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गोरखपुर- क्या इस बार योगी बचा पाएंगे अपना गढ़?

गठबंधन ने 2018 में हुए उपचुनाव में जातिगत समीकरण साधकर, स्थानीय उम्मीदवार को उतारकर अपनी जीत पक्की की थी. लेकिन इस बार निषाद पार्टी ने भाजपा का दामन थाम लिया है. गठबंधन के नेताओं के मुताबिक निषाद समुदाय निषाद पार्टी के छल से आहत है. इसलिए निषाद वोट पिछली बार की तरह ही इस बार भी गठबंधन के ही पाले में जाएगा. उधर भाजपा निषाद पार्टी के अपने पक्ष में आने, इस चुनाव में योगी के सीधे हस्तक्षेप और रविकिशन के सेलिब्रिटी स्टेटस के सहारे अपनी जीत पक्की करने की पुरजोर कोशिश कर रही है. 

योगी आदित्यनाथ योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदियत्य नाथ के गढ़ गोरखपुर में हुए उपचुनाव में गठबंधन (समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निषाद पार्टी) ने भाजपा को भारी शिकस्त दी थी. इस बार भी गठबंधन अपनी जीत का दावा कर रहा है. योगी आदित्यनाथ भी शिकस्त के बाद बेहद चौकन्ने नजर आ रहे हैं. निषाद पार्टी को अपने पाले में करने से लेकर अभिनेता रविकिशना को टिकट देकर उनकी लोकप्रियता के जरिए मतदाताओं को अपने पाले में लाने तक हर संभव प्रयास भाजपा ने किया.

2018 में महागठबंधन की क्या स्ट्रेटजी थी?

गोरखपुर उपचुनाव में गठबंधन ने मिलकर जातिगत समीकरण को साधा था. यहां कुल मतदाता करीब 19.5 लाख है. गठबंधन ने मुस्लिम यादव, दलित, पासवान, और निषाद वोटों के गणित को समझकर और साधकर जीत हासिल की. स्थानीय समाजवादी नेता काली शंकर कहते हैं, ‘‘ इस बार भी गठबंधन इसी फार्मूले से जीतेगा. निषाद पार्टी हमारे साथ नहीं है लेकिन निषाद वोट हमारे ही साथ है.’’ इस सवाल पर की निषाद पार्टी अब भाजपा के साथ है. ऐसे में निषाद वोट क्या नहीं छिटकेगा? वे कहते हैं, ‘‘ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के साथ हम इस भरोसे के साथ आए थे कि वे निषादों को अतिपिछड़ी जाति में शामिल कर उन्हें आरक्षण दिलवाएंगे. उन्होंने ऐसा किया भी. 17 जातियों की सूची बनाकर केंद्र के पास भेजा है.  लेकिन केंद्र ने अभी इसे मंजूरी नहीं दी है. अगर वे निषाद पार्टी समुदाय का भला चाहती तो इस मुद्दे को भाजपा के सामने रखती. लेकिन ऐसा नहीं किया.’’ गोरखपूर ग्रामीण सीट से  पूर्व विधायक और समाजवादी नेता विजय बहादुर कहते हैं, ‘‘ निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद की भाजपा को वोट देने की अपील बुरी तरह फ्लाप होने वाली है इस बार. ’’ सपा के पूर्व विधायक के मुताबिक जीत की दूसरी अहम स्थानीय उम्मीदवार होना था. इस बार भी हमारा उम्मीदवार स्थानीय होने के साथ निषाद भी है. पिछली बार उपेंद्र शुक्ला भी बाहरी थे और इस बार रविकिशन भी बाहरी हैं.

योगी के पास क्या है गठबंधन के फार्मूले की काट-

जिले के स्थानीय भाजपा नेता आर.एम. अग्रवाल कहते हैं. गठबंधन की जीत का मुख्य कारण निषाद वोट का पूरी तरह उनके पक्ष में जाना था. इसके अलावा कहीं न कहीं योगी आदित्यनाथ का व्यस्तता के चलते गोरखपुर में वक्त कम गुजार पाना था. लेकिन इस बर दोनों ही फैक्टर पर पार्टी ने जमकर काम किया है. प्रदेश भाजपा सूत्रों के मुताबिक ‘‘ उम्मीदवार रवि किशन का सेलिब्रिटी स्टेटस जीत को और बड़ी जीत में तब्दील करने में कारगार रहेगा. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या रविकिशन का बाहरी होने का फैक्टर उनकी जीत के आड़े नहीं आएगा? इस पर अग्रवाल कहते हैं, ‘‘ पहली बात वे बाहरी नहीं हैं दूसरी बार उनकी लोकप्रियता हमारे पक्ष में जाएगी.''

2014 लोकसभा चुनाव के नतीजे-

2014 में योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी की राजमति निषाद को दोगुने से भी ज्यादा अंतर से हराया था. भाजपा के पाले में 5,39,127 (51.80 फीसदी) लाख वोट आए थे जबकि सपा के उम्मीदवार को 2,26,344 (21.75 फीसदी) वोट मिले थे. बसपा उम्मीदवार को 1,76,412 (16.95 फीसदी) लाख था.

2018 उप चुनाव के नतीजे

गठबंधन के उम्मीदवार को 4,56,513 लाख (48.87 फीसदी) वोट मिले थे जबकि भाजपा के उम्मीदवार को 4,34,632 लाख (46.53 फीसदी) वोट मिले थे.

किसके बीच है मुकाबला-

रवि किशन (भाजपा) और रामभुआल निषाद (सपा) के उम्मीदवारों के बीच मुख्य मुकाबला है. कांग्रेस से मधुसूदन त्रिपाठी हैं.

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