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आखिर क्यों जरूरी हो गया है छत्तीसगढ़ से पीएलजीए बटालियन नं-1 का सफाया

माओवादियों के नियंत्रण वाले दक्षिणी छत्तीसगढ़ पर नियंत्रण के लिए इस बटालियन का सफाया करना बहुत महत्वपूर्ण है.

छत्तीसगढ़ में शहीद हुए एक जवान के ताबूत को ले जाते सीआरपीएफ के सुरक्षाकर्मी (पीटीआइ) छत्तीसगढ़ में शहीद हुए एक जवान के ताबूत को ले जाते सीआरपीएफ के सुरक्षाकर्मी (पीटीआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बीजापुर में 3 अप्रैल को हुए मुठभेड़ में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए
  • अनुमान है कि पीजीएलए की बटालियन नंबर 1 में 180 लोग हैं जो कि दो लड़ाकू दलों में बंटे हुए हैं
  • इसका पहला बड़ा हमला ताड़मेटला में साल 2010 में हुआ था जिसमें सीआरपीएफ के 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में 3 अप्रैल को माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़, पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की नंबर एक बटालियन व इसके कमांडर हिडमा के साथ सुरक्षा प्रतिष्ठान की लंबी लड़ाई का ही एक उदाहरण है. इस खूनी मुठभेड़ में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए. माओवादियों के नियंत्रण वाले दक्षिणी छत्तीसगढ़ पर नियंत्रण के लिए इस बटालियन का सफाया करना बहुत महत्वपूर्ण है.  

3 अप्रैल को सुरक्षा बलों को सुराग मिला कि हिडमा और उसकी बटालियन सुकमा व बीजापुर जिले की सीमा के जंगलों में मौजूद है. बताया जाता है कि लापता सीआऱपीएफ (सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स) जवान राकेश्वर सिंह मन्हास माओवादियों की गिरफ्त में हैं, जो कि उसे छोड़ने के लिए अफसरों से सौदेबाजी कर रहे हैं.   

पीएलजीए बटालियन नंबर 1 में आखिर ऐसा क्या है जो इसे अन्य माओवादी गुटों से अलग बनाता है और आखिर माओवादियों के गढ़ दोरनापाल-जगरगुंडा से बटालियन नंबर 1 का खात्मा सुरक्षा बलों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है. पिछले कुछ महीनों से सुरक्षा बल इस इलाके में नए कैंप बनाते जा रहे हैं जो कि सुकमा और बीजापुर जिलों की सीमा पर हैं. सुरक्षा बल हर नए कैंप के साथ नए इलाके में दाखिल हो रहे हैं जिससे खालिस माओवादियों के कब्जे वाले इलाके सिकुड़ते जा रहे हैं. इसका मतलब है कि दोनों पक्षों के बीच ये मुठभेड़ होना लगभग तय था.    

अनुमान है कि पीजीएलए की बटालियन नंबर 1 में 180 लोग हैं जो कि दो लड़ाकू दलों में बंटे हुए हैं. सुरक्षा बलों के मुताबिक, इसका पहला बड़ा हमला ताड़मेटला में साल 2010 में हुआ था जिसमें सीआरपीएफ के 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे. कहा जाता है कि बटालियन में आला दर्जे का अनुशासन है. इसके लड़ाके उसी एरिया से हैं और एक दूसरे से उनके ताल्लुकात हैं जिससे विरोधियों को उनमें सेंध लगाने का मौका नहीं मिलता. 

साथ ही बटालियन नंबर 1 हथियारों से सुसज्जित है, इसके पास एके सीरीज की राइफलें, मोर्टार और यूबीजीएल (अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर) भी हैं. माओवादियों के पदानुक्रम में रैंक के हिसाब से हथियार दिए जाते हैं. लिहाजा हथियार की उपलब्धता से ही बटालियन का महत्व पता चल जाता है. बटालियन की आर्थिक जरूरतें भी बेहतर ढंग से पूरी की जाती हैं. दूसरी माओवादी लड़ाकू संरचनाओं के विपरीत बटालियन नंबर 1 का अपना सप्लाई सिस्टम और संचार विंग है, जिसमें मोबाइल फोन का इस्तेमाल सख्ती से प्रतिबंधित है ताकि उनका पीछा न किया जा सके. बटालियन का साल का काफी समय तैयारी में व्यतीत होता है और इसका लक्ष्य बड़े हमले करना होता है.  

छत्तीसगढ़ के एक आला पुलिस अफसर कहते हैं, “छत्तीसगढ़ में माओवादियों से जंग जीतने में बटालियन नंबर 1 को कमजोर करना या साफ करना बहुत अहम है. बटालियन को निशाने पर लेना एक सतत प्रक्रिया है और 3 अप्रैल की मुठभेड़ इसी का एक हिस्सा थी. माओवादियों के नियंत्रण वाला इलाका सिकुड़ रहा है. बटालियन नंबर 1 को यहां से खदेड़ने से दक्षिणी दोरनापाल का पूरा इलाका सुरक्षा बलों के कब्जे में आ जाएगा.” 

हिडमा के सिर पर 25 लाख का इनाम है. स्थानीय छत्तीसगढ़ी माओवादियों में वह सबसे ऊंची रैंक का है. साथ ही वह माओवादियों के दंडकारण्य स्पेशल जोन कमेटी का सदस्य भी है. हिडमा और उसकी बटालियन की मौजूदगी का सुराग मिलने के बाद 2 अप्रैल को करीब 2,000 सुरक्षाकर्मियों को उनसे मुकाबले के लिए तैनात किया गया. सुरक्षाकर्मियों ने अपने कैंप एक रात पहले ही छोड़े थे कि एक साथ सटे तीन गांवों-जोनागुडा, टेकलगुडमा और जीरागांव में मुठभेड़ शुरू हो गई. सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला हुआ. ये मुठभेड़ करीब तीन घंटे चली. शाम तक सुरक्षाबल तेर्राम के शिविर में लौट आए और जब जवानों की गिनती शुरू हुई तो पता चला कि पांच मारे गए जवानों की शुरुआती संख्या पांच के अलावा भी एक दर्जन से ज्यादा सुरक्षाकर्मी लापता हैं. 4 अप्रैल को सुरक्षाबल फिर मुठभेड़ वाली जगह पर पहुंचे और वहां से 17 और शव लेकर आए.  

सुरक्षा दल में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी), छत्तीसगढ़ पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) और सीआरपीएफ के कोबरा भी शामिल थे. शहीद जवानों में डीआरजी के आठ जवान, एसटीएफ के 6, कोबरा के सात और सीआरपीएफ की बस्तरिया बटालियन का एक जवान शामिल है. महिला माओवादी माडवी वनोजा का शव भी बरामद हुआ है. 13 सुरक्षाकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं जबकि 18 को मामूली चोटें आईं. छत्तीसगढ़ पुलिस के एक रिटायर्ड अधिकारी कहते हैं कि कुछ और लीक से हटकर सोचे-समझे ऑपरेशन की जरूरत है. अगर माओवादियों की संख्या करीब 300-400 थी तो वहां पर 1,000 प्रशिक्षित सुरक्षा बलों को तैनात किया जाना चाहिए था. नारायणपुर जिले में 23 मार्च को पांच सुरक्षाकर्मी एक आइईडी विस्फोट में शहीद हो गए थे. माओवादी अपने सालाना रणनीतिक अभियान के तहत 20 फरवरी से 25 अप्रैल तक सुरक्षाबलों पर हमले बढ़ा देते हैं.  

अनुवादः मनीष दीक्षित

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