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आओ साथ चलें: राजस्थान में जल संवर्धन का अनूठा अभियान

राजस्थान के सूखे शेखावटी इलाके में 'आओ साथ चलें' नामक संस्था गांवों के तालाबों और हरियाली को पुनर्जीवित करने के अभियान में जुटी है.

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विष्णु मित्तल और 'आओ साथ चलें' संस्था के काम से जुड़े अन्य लोग विष्णु मित्तल और 'आओ साथ चलें' संस्था के काम से जुड़े अन्य लोग
स्टोरी हाइलाइट्स
  • शेखावटी इलाके में यह संस्था जल संरक्षण के काम में जुटी है
  • इस अभियान को विष्णु मित्तल अपने साथियों के साथ चला रहे हैं
  • इलाके के तालाब पुनर्जीवित हुए हैं और हरियाली बढ़ी है

-डॉ. मीना कुमारी जांगिड़

राजस्थान के सूखे शेखावटी इलाके का एक बहुत लोकप्रिय और सरस लोकगीत है- “कुण जी खुदाया कुवा बावड़ी, कुण जी खुदाया समद तालाब.” यह लोकगीत बीते युग में पारंपरिक जलाशयों की गाथा बताता रहा है. ऐसे लोगों की यशोगाथा जिन्होंने अपने गांवों में पीने के पानी की कमी नहीं होने दी. हालांकि लोग यह गीत तो गुनगुनाते रहे, लेकिन इसके संदेश को भूल गए. यह गीत बीते जमाने की बात हुई तो इलाके के जलाशय भी खंडहर होने लगे या मिटने लगे. लेकिन, दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर दूर राजस्थान के कोटपुतली के सुदरपुर गांव में कुछ उत्साही लोगों ने तय किया कि इस सूरत को बदलने के लिए ‘आओ साथ चलें.’ दरअसल, इस गांव के निवासी और अब दिल्ली में बसे विष्णु मित्तल ने अपने पुराने मित्रों का हाथ थामा और निकल पड़े गांव के खंडहर हो चुके जलाशयों को सुधारने. सुदरपुर को सुंदरपुर बनाने. ‘आओ साथ चलें’ अभियान के जरिये मित्तल और उनके साथी इस इलाके में जल संरक्षण ही नहीं, बल्कि जल संवर्धन का साइलेंट आंदोलन चला रहे हैं.

आज से चार साल पहले बनी यह टोली अपना काम खुद करने का माहौल बना रही है. अपने काम में शामिल है- अपना पानी, अपनी घास, अपना चारा, अपना ओरण, अपना लक्ष्य, अपना स्वाभिमान. मित्तल की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई यहीं से हुई थी, और चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने के बाद भी गांव से उनका मोह नहीं छूटा. बचपन में उन्होंने गांव के जिस तालाब में अठखेलियां की हों और बरगद की छांव में बुजुर्गों से किस्से सुने हों, उसी गांव में जलाशयों की सुधबुध लेने वाला कोई नहीं था. कभी जैव विविधता से भरपूर रहे इस गांव में महज कुछ रुटीन पेड़-पौधे ही बचे थे. कुओं का जलस्तर घटता जा रहा था और गांव पलायन की त्रासदी को झेल रहा था. ऐसे में मित्तल और उनकी टोली ने इस स्थिति को बदलने की ठानी.

मित्तल को एहसास हुआ कि जलाशय गांव के आधार थे और उन्हें हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए. मित्तल ने अपने साथियों को साथ लेकर गांव की आधारभूत व्यवस्था को लेकर किसानों से बातचीत की. उन्होंने गांव में जगह-जगह टोलियां बनाकर लोगों को इस काम से जोड़ने की कोशिश की. इस टोली ने लोगों का समझाया कि जल प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है. मित्तल के परदादा ने एक बावड़ी बनवाई थी. सबसे पहले उन्होंने उसी के जीर्णोद्धार का जिम्मा अपने कंधों पर लिया. लेकिन, यह काम व्यक्तिगत न लगे, इसलिए उन्होंने गांव के पोखर को भी उसके मूल स्वरूप में लौटाने का दायित्व उठाया. पोखर के पास बने मंदिर में ही गांव के सभी लोगों को जुटाया गया और गांव की स्थितियों के बारे में बातचीत की गई. लोगों ने अपने मोहल्ले, तालाब, कुओं, बीहड़ की स्थिति आदि की बात की. कहां क्या उजड़ गया और कहां क्या रोका जा सकता है, इसको लेकर सबने अपनी बात रखी. सबका एहसास हो गया कि यह सब किसी अकेले शख्स के बस की बात नहीं. फिर सबने तय किया कि आओ साथ चलें. इसी नाम से संस्था भी बन गई. मित्तल ने गांव वालों को भरोसा दिया कि वे वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं होने देंगे.

