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राहुल गांधी का दौरा राजस्थान कांग्रेस के लिए दे गया कई संकेत

राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को ज्यादा तरजीह दी तथा गहलोत और पायलट को एक साथ लाने का कोई प्रयास नहीं किया.

13 फरवरी को अजमेर के पास किसानों की ट्रैक्टर रैली को संबोधित करते राहुल गांधी (एएनआइ) 13 फरवरी को अजमेर के पास किसानों की ट्रैक्टर रैली को संबोधित करते राहुल गांधी (एएनआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 12-13 फरवरी को केंद्र के विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ राजस्थान दौरा कर चार रैलियों को संबोधित किया
  • राहुल जानते हैं कि गहलोत और पायलट के बीच तनातनी लंबी चलेगी
  • हालांकि कांग्रेस हाइकमान ने यह सुनिश्चित किया है कि दोनों के बीच कोई ऐसा मुद्दा न रहे जिससे पायलट कैंप नई बगावत करे

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 12-13 फरवरी को केंद्र के विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ राजस्थान दौरा कर चार रैलियों को संबोधित किया. इस दौरे से अगर राजनीतिक विश्लेषक कोई संकेत निकालना चाहेंगे तो वह सिर्फ एक ही होगा कि राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के मुकाबले ज्यादा तरजीह दी.  

राहुल किसानों के मुद्दे पर केंद्रित रहे और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर गहलोत और और पायलट को एक साथ लाने का कोई प्रयास नहीं किया. हालांकि दौरे की समप्ति पर कहा जा सकता है कि जिस तरह ये नेता मंचों पर बैठे और जिस तरह से रैली में इन्हें बोलने दिया गया उससे यह बात और स्पष्ट हो गई कि राहुल ने गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटसरा को ज्यादा अहमियत दी. हालांकि किसी भी पद पर न होने के बावजूद पायलट रैली के मंचों और माइक तक पहुंचे.  

कांग्रेस के लिए पायलट अब भी एक महत्वपूर्ण नेता हैं, पर उनकी राहुल तक पहुंच और उनसे नजदीकी दिखाई नहीं देती. गहलोत और पायलट के हावभाव बताते हैं कि उनके बीच कुछ बचा नहीं है. राहुल गांधी के दौरे में कई जगहों पर घटनाक्रम को नजदीकी से देखने वाले कांग्रेस के एक नेता ने कहा, “वे एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर सकते, वे एक-दूसरे का चेहरा नहीं देख सकते.”  

स्पष्ट रूप से राहुल जानते हैं कि गहलोत और पायलट के बीच तनातनी लंबी चलेगी. साथ ही वे पिछले साल जुलाई में पायलट की बगावत को भी भूल नहीं पाए हैं जो उन्होंने भाजपा के साथ कांग्रेस के खिलाफ की थी और उसका पार्टी को नुक्सान हुआ था. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर इंडिया टुडे से कहा, “अगर राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद के बागी तेवर भांपने और भाजपा से नजदीकी बढ़ने के बाद उनकी परवाह नहीं करते तो शायद ही वे पायलट को उनकी बगावत के लिए माफ करें.” उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में कोई ऐसा तय प्रोटोकॉल नहीं होता कि ऐसे आयोजनों पर किसे ज्यादा महत्व दिया जाना है.  

पायलट का बंगला 

हालांकि राहुल और कांग्रेस हाइकमान ने यह सुनिश्चित किया है कि दोनों के बीच कोई ऐसा मुद्दा न रहे जिससे पायलट कैंप नई बगावत करे. सांत्वना के तौर पर पायलट को उनका मंत्री वाला आधिकारिक बंगला अभी तक पास रखने दिया गया है. साथ ही दो बर्खास्त मंत्रियों विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीणा का भी आवास यथावत है. विडंबना यह है कि पायलट भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बंगले के आवंटन पर सवाल उठा रहे हैं. हालांकि दलील ये दी गई है कि वे वरिष्ठता के मुताबिक बंगला लेने की हकदार हैं. अपने मिजाज के अनुरूप गहलोत कहीं भी प्रतिशोध लेने वाले नहीं दिखना चाहते और उन्होंने पायलट खेमे के नेताओं को दोबारा कैबिनेट में शामिल करने की उम्मीद बनाए रखी है. पायलट कहते हैं कि उन्हें नहीं पता है कि विधानसभा की स्थायी समिति ने उन्हें बंगला आवंटित किया है. उन्होंने कहा, “मुझसे कहा जाएगा तो मैं इसे खाली कर दूंगा और अगर आवंटित किया जाएगा तो रहूंगा.” 

