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भाजपा के लिए टेढ़ी खीर है पंजाब में जीतना

पंजाब में हाल में हुए निकाय चुनावों में भगवा पार्टी का सफाया हो गया. राज्य में भाजपा का भविष्य अंधकारमय नजर आता है जब तक कि यह कोई नई रणनीति नहीं तलाश लेती.

अमृतसर में एक चुनावी रैली के दौरान अमित शाह और हरदीप सिंह पुरी (एएनआइ) अमृतसर में एक चुनावी रैली के दौरान अमित शाह और हरदीप सिंह पुरी (एएनआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • निकाय चुनाव में कांग्रेस ने ज्यादातर पदों पर कब्जा जमाया
  • चुनाव के दौरान हिंसा की भी कुछ घटनाएं हुईं और भाजपा तथा अकाली दल के कुछ नेताओं ने हेराफेरी का आरोप भी लगाया
  • भाजपा के खराब प्रदर्शन की एक बड़ी वजह केंद्र सरकार के खिलाफ किसानों का मौजूदा प्रदर्शन है

भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल समेत दक्षिण के पांच राज्यों में अपनी पैठ बनाने के लिए भागदौड़ कर रही है, लेकिन घर के नजदीक पंजाब में उसके पैर उखड़ते नजर आ रहे हैं. हाल में इस राज्य में हुए शहरी निकायों के चुनाव में, जो कि इस पार्टी ने पिछले 25 साल में पहली बार अपने पूर्व साझेदार शिरोमणि अकाली दल के बगैर लड़ा, इसका सूपड़ा साफ हो गया. चुनाव में कांग्रेस ने ज्यादातर पदों पर कब्जा जमाया.  

चुनाव के दौरान हिंसा की भी कुछ घटनाएं हुईं और भाजपा तथा अकाली दल के कुछ नेताओं ने हेराफेरी का आरोप भी लगाया. शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के अध्यक्ष सुखबीर बादल जिन्हें जेड प्लस सुरक्षा हासिल है, उन पर हमला हुआ और राज्य भाजपा अध्यक्ष अश्विनी शर्मा तथा महासचिव सुभाष शर्मा पर भी दो से ज्यादा हमले हुए. भाजपा का भी कहना है कि 10 जिलों में उसके चुनाव दफ्तरों पर तोड़फोड़ हुई. कई वार्डों में कांग्रेस प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुए क्योंकि विपक्षी उम्मीदवार के नामांकन पत्र या तो दाखिल नहीं हो सके या फिर उन्हें खारिज कर दिया गया. एसएडी ने राज्यपाल वी.पी. सिंह बदनौर को ज्ञापन देकर उन जिलों में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है जहां विपक्षी उम्मीदवारों के नामांकन थोक में खारिज किए गए हैं. कुछ लोग दलील दे रहे हैं कि इन परिणामों को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की झलक के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता क्योंकि वे विधानसभा चुनाव निर्वाचन आयोग करवाता है जबकि निकाय चुनाव राज्य प्रशासन की देखरेख में होते हैं. हालांकि अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के लिए ये शानदार जीत मतदाताओं के मौजूदा मूड का सूचक है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) जिसे सिख पार्लियामेंट भी कहते हैं, के चुनाव भी राज्य में जल्द ही होने वाले हैं.   

भाजपा और एसएडी के कमजोर प्रदर्शन के लिए विश्लेषक कई कारण गिनवाते हैं. वे पहली दलील देते हैं कि मतदाता भारी संख्या में वोट डालने नहीं निकले. दूसरा, भाजपा और एसएडी के नेता पिछले साल केंद्र के कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूटे गठबंधन को दोबारा जोड़ने में नाकाम रहे. भाजपा के खराब प्रदर्शन की तीसरी वजह केंद्र सरकार के खिलाफ किसानों का मौजूदा प्रदर्शन है जिसे पंजाब में जोरदार समर्थन हासिल है.  

आने वाले दिनों में एसएडी के सुखबीर बादल के नेतृत्व वाले धड़े को एसजीपीसी चुनाव के लिए तेजी से तैयारी करनी होगी. इन चुनावों में किसान एक बड़े मतदाता समूह हैं. सुखबीर बादल को सुखदेव सिंह ढींढसा के गुट का सामना करना पड़ेगा जिसे आप, कांग्रेस और भाजपा का समर्थन हासिल है. बादल को चुनौती देने के लिए ढींढसा ने वकील से नेता बने एच.एस. फूलका और अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार रंजीत सिंह और बादल खेमे के असंतुष्ट नेताओं से तालमेल किया है. इन चुनावों की घोषणा केंद्रीय गृह मंत्रालय करता है और चुनाव कराने का जिम्मा राज्य प्रशासन- पंजाब (कांग्रेस की अमरिंदर सरकार), हिमाचल प्रदेश (भाजपा की जयराम ठाकुर सरकार), हरियाणा (भाजपा की मनोहर लाल खट्टर सरकार) और जम्मू-कश्मीर व चंडीगढ़ में केंद्र सरकार का होता है. उम्मीद है कि ये चुनाव इस साल अगस्त में होंगे. इनके नतीजों से न सिर्फ यह स्पष्ट होगा कि एसजीपीसी पर किसका नियंत्रण होगा बल्कि ये भी पता चलेगा कि शिरोमणि अकाली दल का कौन सा धड़ा शीर्ष पर होगा. स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों से बादल के नेतृत्व वाले एसएडी के धड़े का आत्मविश्वास नहीं बढ़ा है. भाजपा से एसएडी के गठबंधन का कोई सवाल ही नहीं उठता है. इससे भविष्य में भाजपा को नुक्सान होगा जिसके राज्य की 13 लोकसभा सीटों में से सिर्फ दो सांसद हैं और 117 सीटों वाली विधानसभा में दो विधायक हैं.  

