर आदमी विवादास्पद ही होता है. अपने समय में जीसस क्राइस्ट भी विवादास्पद थे, फांसी लगा दी गई. गांधी भी विवादास्पद थे, गोली मार दी गई. राम को भला-बुरा कहा, कृष्ण को भी. वे चले जाते हैं तब उनकी बातें रह जाती हैं. दिलीप साब के बारे में जो लिखा-बताया जाएगा वो अपने आप में अलग ही एक इतिहास होगा.

और ओशो:

ओशो को मैं सुन तो 1975 से ही रहा था; उनके कैसेट हम दोस्त मिल-बैठकर सुनते, पर उनसे ताल्लुक 1985 में बना. बात कहने का उनका तरीका बहुत आकर्षित करता था. उनकी बात तो हमने सुनी नहीं. हम परंपरा वाले समाज में पले-बढ़े बच्चे हैं. मां-बाप और स्कूल जो सिखाते हैं उसी पर यकीन करते हैं. एक से अठारह साल तक (जीवन) ऐसे ही निकल जाता है, तब तक रीढ़ की हड्डी पक जाती है. कोई नहीं कहता कि ए फॉर एप्रिल बोलो, बस ए फॉर ऐपल. ए फॉर अगस्त भी हो सकता है, कोई नहीं कहता. इस बंदे को सुना तो लगा कि ये थर्ड पर्सपेक्टिव की बात कर रहा है. कोई ऐसी बात कह रहा हो जिससे आपकी सहमति न हो तो उसे विद्रोही (रिबेल) कहते हैं. ओशो को रिबेल कहा गया क्योंकि समाज ने उनके पर्सपेक्टिव को स्वीकार नहीं किया. वे परंपरा के खिलाफ थे और नए किस्म का पर्सपेक्टिव देना चाहते थे.

मैं समझता हूं कि आजादी के बाद से हमारा देश-समाज आर्थिक से कहीं ज्यादा बौद्धिक रूप से गरीब हुआ है. बौद्धिक गरीबी न होती तो आर्थिक गरीबी भी न होती. हमारे सामाजिक विकास में, सोचने-समझने में, बुद्धि-विवेक में बड़ी संकीर्णता-सी आ गई. सैकड़ों-हजारों साल से जो चल रहा था, 70 फीसदी वही बातें माननी पड़तीं, नहीं तो दूसरा नाराज हो जाता. आपने कहा कि भगवान नहीं है तो 99 फीसदी लोग खिलाफ हो जाएंगे. उन्होंने जब कहा कि 'भगवान नहीं है, भगवान मैं ही हूं' तो लोग नाराज हो गए कि इनसान भगवान कैसे हो सकता है? उसने कहा कि सौ साल तक जो इनसान महान है वो भगवान है.

उनके बारे में कई किंवदंतियां थीं. मैंने उन्हें सुनना शुरू किया. उसके बाद 1985 में एक ही मुलाकात (मशहूर निर्देशक) विजय आनंद साहब के यहां हुई थी. वहां उनसे ज्यादा मिल नहीं सका था. पर उसके बाद टेप से, किताबों से हमेशा ताल्लुक रहा. उनके न रहने के बाद वो सब पढ़ता-सुनता रहा. उसी प्रभाव का नतीजा रहा है कि मेरी फिल्में कभी छटपटातीं नहीं. डायरेक्टर-प्रोड्यूसर में खदबदाहट उठने पर उनकी फिल्में छटपटाती हैं. मेरी फिल्मों में एक तरह की शांति, एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण था. 1978 में मैंने क्रोधी बनाई. उसमें एक महात्मा के पूछने पर एक क्रिमिनल बताता है, 'हजारों साल पहले एक इनसान ने दो शब्द बनाए- भगवान और भाग्य. भगवान इसलिए बनाया कि वो उसके बनाए हुए उसूलों पर चले, और भाग्य इसलिए कि जब वो फेल हो जाए तो अपना भाग्य समझकर उसे स्वीकार कर ले.'

मैं न कभी उनका अनुयायी था, न संन्यासी. मैं एक फिल्ममेकर था. मीडिया वालों की तरह हम फिल्मकारों का भी सबसे बड़ा कर्तव्य होता है सबके नजरिए को समझने की कोशिश करना और उसे रिपोर्ट करना. जब तक आप बहुत ही जिद्दी न हो जाएं आपका अपना पर्सपेक्टिव नहीं होता. उसे रखना शुरू करते ही आप संकीर्ण हो जाते हैं. हम फिल्मकारों में भी कई अपने दृष्टिकोण से ग्रस्त हो जाते हैं. कहते हैं 'माय वॉइस'. तो एक डेमोक्रेटिक वॉइस निकल कर आती है फिल्म में. वो भी बुरी नहीं है, उसकी अपनी एक श्रेणी है. लेकिन मेरा यह था कि आज के मध्यमवर्गीय समाज की क्या वॉइस है, क्या सोच और मान्यताएं हैं...उसी के ऊपर मुझे अपने कैरेक्टर लिखने हैं मनोरंजक तरीके से. दर्शक को फिलॉसफी बतानी है म्युजिकली. कई बार ड्रामा में उतना मुमकिन न होने पर मैं म्युजिक के जरिए बताता था. जिदंगी हर कदम एक नई जंग है, नायक नहीं खलनायक हूं मैं, मां तुझे सलाम, आइ लव माइ इंडिया, ताल से ताल मिला, यादें आती हैं, जैसे गाने उसी की मिसाल हैं. तो कहीं न कहीं मैं फिलॉसफी से बहुत जुड़ा हुआ था. ताल भी आप देखें तो पाएंगे कि आखिर में मैं उसमें रम गया. मैंने मानसी का वो कैरेक्टर ओशो की अनुयायी से लिया. उसके बाल, उसका पहनावा, उसका योग करना, उसका सोचना. तो वहां से मैं शुरू हुआ.