नियुक्तियां टाली गईं 

पायलट, गहलोत के लिए सबसे तगड़े विरोधी बनकर उभरे हैं. वे कांग्रेस हाइकमान पर अपने विधायकों को गहलोत कैबिनेट में जगह देने और संगठन में जगह देने के लिए दबाव बढ़ाते जा रहे हैं. कांग्रेस महासचिव और राजस्थान प्रभारी अजय माकन ने यह जनवरी के अंत तक सुनिश्चित करने का वादा किया था पर वे नाकाम रहे. माकन ने पार्टी संगठन की ज्यादातर नियुक्तियां दिसंबर 2020 तक कर लेने की समय सीमा तय की थी. लेकिन गहलोत और पायलट खेमों की लड़ाई की वजह से कुछ कम महत्व वाले लोग नियुक्त हो गए-ये उस आम सहमति का हिस्सा है जिसके तहत दोनों खेमों के प्रमुख नेताओं को तरजीह नहीं दी गई.  

गहलोत ने यथास्थिति बनाए रखने की नीति बनाए रखी क्योंकि वे उन नेताओं की उम्मीदें जिंदा रखना चाहते हैं जो पुरस्कृत होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. पायलट खेमे को कैबिनेट में बड़ा हिस्सा मिलने की उम्मीदें काफी कम हैं और गहलोत केवल उन लोगों को ही स्थान देंगे जिनके बारे में ये पक्का हो कि वे उनके और पार्टी के प्रति वफादार हैं. दोनों खेमों के झगड़े के कारण गहलोत को आयोगों और प्राधिकरणों में उन पदों पर रिटायर्ड अफसरों को बैठाना पड़ा जिन पर कांग्रेस विधायकों और निर्दलीय विधायकों को समायोजित किया जा सकता था.  

एक प्रमुख कांग्रेस नेता ने इंडिया टुडे से कहा, “पायलट और गहलोत के रिश्ते बहुत तनावपूर्ण हो चुके हैं. इन्हें नजरअंदाज करना और मीडिया की अटकलबाजी के लिए छोड़ने के बजाय, राहुल गांधी को उदासीन रहने की जगह अपने दौरे में इसे सीधे सुलझाना चाहिए था.” कांग्रेस हाइकमान स्वीकार्य चेहरा पेश कर सकता है, क्योंकि मार्च में संभावित चार विधानसभाओं के चुनाव में दोनों खेमे एक-दूसरे को नुक्सान पहुंचाने के लिए काम कर सकते हैं. सबसे बढ़िया विकल्प ये होगा कि हाइकमान गहलोत पर उपचुनाव, नियुक्तियों, कैबिनेट फेरबदल और पार्टी में स्थिरता की पूरी जिम्मेदारी डालें ताकि सरकार में स्थिरता कायम रहे. पायलट के पास कुछ ताकत है पर वे राजस्थान में पार्टी का चेहरा बनने में गहलोत से पराजित हो चुके हैं. यहां तक कि गहलोत के आलोचक भी इस बात से सहमत हैं कि पायलट से लड़ाई में उनका कद बढ़ा है. बहरहाल, उपचुनाव के बाद कुछ उथलपुथल दिख सकती है, हालांकि कैसे भी नतीजे आएं गहलोत हमेशा चतुराई से रास्ता निकाल लेंगे.

अनुवादः मनीष दीक्षित

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