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कौन शामिल होगा मोदी कैबिनेट के अगले फेरबदल में?

सुशील कुमार मोदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, हेमंत बिस्व सरमा दावेदार माने जा रहे हैं क्योंकि अच्छा प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत करने के साथ राजनीतिक और चुनावी संतुलन कायम रखने की राह पर चल रही है भाजपा.

प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (एएनआइ) प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (एएनआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार की नई सरकार में सुशील कुमार मोदी वापसी नहीं कर सके
  • इस घटनाक्रम के बाद मोदी कैबिनेट में फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं
  • शाहनवाज हुसैन, मीनाक्षी लेखी और जी.वी.एल. नरसिम्हा राव भी मंत्री पद की बाट जोह रहे हैं

बिहार में नीतीश कुमार लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे हैं. लेकिन उनकी कैबिनेट का एक सबसे महत्वपूर्ण चेहरा नीतीश के नेतृत्व वाली जद (यू)-भाजपा सरकार में वापसी न कर सके. सुशील कुमार मोदी, जो कि बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सबसे जाना पहचाना चेहरा हैं, इस बार उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ले सके. वे इस पद पर 10 साल से ज्यादा वक्त तक काबिज रहे. उनकी जगह पर बिहार सरकार में भाजपा के दो उप-मुख्यमंत्री बने हैं- तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी. चर्चा है कि सुशील मोदी को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में मंत्री बनाया जाएगा.  

इस घटनाक्रम के बाद केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं लेकिन इसकी वजह सिर्फ सुशील मोदी का राजनीतिक भविष्य नहीं है. सस्पेंस इस पर भी बढ़ रहा है कि भाजपा कांग्रेस से आए और भगवा पार्टी के लिए वोटों की जंग में अपना कमाल दिखा चुके नेताओं को कैसे पुरस्कृत करेगी. मार्च में मध्यप्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को गिराने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 28 सीटों के उप-चुनाव में भाजपा के 19 सीटें जीतने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और वे केंद्र में मंत्री पद की अपेक्षा कर रहे हैं. असम में 2015 में कांग्रेस से भाजपा में आए हेमंत बिस्व सरमा जो पूरे उत्तर-पूर्व में भाजपा के विस्तार के सूत्रधार रहे हैं, आला कमान को कई बार संकेत दे चुके हैं कि उनके प्रदर्शन को मान्यता देने का वक्त आ गया है. अटकलें हैं कि सरमा को बतौर केंद्रीय मंत्री मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है ताकि वे 2021 के असम विधानसभा चुनाव में उत्साह के साथ योगदान कर सकें. हालांकि जिस तरह से सरमा चुनावी तैयारियों में जुटे हैं उससे लगता नहीं है कि वे अप्रैल से पहले केंद्रीय कैबिनेट में कोई जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे.  

असम के अलावा चार अन्य राज्यों में भी अगले साल चुनाव होने हैं और ये हैं- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुद्दुचेरी और केरल. बंगाल के लिए भाजपा ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए व्यापक चुनावी योजना तैयार की है. पार्टी के लिए यह लड़ाई न केवल रणनीतिक महत्व की है बल्कि प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है. इससे भाजपा को पूर्वी क्षेत्र में मजबूती मिलेगी जहां उसका विस्तार अभी सीमित है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ममता को घेरना चाहती है जो कि विपक्ष के सबसे मजबूत नेताओं में से एक हैं. रणनीति के तहत पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भाजपा राज्य के दो मौजूदा सांसदों- बाबुल सुप्रियो औऱ देबश्री चौधरी के अलावा एक और सांसद को मंत्रिपद दे सकती है. इसके लिए पश्चिम बंगाल के बर्धमान दुर्गापुर से भाजपा सांसद एस.एस. अहलूवालिया, अभिनेत्री से नेता बनीं ल़ॉकेट चटर्जी (हुगली से लोकसभा सांसद) और रूपा गांगुली (राज्यसभा सांसद) में से विकल्प तलाशे जा रहे हैं.  

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट में फेरबदल का एक और मकसद पार्टी में अगली पीढ़ी के नेताओं को आगे लाना है. उदाहरण के लिए सुशील मोदी को केंद्र सरकार में दायित्व सौंपने का एक औऱ मकसद बिहार में युवा नेताओं के लिए जगह बनाना है. इसकी एक वजह यह भी है कि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के नेता चिराग पासवान का उदय है जो कि 40 साल से कम के हैं. बिहार के वित्त मंत्री के तौर पर सुशील मोदी ने जीएसटी परिषद की बैठक के दौरान राज्यों के मंत्रियों में आम सहमति बनाने में गजब की कार्यकुशलता का परिचय दिया था. यह समय भाजपा के लिए लंबे समय से प्रदर्शन करते आ रहे नेताओं को पुरस्कृत करने का भी है जैसे भूपेंद्र यादव जिन्होंने लगातार सांगठनिक और चुनावी दायित्वों का निर्वहन किया है. कुछ युवा नेता शाहनवाज हुसैन, मीनाक्षी लेखी और जी.वी.एल. नरसिम्हा राव भी मंत्री पद की बाट जोह रहे हैं.  