ओशो का एक कथन था—डू नॉट फॉल इन लव, राइज इन लव (प्रेम में पड़ो नहीं, प्रेम में ऊपर उठो). अब डू नॉट फॉल इन लव तो एक कॉमन सेंटेंस है. आइ हैव फॉलेन इन लव भी था. लव विथ पैलेस, लव विथ कम्युनिटी है. दिस इज राइज. तो मुझे बहुत अच्छा लगा कि फॉल इन लव मतलब कि घुटने टूटेंगे. तो राइज कैसे किया जाए. राइज के लिए बलिदान, बिना हिंसा के. जिसे अपने देश-समाज के लिए प्यार हो जाए वो मार ही खाता है. वो विद्रोह करता है, वो लड़ाइयां करता है.

तो मेरे जीवन पर ओशो का उस तरह का प्रभाव था. साल में एकाध बार पुणे जाता हूं, उनके आश्रम. पर मुझे दुख हुआ जब उनको गलत समझा गया. एक किताब छपी संभोग से समाधि तक, तो लोगों ने कहा कि वे सेक्स बेचते हैं, उसे बढ़ावा देते हैं, यह गंदा आदमी है. तो उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया सेक्स से भरी पड़ी है. चालीस करोड़ से एक सौ तीस करोड़ की जनसंख्या कर दी आपने और आप सेक्स शब्द से नफ़रत करते हैं. उनका मतलब था कि सेक्स से ऊपर दुनिया में बहुत-सी चीजें हैं, जो मानव कल्याण के लिए करनी हैं आपको. इसको आप इतनी बड़ी वर्जना क्यूं बनाते हैं. इतनी महानता क्यों देते हैं आप इसे? उन्होंने कहा कि दिस इज ए पार्ट आफ नेचर. हार्मोंस ने बनाया. जिसने शरीर बनाया उसी ने इसे बनाया. किसी अमेरिकन ने इंटरव्यू में पूछा उनको, आप सुपरकांशेस थ्रू द सेक्स (संभोग से समाधि तक) किताब के जरिए सेक्स को बढ़ावा देते हैं? उन्होंने कहा कि 'हां! मैंने 480 किताबें लिखी हैं. 23 भाषाओं में दुनिया में हैं. अनूदित हैं. लेकिन मेरी बेस्ट सेलर किताब यही है. तो कसूर लिखने वाले का है या पढऩे वालों का? मैंने तो नहीं लिखी कि बेस्ट सेलर होनी चाहिए.' उन्होंने कृष्ण, बुद्ध, गीता, उपनिषद् सब पर बोला. ये कहीं न कहीं हमारे और समाज के समझने में कमजोरी है. सेक्स उसके लिए एक अद्भुत चीज है. ओशो का सच के पीछे का जो सच था उसने मुझे प्रभावित किया. तभी तो फिल्म बना डाली ताल (डोन्ट फाल...राइज इन लव). वह फिल्म थोड़ा-बहुत आध्यात्मिकता का एहसास कराती है. आज के युवा को भी वह पसंद आती है. कहानी बहुत छोटी पर बात बहुत बड़ी. अक्षय खन्ना ने कहानी सुनी तो कहने लगे कि 'मेरा रोल क्या है? मैं तो कुछ भी नहीं कर रहा इसमें.' मैंने कहा कि 'तुम्हारा रोल गांधी का है, जो कुछ न करके पूरे हिंदुस्तान को आजाद करा सकता है. तुम कुछ न भी करके प्यार को पा लेते हो. प्रेम जीतता है तुम्हारा.'

एक फिल्मकार के जीवन में ऐसे प्रभाव आते हैं. फिर मैंने यादें, कृष्णा और युवराज बनाईं. 2010 के बाद मैंने फिल्में नहीं बनाईं पर जो ह्विजलिंग वूड्स इंटरनेशनल फिल्म इंस्टीट्यूट बनाया, उसमें 1,100 बच्चे पढ़ते हैं. अपने दर्शन, उदार कलाओं, थिएट्रिकल और परफॉर्मिंग आट्र्स के मामले में यह बेस्ट इन एशिया है. मैं इस इंडस्ट्री का नितांत साधारण-सा बच्चा था, एफटीआइआइ से सीखकर आया था. तीन साल ऐक्टर रहा, फिर प्रोड्यूसर, डायरेक्टर. कॉर्पोरेट में रहा, एजुकेशनिस्ट बना. तो मेरी जिंदगी पर प्रभाव दिलीप साब और ओशो का ही रहा.

(अंशुमान तिवारी से बातचीत पर आधारित)

 

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