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सियासत में औरतों का टाइम आ गया!

देश के चुनावों में मतदान करने के लिए महिलाओं की संख्या बढ़ रही है. खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाएं मतदान करने के मामले में पुरुषों से आगे निकल रही हैं. ऐसे में राजनैतिक दल अब महिला मु्द्दों को घोषणा-पत्रों में शामिल करने पर हुए बाध्य. 

फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे

उत्तर भारत में ग्रामीण राजनीति में 'प्रधान पति' एक बेहद प्रचलित अनौपचारिक पद है. पंचायत में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद उनकी पद की कागजी दावेदारी तो पक्की हो गई थी लेकिन सामाजिक सोच उनके आड़े आती रही. महिलाओं को वोट डालने का अधिकार तो मिला पर वोट कहां पड़ेगा, इसका फैसला करने का अधिकार उन्हें आज भी कई जगहों पर नहीं है. लेकिन लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में लगातार महिला मतदाताओं की बढ़ती हिस्सेदारी और उनमें आई राजनैतिक जागरूकता से लगने लगा है, सियासत में महिलाओं का 'टाइम' आ गया है. 

पुरुष और महिलाओं के वोटिंग के आंकड़ों में कम होता फर्क

सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं, 2014 में महिला और पुरुष मतदाताओं की संख्या में दो फीसदी का अंतर रह गया है. 2014 के लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं का आंकड़ा जहां 65.63 फीसदी था वहीं पुरुष मतदाताओं का आंकड़ा 67.09 फीसदी रहा.

1962 में वोटिंग के आंकड़ों में जेंडर का यह फर्क  16.7 फीसदी था जबकि 2009 में यह घटकर 4.4 फीसदी रह गया और 2014 में यह फर्क दो फीसदी रह गया है. 2018 के विधानसभा चुनाव में पुरुष महिला मतदाताओं के आंकड़ों को आधार बनाएं तो अनुमान है कि यह फर्क 2019 में और कम हो जाएगा. 

2018 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं ने लिया बढ़-चढ़कर हिस्सा

छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटों में से 24 सीटों में महिला मतदाताओें का आंकड़ा पुरुषों से ज्यादा रहा. 230 विधानसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश की 51 सीटों में महिला मतदाता आगे रहीं.

राजस्थान में महिला मतदाताओं का आंकड़ा 74.66 फीसदी और पुरुष मतदाताओं का आंकड़ा 73.80 फीसदी रहा. कुल मिलाकर महिलाएं पुरुषों के मुकाबले आगे दिखीं.

शहरी महिलाओं को पछाड़ती ग्रामीण ब्रिगेड

मजेदार बात यह है कि शहरी महिलाओं से आगे गांव की महिलाएं हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि शहरी महिला मतदाता 78 फीसदी रहीं और ग्रामीण महिला मतदाता 86 फीसदी रहीं.

अगर देश को पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में बांटे तो सबसे ज्यादा दक्षिण की महिलाओं ने मतदान को लेकर सक्रियता दिखाई. जहां दक्षिण में 91 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले वहीं पश्चिम में 83 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले.

सीमित मगर आंखे खोलने वाला सर्वे

कांग्रेस ने दिसंबर, 2018 में राजस्थान के करौली में औरतों के वोट डालने के व्यवहार को जानने के लिए सर्वे किया. 40,000 औरतों के बीच किए इस सर्वे में जवाब चौंकने वाले थे. 75 फीसदी औरतों ने कहा, वे अपने आदमियों से अलग और स्वतंत्र रूप से उम्मीदवार को चुनने का फैसला लेती हैं. 

2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में भी खुद-मुख्तार दिखीं औरतें!

2009 में किए गए सीएसडीएस के सर्वे के अनुसार भी औरतें वोट डालने का फैसला खुद ही लेती हैं. सर्वे में औरतों से तीन सवाल पूछे गए. पहला, क्या आपके वोट की अहमियत है? सैंपल में ली गई औरतों में से 76 फीसदी ने कहा 'नहीं' और 89 फीसदी ने कहा 'हां'. दूसरा सवाल था, क्या आप अपना वोट खुद तय करती हैं? जवाब में 82 फीसदी ने कहा 'नहीं' और 88 फीसदी का जवाब 'हां' में था.

महिला मुद्दों पर सजग पार्टियां

2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणा-पत्र में संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी को 33 फीसदी करने का आश्वासन कांग्रेस ने दिया था. यहां तक कि कांग्रेस ने महिलाओं के लिए सैनिटरी नैपकिन मुफ्त करने और महिला पुलिस स्टेशन की संख्या बढ़ाने का वादा किया था. तो दूसरी तरफ भाजपा ने सेल्फ डिफेंस की कक्षाएं महिलाओं के लिए मुफ्त लगाने और न्यायपालिका में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने का वादा किया था. 

भाजपा की महिला मतदाताओं पर गहरी नजर

मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक विधेयक लाने के लिए जंग लड़ने की बात हो, या उज्ज्वला योजना लाकर किचन के जरिए महिलाओं के दिल तक पहुंचने का रास्ता हो, मातृत्व अवकाश को 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते करना हो या फिर खुले में शौचमुक्त भारत का सपना दिखाना, इन सभी योजनाओं के जरिए भाजपा महिला मतदाताओं को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश में लगी है. सबरीमला मामले में भी भाजपा ने जो स्टैंड लिया वह भी कहीं न कहीं महिलाओं के बीच अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उठाया गया कदम है. अयप्पा के मौलिक अधिकार के समर्थन में उतरी औरतें कहीं न कहीं भाजपा के लिए उम्मीद जगाने वाली हैं. 

महिलाओं की वोटिंग में बढ़ती हिस्सेदारी, सर्वे में महिलाओं के बेबाक जवाब और चुनावी वादों में महिलाओं के मुद्दों की बढ़ती संख्या बताती है कि औरतें सियासी पटल पर लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं. यह बात अजीब जरूर लगेगी लेकिन जमीन पर जाकर इसे समझा जा सकता है कि महिलाएं उम्मीदवार चुनने का फैसला अपने घर के पुरुषों की पसंद को ध्यान में रखकर ही लेती हैं. हां, ये बात सच है कि अब पुरुष औरतों से सीधे यह नहीं कहते कि वो किसे वोट डालें. लेकिन इन सबके बीच इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिला मतदाताओं की बढ़ी संख्या और घोषणा-पत्रों में महिलाओं के मुद्दों को मिलती तवज्जो एक बड़े बदलाव की तरफ इशारा करती है.

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