राज्यस्तरीय इकाइयों में नियुक्तियों, केंद्रीय टीम के पुनर्गठन और राज्यों में नए पार्टी प्रभारियों की तैनाती के साथ भाजपा अध्यक्ष संगठन के पुनर्गठन का काम लगभग पूरा कर चुके हैं. लिहाजा कैबिनेट में बदलाव और विस्तार ही अगला तार्किक कदम हो सकता है. प्रधानमंत्री मोदी को न सिर्फ क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करना होगा बल्कि सहयोगियों को भी प्रतिनिधित्व देने की बात दिमाग में रखनी होगी.  

जद (यू) प्रमुख नीतीश कुमार पर भाजपा इस बात के लिए भी दबाव बना रही है कि उनकी पार्टी के सांसद केंद्र सरकार में हिस्सेदार बनें. फिलहाल भाजपा के पास शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से अलग होने और लोजपा का केंद्रीय कैबिनेट में प्रतिनिधित्व करने वाले रामविलास पासवान के निधन के बाद सहयोगी दलों से सिर्फ एक मंत्री है. यह देखना होगा कि भाजपा पासवान के पुत्र चिराग को उनकी पार्टी के कोटे की जगह भरने देती है या नहीं. लोजपा का बिहार चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान और नीतीश पर चिराग के हमलों के कारण जद (यू) को कुछ सीटों नुक्सान झेलना पड़ा और इसके परिणामस्वरूप भाजपा-जद (यू) गठबंधन में भाजपा बड़ी पार्टी हो गई और उसकी स्थिति भी अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत हो गई. इस तरह के परोक्ष प्रदर्शन का पुरस्कार चिराग को मंत्रिपद से दिया जा सकता है क्योंकि लोजपा अब भी केंद्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी है. हालांकि बिहार चुनाव में सिर्फ एक सीट जीतने के कारण चिराग की सौदेबाजी की ताकत काफी घट गई है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगी अपना दल की अनुप्रिया पटेल के पास दो सांसद हैं और उनकी किस्मत खुल सकती है.  

अच्छा प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत करने, राजनीतिक और चुनावी संतुलन कायम करने के लिए कैबिनेट में फेरबदल लगभग निश्चित है. कुछ नाम भाजपा में काफी चर्चा में चल रहे हैं. उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ की नेता और राज्यसभा सांसद सरोज पांडे को मंत्री पद मिल सकता है क्योंकि भाजपा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का उत्तराधिकारी तैयार करना चाहती है. 2018 में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी छत्तीसगढ़ के संगठन में व्यापक बदलाव करना चाहती है. कुछ अन्य नाम जो चर्चा में हैं उनमें राज्यसभा सांसद अनिल जैन (उत्तर प्रदेश), अश्विनी वैष्णव (ओडिशा) और पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और दिल्ली के प्रभारी श्याम जाजू (महाराष्ट्र) शामिल हैं.  

चर्चा यह भी है कि पंजाब से एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता केंद्र में मंत्रिपद के बदले भाजपा आने को तैयार बैठे हैं और उन्हें संभवत: खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय सौंपा जा सकता है जो पहले शिरोमणि अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल के पास था. भाजपा को भरोसा है कि पंजाब के नेता को जगह देने से पार्टी राज्य में किसानों के बीच नए कृषि कानूनों को लेकर फैले असंतोष को दूर कर सकेगी.  

हालांकि पीएम मोदी के हाथों हुए कैबिनेट फेरबदल के पुराने तजुर्बे बताते हैं कि अटकलों वाले नाम और वास्तविक नामों में काफी अंतर होता है. जुलाई में आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व पीएम मोदी से मिला था और उनसे केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल पर अपने विचार साझा किए थे. नरेंद्र मोदी को लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने 18 महीने हो चुके हैं. नियमानुसार वे अपनी कैबिनेट में 79 मंत्री रख सकते हैं. अभी उनके 53 सहयोगी है, जाहिर है उनके पास समीकरण फिट करने की पर्याप्त गुंजाइश है. फिलहाल सरप्राइज देना पसंद करने वाले पीएम मोदी के कदम का कम से कम अगले महीने तक इंतजार करना होगा.  

-अनिलेश महाजन के इनपुट के साथ 

(अनुवाद- मनीष दीक्षित)

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