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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पत्थलगड़ी के मामले क्यों वापस लेना चाहते हैं

झारखंड सरकार 2017 और 2018 के दौरान दायर पत्थलगड़ी से जुड़े सारे मुकदमे वापस लेने की तैयारी कर रही है, ऐसे में कुछ लोग जानना चाहते हैं कि इस फैसले से कैसी नजीर बनाई जा रही है.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (सोमनाथ सेन) झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (सोमनाथ सेन)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यह मामला आदिवासी भूमि का अधिग्रहण करने के लिए पूर्व झारखंड सरकार के भूमि कानूनों में संशोधन की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ था
  • लेकिन जल्दी ही यह हिंसक और अलगाववादी आंदोलन में तब्दील हो गया था
  • इसके तहत राज्य के 24 जिलों में से तीन जिलों के ग्रामीणों ने अपने इलाके में प्रशासन का सारा काम अपने हाथ में ले लिया

अमिताभ श्रीवास्तव

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कार्यालय ने 26 मार्च को राज्य के गृह विभाग के उस फैसले को औपचारिक स्वीकृति दे दी, जिसके तहत 2017 और 2018 के दौरान पत्थलगड़ी से जुड़े सारे मुकदमों को वापस लिया जाना है. इस फैसले की वजह से राज्य में प्रशंसा और आशंका, दोनों शुरू हो गई है.

मोटे तौर पर यह मामला आदिवासी भूमि का अधिग्रहण करने के लिए पूर्व झारखंड सरकार के भूमि कानूनों में संशोधन की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ था. लेकिन जल्दी ही यह हिंसक और अलगाववादी आंदोलन में तब्दील हो गया, जिसके तहत राज्य के 24 जिलों में से तीन जिलों के ग्रामीणों ने अपने इलाके में कारोबार और शिक्षा से लेकर सरकारी दफ्तर चलाने और पीडीएस दुकानों को संभालने तक लगभग सारे मामलों में प्रशासन का सारा काम अपने हाथ में ले लिया. सूत्रों का यह भी आरोप है कि माओवादियों ने राज्य पुलिस बल पर अतिरिक्त दबाव बनाने के लिए इस आंदोलन को उकसाया.

पंचायत (एक्स्टेंशन ऑफ शेड्यूल्ड एरिया) ऐक्ट, 1996—जिसे आम तौर पर पेसा ऐक्ट के रूप में जाना जाता है—के तहत देशभर के अनुसूचित क्षेत्रों की पंचायतों और ग्रामसभाओं को सामुदायिक स्थलों, परंपरा और संस्कृति के मामले में स्वायत्तता दी गई थी. अहम बात यह है कि इसी कानून में भूमि अधिग्रहण के लिए उनकी सलाह/मंजूरी को भी जरूरी बना दिया गया था. लेकिन 2016 में मुख्यमंत्री रघुबर दास की तत्कालीन झारखंड सरकार ने दो अध्यादेशों को पारित कराके आदिवासी भूमि के वाणिज्यिक इस्तेमाल की इजाजत दे दी और राज्य की ओर से आदिवासी भूमि के अधिग्रहण का तरीका आसान बना दिया. इसकी वजह से प्रदर्शन शुरू हो गए, आदिवासी गांवों ने अपने इलाके की निशानदेही करते हुए नुकीले पत्थर गाड़ दिए—पत्थलगड़ी—और राज्य की सत्ता को मानने से इनकार कर दिया.

