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दक्षिण के सिनेमा में उत्तर का एक्टर आदित्य ओम

आदित्य ओम टॉलीवुड में मशहूर हो चुके हैं. इस फिल्म इंडस्ट्री में बतौर एक्टर वे करीब 25 तेलुगू फिल्में कर चुके हैं.

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अभिनेता आदित्य ओम अभिनेता आदित्य ओम
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आदित्य ओम का सफर हिंदी रंगमंच से शुरू हुआ था. 
  • आदित्य दक्षिण की फिल्मों के एक जाने-पहचाने नाम बन चुके हैं.
  • आदित्य अंग्रेजी फिल्म ‘डेड एंड’ में भी काम कर चुके हैं

- प्रवीण कुमार सिंह 

पिछले दिनों आई दक्षिण भारतीय फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि अब उनकी सीमाएं बड़ा विस्तार पा रही हैं. आज दक्षिण भारत की फिल्में उत्तर भारत में भी खूब पसंद की जा रहीं हैं. दक्षिण के एक्टर भी लोगों के दिलो पर राज कर रहें हैं. लेकिन वहीं खबर यह भी है कि हिंदी पट्टी के एक्टर आदित्य ओम भी टॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में बहुत मशहूर हो चुके हैं. आदित्य को पसंद किए जाने की खूबसूरत मिसाल यह है कि वह टॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में बतौर एक्टर करीब 25 तेलुगू फिल्में कर चुके हैं. 

आदित्य के फिल्मों का सफर हिंदी रंगमंच से शुरू हुआ था. जैसा कि अमूमन बच्चों में होता है, आदित्य ओम बचपन में टीवी देखते-देखते एक्टर बनने का सपना देखने लगे. उनके इस सपने के बारे में जो भी सुनता वो उसे मजाक में लेता. आदित्य के पिता उनका ये सपना सुनकर थोड़ा गुस्सा हो जाते और उनको डांट देते. इस डांट के पीछे की एक वजह ये है कि छोटे शहर के किसी गैर-फिल्मी परिवार में बच्चे के हीरो बनने की बात ही फिल्मी लगती है.

आदित्य ओम का जन्म 1975 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में हुआ था. उनकी मां शिक्षिका थीं और पिता रामाशंकर सिंह प्रशासनिक अधिकारी थे. प्रशासनिक नौकरी की वजह से पिता का स्थानांतरण होता रहता था. आदित्य की शुरुआती पढ़ाई आजमगढ़ में हुई. वहीं 10वीं की पढ़ाई इलहाबाद में तो 12वीं उन्होंने वाराणसी में पूरी की.

आदित्य ओम के पिता का सपना था कि बेटा इंजीनियर बने. लिहाजा मुंबई विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग में दाखिला दिया गया. अब बॉलीवुड नगरी मुंबई पहुंचने के बाद तो हीरो बनने का सपना वैसे ही उछाल मारने लगता है. आदित्य ने जो सपना बचपन में देखा था, उसको पूरा करने का यहां अवसर मिला. और वहीं सबसे पहले थियेटर के प्रति उनका झुकाव हुआ. फिर क्या, आदित्य धीरे-धीरे ओम कटारिया, दिनेश ठाकुर, इप्टा, इम्प्लस के साथ जुड़ते चले गए. थिएटर में पहले बैक स्टेज, और फिर उन्होंने मेन स्टेज पर काम किया. कोर्ट मार्शल, काल कोठरी, मैकबेथे, जाति ही पूछो साधू की आदि नाटक में उन्होंने सशक्त भूमिकाएं निभाईं. उनके अभिनय और काम को सराहा गया तो उनका हौसला भी बढ़ा.

जब पिता को इस बारे में पता चला तो उनके लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था. उनको लगा कि उनका बेटा बर्बाद हो गया. वह आदित्य से बहुत नाराज हो गए और बातचीत ही बंद कर दी. कई साल तक पिता-पुत्र के बीच बोलचाल बंद रही. लेकिन आदित्य ओम ने हिम्मत नहीं छोड़ी और लगातार काम करते रहे. और धीरे-धीरे वे थियेटर के बाद फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने लगे. काफी मेहनत के बाद साल 2001 में बासु चटर्जी का सीरियल ‘हुआ सवेरा नाम का’ में उन्हें पहला मौका मिला, जो दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ. इससे उन्हें एक पहचान मिली. फिर तो उनकी दुनिया ही बदल गई. उसके बाद ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’, ‘जिंदगी तू ही पता’, ‘मंगलसूत्र’, ‘कगार’ आदि सीरियल में उन्होंने काम किया. ये धारावाहिक सोनी, सहारा टीवी, जीटीवी आदि पर प्रसारित हुए.

