scorecardresearch
 

करोना भी रोक नही सका काक को

पहला कार्टून छपने के डेढ़ साल बाद खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान/सीमांत गांधी भारत आये. सभी राजनेता ने उनका स्वागत किया. हरीश चंद्र शुक्ला ने पेंसिल उठाई और कार्टून बनाया जिसमें सीमांत गांधी की बड़ी छवि बनाते हुए उनका स्वागत करते नेताओं को बहुत छोटा छोटा दिखाया गया था. यह कार्टून दैनिक जागरण के संपादक नरेंद्र मोहन जी को दे आये. कार्टून ग़ज़ब था और संपादक पारखी. नरेंद्र मोहन जी ने इस कार्टून को सात जुलाई 1867 को पहले पन्ने पर प्रकाशित किया.

कार्टूनिस्ट काक कार्टूनिस्ट काक

राजेन्द्र शर्मा

अपने तमाम पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन कर चुके कार्टूनिस्ट काक 16 मार्च 2020 को अस्सी बरस के हो गये है परंतु सात जुलाई 1967 से आज तक यानी कुल तरेपन सालों में हर रोज कार्टून बनाने का संकल्पस यथावत जारी है. अचरज की बात यह कि हर रोज का कार्टून बनाने के इस सिलसिले को करोना वायरस भी नही रोक नही सका है. काक आज भी कार्टून बनाने में तल्लीीन और अपने कार्टूनों के जरिये करोना भी प्रहार कर रहे है.

उन्नााव जिले के पुरा गांव के स्वतंत्रता सेनानी श्री शोभ शुक्ल की पांचवीं संतान हरीश चन्द्र शुक्ला (जिन्हें दुनिया काक के नाम से जानती है) को सातवीं कक्षा में उनके द्वारा पेंसिल से खो खो करते बंदर के बनाये गये चित्र,जो चित्र कम कार्टून ज़्यादा था, को कला अध्यापक जगदम्बा सिंह द्वारा दिये गये Good ने उन्हें स्क्रैाच करने के लिए प्रेरित किया गया.अन्य विषयों की तैयारी कर हरीश चन्द्रा जैसे ही फ़ारिग होते अपनी कापी पर पेंसिल से स्कैच करने लगते . यही उसके जीवन का परम सुख बन गया.

सातवीं कक्ष में बनाया गया वह “बंदर “ और उसकी शरारतें , कारस्तानियाँ हरीश के मस्तिष्क में इतने गहरे पैठ गयी कि काक बनने पर भी वह बंदर स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ बल्कि और ज़्यादा शिद्दत से उभरा. काक के कार्टूनों के प्रिय पात्र जो गली का फक्कड बूडढा है, जो देश दुनिया की हर धटना पर अपनी बात जो देश के आम आदमी के मन की बात होती है, उसे कहने में गुरेज़ नहीं करता. उस बुड्ढे को ज़रा ग़ौर से देखियेगा. उसके स्टैक्चर में कहीं न कहीं वह बंदर दिखाई दे ही जाता है.

पढ़ाई लिखाई पूरी कर कानपुर के ही एक सरकारी प्रतिष्ठामन में नौकरी मिल जाने और और फिर दाम्पीत्यि जीवन में बंध जाने के बावजूद भी हरीश चन्द्र शुक्ला का कार्टून बनाने का शौक बदस्तजदूर जारी रहा. हरीश चंद्र शुक्ला नौकरी और गृहस्थी के नित्य के दायित्वों को निभा जैसे ही फ़ुरसत पाते, आराम नहीं करते बस पेंसिल उठाकर स्कैच करने बैठ जाते. इसी से उनकी थकान उतरती थी. यही था उनके जीवन का परम सुख.

वर्ष 1965-66 में उत्तर प्रदेश में चंदरभानु गुप्त मुख्यमंत्री थे. हरीश चंद्र शुक्ला ने उन पर कार्टून स्कैच किया और कानपुर से प्रकाशित होने वाले अख़बार राम राज्य में भेज दिया. राम राज्य अख़बार में यह हरीश चंद्र शुक्ला का पहला कार्टून छपा परंतु यह अख़बार सीमित मात्रा में छपता था. लिहाज़ा कोई कोई विशेष रेस्पांस नहीं मिला लेकिन रेसपांस मिले न मिले, हरीश चंद्र शुक्ला तो बक़ौल शायर वसीम बरेलवी खुद को मनवाने का हुनर मुझे भी आता है ,मै कतरा हू समंदर भी मेरे घर आता है, दृढ़ निश्चय कर चुके थे कि उन्हें करना क्या है.