जिन 172 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए उनमें से राज्य पुलिस ने 96 के खिलाफ पुलिस अधिकारियों पर हमले, अधिकारियों या सांसदों के रक्षकों को अगवा करने की साजिश, पुलिस थानों पर हमला करने और पुलिस अधिकारों से हथियार लूटने जैसे संगीन अपराधों का इल्जाम लगाया है. (एक ओर जहां खबरों में हजारों लोगों खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा करने की बात बताई जा रही थीं, वहीं असल में महज 172 आरोपपत्र दाखिल किए गए.) दूसरी तरफ, कई आदिवासियों और ऐक्टिविस्ट ने जोर देकर कहा कि यह आंदोलन नए कानून लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस की तैनाती के खिलाफ प्रतिक्रिया थी. उन्होंने पुलिस की बर्बरता और ज्यादती का आरोप लगाया. आदिवासी और ऐक्टिविस्ट राज्य की नई सरकार के फैसले पर खुशी जाहिर कर रहे हैं, लेकिन इन जिलों—मुख्यतः सराईकेला-खरसवान, खुंटी और पश्चिम सिंहभूम—में तैनात राज्य सरकार के अधिकारी नाखुश हैं और सवाल कर रहे हैं कि इस फैसले से किस तरह की नजीर बनाई जा रही है.

ये तीनों जिले मुंडा आदिवासियों के गढ़ हैं, जो राज्य में तीसरा सबसे बड़ा आदिवासी समूह है और पत्थलगड़ी आंदोलन के सबसे मजबूत समर्थक हैं. रांची में एक पुलिस अधिकारी का कहना है, ‘‘पुलिस पर हमला करने वाले, उनके हथियार चुराने वाले और देशद्रोह में शामिल होने वाले लोगों को आजाद करके मुख्यमंत्री कोई अच्छी नजीर नहीं पेश कर रहे हैं.’’ उनका आरोप है कि यह फैसला राजनैतिक हित को ध्यान में रखकर किया गया है, और यह कि इससे राज्य पुलिस का नैतिक बल कम होगा.

अगस्त 2017 में जब मुख्यमंत्री रघुबर दास झारखंड सरकार का नेतृत्व कर रहे थे तब पत्थलगड़ी आंदोलन हिंसक हो गया था और आदिवासियों ने इन जिलों में सरकारी अधिकारियों का प्रवेश रोक दिया था. आदिवासियों की बस्ती की सीमाबंदी करने के लिए पत्थर के स्लैब गाड़कर उन्हें अपनी ग्राम सभाओं से शासित गांव बना दिया गया था. मुख्यमंत्री दास ने पत्थलगड़ी को ‘‘राष्ट्र विरोधी समूहों’’ की ओर से अपनाया गया ‘‘अलगाववादी तरीका’’ करार दिया था. इस आंदोलन का सबसे खराब चेहरा 19 जून, 2018 को उस समय सामने आया जब कथित तौर पर पत्थलगड़ी प्रदर्शनकारियों ने पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया. हमलावरों ने पीड़िताओं को कथित तौर पर बताया कि उन्हें राज्य प्रशासन की ओर से पत्थलगड़ी विरोधी पर्चे बांटने के लिए ‘‘दंडित’’ किया जा रहा है. एक बलात्कारी की पहचान बाजी समद के रूप में की गई, जो माओवादी से अलग हुए गुट पीपल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया का एरिया कमांडर था. इससे राज्य सरकार को यह भरोसा हो गया कि प्रदर्शन का सरोकार सिर्फ भूमि अधिग्रहण से ही नहीं है. लेकिन बड़े पैमाने पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती से आदिवासियों को आरोप की और वजहें मिल गईं. उन्होंने पुलिस की बर्बरता और ज्यादती की शिकायत की.

हालांकि हेमंत सोरेन ने इन मामलों को देखने के लिए आयुक्तों, पुलिस अधिक्षकों और सरकारी वकीलों को शामिल करके तीन स्तरीय समितियां बनाई है, लेकिन इन मामलों की वापसी कुछ समय में होना तय है. ये समितियां मामलों को वापस लेने से जुड़े मुद्दों को देखकर अपनी रिपोर्ट देगी, उसके बाद राज्य सरकार इन मामलों की वापसी के लिए अदालत में अर्जी दाखिल करेगी, जिनमें से कई देशद्रोह से जुड़े हुए हैं. गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ने दिसंबर 2019 में सत्ता में आने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में पत्थलगड़ी से जुड़े सारे मामले वापस लेने का वादा किया था.

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