एक दिन टीवी पर जब सीरियल ‘कगार’ में पिता रामाशंकर सिंह बेटे आदित्य को देखे तो वे अवाक रह गए. उनको सहसा विश्वास नहीं हुआ. तुरंत वर्षों बाद बेटे को उन्होंने फोन किया और बेधड़क पूछा कि इस धारावाहिक में तुम्ही हो या कोई और है? आदित्य ने बताया कि हां मैं ही हूं. जब पिता को यकीन हो गया कि आदित्य ही है तो वो बहुत खुश हुए और बरसों की उनकी नाराजगी काफूर हो गई. उसके बाद आदित्य के पिता ने कभी उन्हें नहीं डांटा और न ही कभी नाराज हुए. बल्कि वो उनका साथ देने लगे और अक्सर हालचाल लेकर उनके काम की तारीफ भी करने लगे.

साल 2002 में तेलुगू फिल्मों के डायरेक्टर वाईएस चौधरी आदित्य का काम देखकर प्रभावित हुए और अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया. तेलुगू फिल्म ‘लाहिरी लाहिरी लहरिलो’ में आदित्य ने काम किया जो कि सुपरहिट हुई और डायमंड जुबली रही. वह फिल्म करीब एक साल तक सिनेमा हॉल में चली. दूसरी फिल्म ‘धन लक्ष्मी आई लव यू’ भी सुपरहिट हुई. फिर क्या आदित्य ओम के लिए तेलुगू फिल्मों की लंबी लाइन-सी लग गई. इस तरह करीब 25 तेलुगू फिल्मों में बतौर एक्टर काम कर चुके आदित्य आज दक्षिण की फिल्मों के एक जाने-पहचाने नाम बन चुके हैं.

साल 2006 में आदित्य ओम की कुछ फिल्में फ्लॉप हुईं तो उन्हें कुछ निराशा हुई. और वे तनाव में रहने लगे. तब उनके पिता ने हौसला दिया और बोले, "जहां तुम इतनी मेहनत से पहुंचे हो, उसे मत छोड़ो. आगे आने वाले समय में सब ठीक हो जाएगा." आदित्य ने अपने पिता की बात मान ली और पूरे मनोयोग के साथ फिर से काम करने लगे. पिता का आशीर्वाद था तो दोबारा सफलता मिलनी ही थी.
आदित्य ओम को जैसा मौका मिलता, वे उसे कभी नहीं छोड़ते. शायद इसीलिए एक्टर के अलावा विलेन का किरदार भी निभाने लगे. फिल्म ‘दहनम’ में उनका विलेन का किरदार बहुत ज्यादा पसन्द किया गया.   

आदित्य तेलुगू फिल्मों के अलावा यूपी-बिहार के हथियार संस्कृति पर बनी फिल्म ‘बन्दूक’ और शिक्षा पर केंद्रित ‘अलिफ’ में भी काम कर चुके हैं. ये सारी फिल्में समीक्षकों द्वारा सराही गई हैं. इनकी शॉर्ट फिल्म ‘माया मोबाइल’ और ‘फार माई मदर’ को देश-विदेश के फिल्म फेस्टिवल में कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

आदित्य अंग्रेजी फिल्म ‘डेड एंड’ में भी काम कर चुके हैं. यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजॉन प्राइम पर मौजूद है. आदित्य यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने एक्टिंग के अलावा फिल्म ‘मास्साहब’ का र्निदेशन भी किया. इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म एमएक्स प्लेयर पर देखा जा सकता है.

आदित्य ओम ने व्यवसायिक फिल्मों के अलावा मैला ढोने की सामाजिक प्रथा के ऊपर ‘मैला’ नाम से फिल्म बनाई है. इसके अलावा क्लाइमेट चेंज पर फिल्म ‘बंदी’ और ‘कोटा’, ‘बगावत’  एवं तेलुगू की विक्रम रिलीज होने वाली है.

आदित्य ओम फिल्मों के अलावा सामाज सेवा में भी आगे रहते हैं. उन्होंने तेलंगाना का चेरूपल्ली गांव गोद लिया है. वहां वे वृक्षारोपण, पुस्तकालय और छात्रों की आर्थिक मदद आदि कर रहे हैं. इस गांव और तांडूर सरकारी अस्पताल के लिए उन्होंने दो एम्बुलेंस भी दान किया है.
 

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