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चुनावी चर्चा से हलकान भाजपा

लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले भाजपा की चुनौती चुनावी नैरेटिव (चर्चा) बन गई है. पार्टी देश भर की उस चर्चा को बदलने की कोशिश में लगी है जिसके तहत विपक्षी दलों के गठबंधन की कसौटी पर भाजपा को कसा जाने लगा है. 

इंडिया टुडे इंडिया टुडे

लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले भाजपा की चुनौती चुनावी नैरेटिव (चर्चा) बन गई है. पार्टी देश भर की उस चर्चा को बदलने की कोशिश में लगी है जिसके तहत विपक्षी दलों के गठबंधन की कसौटी पर भाजपा को कसा जाने लगा है. पार्टी यह मानकर चल रही है कि यदि जल्द ही चुनावी चर्चा के मुख्य केंद्र में पीएम मोदी और एनडीए सरकार की उपलब्धि स्थान नहीं बना पाई तो 2019 के चुनाव में बड़ा नुक्सान हो सकता है.

भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी की तरफ से देश भर से जो फीडबैक मिल रहे हैं उसमें यह बात सामने आ रही है कि हर राज्य में लोग यह चर्चा कर रहे हैं कि गठबंधन की स्थिति में भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है. जिस तरह से भाजपा के खिलाफ राज्यवार स्थानीय दलों का गठबंधन बनता जा रहा है उससे भाजपा  को परेशानी हो सकती है. 

चर्चा में यह बात भी उभर कर सामने आ रही है कि मोदी के पक्ष में वह माहौल बनता नहीं दिख रहा है जो 2014 के दौरान था. सरकार के विकास कार्यों को लेकर कोई सकारात्मक चर्चा नहीं है. साथ ही लोग कांग्रेस की उस चर्चा का हिस्सा बनते जा रहे हैं जो उसकी (कांग्रेस) तरफ से राफेल, नोटबंदी, जीएसटी और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर बातें कही जा रही हैं.

भाजपा इस सियासी चर्चा को समझ रही है. इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में वरिष्ठ नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली को कार्यकर्ताओं से यह अपील करनी पड़ी कि चुनावी नैरेटिव (चर्चा) को अपने पक्ष में करने की जरूरत है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि जाकर अपने जान पहचान के लोगों के बीच मोदी जैसे मजबूत नेता को चर्चा का केंद्र बनाएं. यह कोशिश करें कि चुनाव को लेकर लोग यह बात करना शुरू कर दें कि मोदी के मुकाबले विपक्ष के पास कौन सा नेता है. 

उन्होंने यह  भी कहा कि चुनावी नैरेटिव ही वह फैक्टर है जो लोगों का मूड बनाता है. इसलिए यह विपक्ष के हाथों में चुनावी नैरेटिव नहीं जाने दें.

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