पहला कार्टून छपने के डेढ़ साल बाद खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान/सीमांत गांधी भारत आये. सभी राजनेता ने उनका स्वागत किया. हरीश चंद्र शुक्ला ने पेंसिल उठाई और कार्टून बनाया जिसमें सीमांत गांधी की बड़ी छवि बनाते हुए उनका स्वागत करते नेताओं को बहुत छोटा छोटा दिखाया गया था. यह कार्टून दैनिक जागरण के संपादक नरेंद्र मोहन जी को दे आये. कार्टून ग़ज़ब था और संपादक पारखी. नरेंद्र मोहन जी ने इस कार्टून को सात जुलाई 1867 को पहले पन्ने पर प्रकाशित किया.

संयोग देखिये , उसी दिन हरीश चंद्र शुक्ला के पहले बेटे का जन्म हुआ. सारा घर परिवार खुश कि घर में नन्हा शिशु आया है लेकिन हरीश चंद्र शुक्ला के लिये यह यक्ष प्रश्न अपने आप से कि वह पुत्र आगमन से खुश है या अपना कार्टून छपने से खुश है. बहरहाल सात जुलाई 1967 , कार्टूनों की दुनिया में ऐतिहासिक दिन बन गया , उसी दिन हरीश चंद्र शुक्ला के बड़े बेटे शुभव शुक्ला के साथ साथ देश के जाने माने कार्टूनिस्ट “ काक “ का नामकरण हुआ.

सात जुलाई 1967 का वह दिन इस मायने में ऐतिहासिक दिन है कि उस दिन हरीश चंद्र शुक्ला नेपथ्य में चले गये और सामने थे काक जिन्हें सारा देश इसी नाम से पहचानता है. स्वयं काक साहब भी इसे नाम से पुकारे जाने के हामी है. कोई उनके सामने हो और हरीश जी नमस्कार , शुक्ला जी प्रणाम कहें तो वह कोई उत्तर न देकर सीधे सवाल पूछते हैं कि यह हरीश चंद्र शुक्ला कहाँ मिले आपको ?

सात जुलाई 1967 को “ काक “का नामकरण होने पर कार्टूनिस्ट काक ने शायद खुद से संकल्प किया था कि जब तक जीवन है,वह हर रोज़ कार्टून बनायेंगे. तरेपन साल कम नहीं होते है , इन तरेपन साल में एक भी दिन ऐसा नहीं जब काक साहब ने कार्टून न बनाया हो. काक की इस संकल्प शंकित को प्रणाम कि करोना के इन लाँक डाउन के दिनों में करोना उनकी संकल्प शंकित को डिगा नहीं सका. वह हर रोज़ कार्टून बना रहे है.

सात जुलाई 1967 को दैनिक जागरण के पहले पन्ने पर छपे अपने कार्टून के उपरांत काक ने कार्टूनों की दुनिया में ऊँची उड़ान भर दी. एक से एक नुकीला , चुभता हुआ, गुदगुदाता हुआ कार्टून हिंदी के तमाम अख़बारों में दिखने लगा. कानपुर से दैनिक जागरण , आज , जयपुर में राजस्थान पत्रिका ,चंडीगढ़ में हिंदी ट्रिब्यून तक में काक के कार्टून उड़ान भर रहे थे. अपनी बात को बेहद सलीक़े से अपने प्रिय पात्र बुड्ढे के ज़रिये कहने वाले काक ने देश के किसी नेता को नहीं छोड़ा जिसका कार्टून न बनाया हो. देश भर के नेता काक को जानने समझने लगे थे कि पता नहीं उनके व्यक्तित्व के किस पहलू पर , किस बयान पर काक कार्टून बना दें.

दिनमान साप्ताहिक में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के बाद बतौर संपादक रघुवीर सहाय आये. रघुवीर सहाय के लिये यह चुनौती थी कि जिस स्तर तक अज्ञेय दिनमान को ले आये थे , उसे आगे बढ़ाना है . रघुवीर सहाय की पहल पर काक ने दिनमान के लिये कार्टून बनाने शुरू किये. कई बार उनके कार्टून को ही रघुवीर सहाय ने कवर पेज बना दिया.यह काक के “काक दृष्टि का ही कमाल था कि रघुवीर सहाय के समय से दिनमान में छपने शुरू हुए कार्टून कन्हैया लाल नंदन ,सतीश झा, धनश्याम पंकज के कार्यकाल में भी यथावत छपते रहे. दिनमान जैसी पत्रिका के लिये काक के कार्टून अपरिहार्य हो गये थे.