मित्तल ने लोगों से यह वादा भी लिया कि सब काम आम राय से मिल-जुल कर होगा. मंदिर, तालाब के किनारे तो कभी गांव के स्कूल में बैठकें होने लगीं. स्त्री-पुरुषों के साथ-साथ बच्चों को भी इस अभियान से जोड़ा गया. इस अभियान का सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगा. एक के बाद एक चौपाल होने लगी. खंडहर में तब्दील हो चुके जोहड़, बावड़ियां पुनर्जीवित होने लगी हैं. पांच तालाबों का पुनर्निर्माण किया जा चुका है. छठे तालाब का काम शुरू है. जोहड़ के किनारे पेड़ लगाए गए हैं तो आगौर में कई प्रकार की जड़ी-बूटियां लगाई गई हैं. अब तालाब और बावड़ियों का पानी न केवल पीने के के काम आने लगा है, बल्कि गांव का भूजल स्तर भी बढ़ा है. 

 

इस उत्साही टोली ने पानी के साथ-साथ वन, ओरण की परंपरा को भी समझा. तालाब का पायतन पहाड़ी तक फैला हुआ था. बारिश से होने वाले पानी को सही दिशा देकर उसे तालाब तक पहुंचाया गया ताकि तालाब में पानी सालभर बना रहे. पहाड़ी को हरा-भरा करने के लिए वृक्षारोपण भी करवाया गया. इसे रोजगार से भी जोड़ा गया. गांव की महिलाओं को दस-दस पेड़ लगाने की जिम्मेदारी दी गई. उसका मासिक मेहनताना भी तय किया गया. इसी प्रकार से यहां के केशव वाटिका में हर साल सैकड़ों पेड़ लगाए जा रहे हैं. 

इतना ही नहीं, महामारी के दौर में मदद का दायरा बढ़ाया गया. जहां भी जरूरत पड़ी, उसके हिसाब से यथासंभव मदद पहुंचाई गई. इसमें मुफ्त दवा वितरण. राशन वितरण, उपचार की व्यवस्था, कन्यादान आदि शामिल थे. कोटपुतली शहर के सरकारी अस्पताल में महामारी के समय मरीजों के तीमारदारों के लिए भोजन की समस्या बहुत बढ़ गई थी. दरअसल, आसपास के होटल और ढाबे बंद हो गए थे. संस्था ने एक अनूठी पहल की. इससे जुड़े मित्रों ने तय किया कि वे अपना जन्मदिन अस्पतालों में लोगों को एक दिन का भोजन करवा कर मनाएंगे. देखते-देखते इस काम से सैकड़ों लोग जुड़ गए. संस्था रजिस्टर्ड है और इसमें जरूरत के अनुसार ही धन संग्रह किया जाता है. कई व्यक्ति बिना आमदनी के इसमें काम करते हैं.

इस तरह से एक जुनून के साथ यह संस्था अपने अभियान में जुटी हुई है. इस अभियान को देखने गांव के बाहर के लोग, शुभचिंतक और मित्र भी इस गांव आते रहते हैं. बड़े ही आत्मीय भाव से उनका स्वागत होता है. तालाब के किनारे रावणहत्थे के साथ गीत गाता लोकगायक बैठकों को नए ढंग से रंग देता है. ढोलक की थाप, नगाड़े और मंदिर की घंटी गांव में गूंजने लगती है. पानी से भरे तालाब, वन में उभरती हरियाली, पक्षियों की करलव ध्वनि आदि ने फिर से इस इलाके को गुलजार कर दिया है. 

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