स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए आंखें खोलने वाले हैं. पंजाब राज्य के गठन के बाद से ही सिख कट्टरपंथ के भय से शहरी हिंदू वोटर कांग्रेस और भाजपा (तब के जनसंघ) के बीच झूलते रहे हैं. भगवा पार्टी के लिए थोड़ी सी उम्मीद भरी बात ये हो सकती है कि इसने अपने बैनर तले 50 प्रतिशत सीटों पर चुनाव लड़ा और अपने असर से बाहर के माझा और दोआबा क्षेत्र कुछ सीटें जीती हैं. अमरिंदर सिंह सरकार के समक्ष चुनौती पेश करने से पहले पार्टी को अपने कोर मतदाताओं का विश्वास जीतना होगा. हालांकि भाजपा का हिंदुत्ववादी एजेंडा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी असर अब भी शहरी हिंदुओं पर है लेकिन राज्य इकाई को इसे चुनावी परिणाम में बदलने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी.  

अभी किसानों के प्रदर्शन के चलते भाजपा बैकफुट पर है. आगे बढ़ने के लिए इसका एक कामयाब हल जरूरी है. इसके लिए जमीनी स्तर तक संदेश पहुंचाने के लिए पार्टी को कड़ी मेहनत करनी होगी. हालांकि केंद्र सरकार ने किसानों के गुटों से कई दौर की बातचीत की है और उनके समक्ष कृषि कानून 18 महीने तक स्थगित रखने की पेशकश भी की है. लेकिन किसानों के गुट कृषि कानून वापस लेने की मांग पर अड़े हुए हैं. भाजपा की राज्य इकाई को किसान समूहों के साथ बातचीत का रास्ता ढूंढने की काबिलियत पैदा करनी होगी जिसमें स्थानीय नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी और जैसा कि पंजाब में कहा भी जाता है कि प्रभावी जट सिख नेता से संवाद का तरीका दूसरे प्रभावी जट सिख नेता के मार्फत ही हो सकता है. हालांकि भाजपा का पूर्व सहयोगी एसएडी अपने राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा है. ऐसे में भाजपा को अपना आधार तैयार करने के लिए किसानों तक अपनी धारणाएं पहुंचानी होंगी.  

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा सहयोगियों का नया गठबंधन तैयार करने का प्रयोग कर रही है जिनमें वे भी शामिल हैं जो धार्मिक संगठनों और प्रशासन में जट सिखों के दबदबे से आजिज आ चुके हैं. हालांकि भगवा पार्टी को हरियाणा और उत्तर प्रदेश में ऐसा करने में कुछ कामयाबी मिली है लेकिन पंजाब की स्थिति कहीं जटिल है क्योंकि यहां जट सिख न केवल पॉवर सेंटर पर दबदबा रखते हैं बल्कि सामाजिक तौर पर भी वे अगुआ हैं. 1966 से चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बने पंजाब में हमेशा इस समुदाय से मुख्यमंत्री रहा है सिवाय ज्ञानी जैल सिंह के जो कि ओबीसी सिख थे. इसमें किए जाने लायक बहुत कुछ है- जट सिखों की राज्य के मतदाताओं में हिस्सेदारी 18 प्रतिशत है जबकि दलितों का हिस्सा 32 प्रतिशत है. हालांकि पंजाब के दलित किसी एक पैटर्न पर वोट नहीं करते.  

भाजपा को अपना दायरा रविदास समुदाय के अपने आधार से ज्यादा व्यापक करना होगा जिससे सोमप्रकाश (भाजपा के उद्योग और वाणिज्य मंत्री सोमप्रकाश) और अनुसूचित जाति आयोग के नए अध्यक्ष विजय सांपला आते हैं. राज्य में चार दलित धड़े हैं- वाल्मीकि, मजहबी सिख, रामदासिया और रविदासी (सूफी गायक और राजनेता हंस राज हंस वाल्मीकि समुदाय से हैं). भाजपा की दलित सिख समुदाय-मजहबी सिख और रामदासिया में कोई मौजूदगी नहीं है. दलित सिख वोटर जट सिख बहुल एसएडी के विरोध स्वरूप सामान्य तौर पर कांग्रेस को वोट देते हैं. स्थानीय निकाय चुनाव नतीजों का अंतिम निष्कर्ष तो यही है कि इससे भाजपा को गहरा धक्का लगा है. जब तक पार्टी अपने परंपरागत मतदाताओं का विश्वास नहीं जीतती और उन्हें यह समझाने में सफल नहीं होती कि अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का बेहतर विकल्प वह बन सकती है, तब तक राज्य में भाजपा का राजनीतिक वजूद अंधकारमय लगता है. 

अनुवादः मनीष दीक्षित

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