उन्हीं दिनों कलकत्ता से रविवार का प्रकाशन शुरू हुआ. योगेन्द्र कुमार लल्ला, एस पी सिंह , उदयन शर्मा काक को कहाँ छोड़ने वाले थे. रविवार के लिये भी काक अपरिहार्य हो गये थे. अपने कार्टून और अपने फक्कड़ बुड्ढे की बदौलत काक राजनेता के पंसदीदा हो गये थे । अटल बिहारी वाजपेयी के विराट व्यक्तित्व से अवगत कराते हुए काक उन दिनों को याद करते है जब बेहमई नरसंहार के बाद विभिन्न दलों के नेतागणों के दौरे हो रहे थे । इंदिरा गांधी आकर जा चुकीं थीं । इसी क्रम में अटल जी भी आये . उन दिनों काक कानपुर में दैनिक जागरण के लिये कार्टून बना रहे थे । मुखपृष्ठ पर कार्टून छपा । शीर्षक था ‘‘ बेहमई की हुतात्माओं की शांति के लिए थोड़ी और घूल ’’.

कार्टून में अटल जी को सदल जा रहे थे, धूल उड़ रही थी । कुछ ज्यादा ही तीखा हो गया था . पर वाह अटल जी. उसी दिन कानपुर की विशाल सभा में उन्होंने कार्टून का बाकायदा उल्लेख किया और उलाहना दिया कि कार्टूनिस्ट ने हमें कुछ ज्यादा ही मोटा दिखा दिया है . देख लो, मैं इतना मोटा नहीं. काक दंग रह गये यह सुनकर. अपनी आलोचना को न केवल इतनी सहजता से लेना बल्कि इतना अप्रत्याशित महत्व देना यह अटल की विशेषता थी .काक बताते हैं कि अटल जी के व्यक्तित्व की इससे ज्यादा विराटता का उदाहरण और क्या होगा कि डेढ़ दशक बाद जब मैं दिल्ली में नवभारत टाइम्स के लिये कार्टून बना रहा था उनसे मुलाकात हुई तो वह कार्टून भूले नहीं थे. छूटते ही वही शिकायत. आपने मुझे बहुत मोटा दिखा दिया था. अटल जी जैसे राजनेता अब स्मृतियों में ही मिल सकते है.

1967 से 1983 तक कुल 15 बरस तक हर रोज़ कार्टून बनाने और हर रोज़ किसी न किसी पत्र पत्रिका यथा दैनिक जागरण, दैनिक आज, राजस्थान पत्रिका ,दैनिक ट्रिब्यून आदि तथा दिनमान और रविवार साप्ताहिक में कार्टून प्रकाशित होने के फलस्वरूप कार्टूनिस्ट काक प्रतिष्ठित हो चुके थे लेकिन इस सीमा तक वह काक थे. कानपुर की अपनी नौकरी में वह हरीश चंद्र शुक्ला ही थे जिस पर कार्टूनिस्ट काक का व्यक्तित्व भारी पड़ने लगा था पर मध्यवर्गीय जीवन में गृहस्थी को पालना पोसना पहली प्राथमिकता होती है. उधर दिल्ली, जयपुर और लखनऊ के समाचार पत्रों के संपादक काक के कार्टूनों के जलवे को जान चुके थे. सभी काक को सलाह देते कि अब पूर्णकालिक रूप से अख़बार ज्वाइंन करो.

बडी जददोजहद के बाद काक ने ह‍रीश चन्द्र‘ शुक्लाश को सदैव के लिए उसी सरकारी प्रतिष्ठाान में छोड दुनिया के पूर्णकालिक रुप से काक बन कर जनसत्ता में ज्वााइंन किया गया । डेढ साल बाद नवभारत टाईम्सब में आ गये और 1999 में नवभारत टाईम्स से ही सेवानिवृत्तक हुए.

लगभग इक्कीदस बरस काक को सेवानिवृत्तस हो गये है परन्तुन कार्टून बनाना उनका जीवन है, कार्टून उनकी सांसे है. काक कहते है कि जब तक उनकी जीवन है, वह कार्टून बनाते रहेंगें.

उत्तर प्रदेश वाणिज्य कर विभाग में वाणिज्य कर अधिकारी नोएडा के पद पर कार्यरत. नौकरी में आने से पूर्व 1984 से 1986 तक जनसत्ता , दिनमान , नवभारत टाईम्स के लिय पत्रकारिता. कला और शास्त्रीय संगीत में रूचि. कला और संगीत विषयक लेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित.

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें