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अकाली-भाजपा के अलग होने का मतलब

शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के 23 साल पुराने गठबंधन के टूटने का पंजाब की राजनीति के लिए क्या मतलब है?

चंडीगढ़ में 2018 में बादल परिवार के साथ पीएम मोदी (पीटीआइ) चंडीगढ़ में 2018 में बादल परिवार के साथ पीएम मोदी (पीटीआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अकाली दल हाल ही में पास हुए कृषि से जुड़े विधेयकों के विरोध में है
  • पंजाब की भाजपा इकाई को निर्देश मिले हैं कि बादल परिवार को निशाने पर नहीं लिया जाए
  • नौ शहरों के नगर निगमों और 167 शहरों के म्युनिसिपल कमेटी के चुनाव इस साल दिसंबर में होने हैं

गठबंधन में 23 साल रहने के बाद यह पहला मौका है जब शिरोमणि अकाली दल (शिअद) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ 25 सितंबर को प्रदर्शन करने सड़कों पर उतर आया. पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के सुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) के खिलाफ काफी सख्त हो गए हैं. पखवाड़े भर पहले तक उनकी पत्नी हरसिमरत कौर बादल इसी सरकार का हिस्सा थीं. बादल ने एक रात प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर ऐलान कर दिया के वे अपने सदाबहार पार्टनर से पंजाब में जुदा हो रहे हैं. यह वही गठबंधन है जिसे कभी उनके पिता और शिअद के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश सिंह बादल ने नाखून और चमड़ी जैसा जुड़ा हुआ बताया था.

शिरोमणि अकाली दल अपनी पूरी ताकत कृषि क्षेत्र से जुड़े और संसद से हाल में पास हुए तीन विधेयकों के विरोध में लगा रही है. पार्टी का समूचा नेतृत्व किसानों और खेत मजदूरों के साथ सड़कें जाम करने में जुट गया. राज्य की अन्य पार्टियां जैसे कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी इसका विरोध कर रही है. इस बात को ज्यादा वक्त नहीं हुआ है जब 12 सितंबर से पहले बादल इसी आक्रामकता से विधेयकों का समर्थन कर रहे थे.

शिअद ने 26 सितंबर को एनडीए से बाहर जाने की घोषणा की लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई को पहले से ही इसके लिए तैयार रहने को कह दिया था. ऐलान के कुछ घंटों पहले पंजाब में पार्टी के शीर्ष नेता तरुण चुग को पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की टीम में पदोन्नत करके महासचिव बनाया गया. वे हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के अलावा उन कुछ लोगों में शामिल हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनाव प्रबंधन में मदद की थी. राज्य में भाजपा को मजबूत करने में उनकी भूमिका अब बहुत महत्वपूर्ण हो गई है.

दिल्ली से पंजाब इकाई को निर्देश मिले हैं कि न तो बादल परिवार और न ही शिअद को निशाने पर लिया जाए. वहीं, कांग्रेस और आप पर हमले तेज किए जाएंगे. नाराज किसानों को मनाने के लिए केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के नेतृत्व वाले मंत्रालय ने खरीफ की फसलों की खरीद एक सप्ताह पहले शुरू कर दी है. यह 28 सितंबर से शुरू हो रही है जो पहले 5 अक्तूबर से तय थी. इसका मकसद यह है कि किसान वापस अपने खेतों को लौट जाएं और भाजपा को भी किसानों को यह भरोसा देने का मौका मिल जाए कि एमएसपी और एपीएमसी मंडियां खत्म नहीं हो रही हैं जैसा कि कांग्रेस और आप जैसी विपक्षी पार्टियां प्रचार कर रही हैं.

भाजपा नेताओं से सोशल मीडिया के जरिये किसानों तक पैठ बनाने को कहा गया है. स्मृति ईरानी, अनुराग ठाकुर, हरदीप सिंह पुरी, सोम प्रकाश, हंस राज हंस, गौतम गंभीर और सनी देओल जैसे पंजाबी बोलने वाले मंत्रियों और सांसदों से कहा गया है कि वे किसानों तक पहुंच बनाने के अभियाम में शामिल हों.

भाजपा राजनैतिक रूप से बादल और सुखबीर पर हमले नहीं करेगी लेकिन राजनैतिक विश्लेषक कुछ तय घटनाओं पर नजर रखे हुए हैं जिनसे राजनीतिक संबंधों के साथ पंजाब की राजनीति तय होगी, जैसे:

  • शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव पर फैसला अमित शाह के नेतृत्व वाला गृह मंत्रालय करता है. बादल परिवार का दशकों से इस संस्था में दबदबा है जो कि पंथ के पंजाब, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और हरियाणा में गुरुद्वारों के साथ प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर का भी प्रशासन नियंत्रित करता है. इन्हें इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा और इसके चुनावों में कोर्ट केस के कारण विलंब हो चुका है और इसके लिए शिअद को जिम्मेदार माना जा रहा है.
  • सुखदेव सिंह ढींढसा के नेतृत्व वाले शिअद (डी) ने काफी बढ़त हासिल कर ली है और एसजीपीसी चुनाव से 8-9 पहले और चोट पहुंचा सकता है. ढींढसा पहले शिअद में नंबर दो की हैसियत वाले नेता थे लेकिन उन्होंने पार्टी छोड़ दी और अकाली दल के बागियों और कांग्रेस व आप में चले गए पंथिक नेताओं को एकजुट किया.
  • नौ शहरों के नगर निगमों और 167 शहरों के म्युनिसिपल कमेटी चुनाव इस साल दिसंबर में होने हैं. 23 साल मे यह पहला मौका होगा जब शिअद और भाजपा ये चुनाव अलग-अलग लड़ेंगे. यह इन दोनों के अलग होने का पहला लिटमस टेस्ट होगा.
  • बादल परिवार के नजदीकियों और वफादारों के प्रवर्तन निदेशालय वाले केसों से जुड़े घटनाक्रम भी देखने लायक होंगे.
  • कांग्रेस पार्टी की प्रभावी ढंग से और तेजी से अपना घर सुधारने की काबिलियत देखनी होगी. मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और राज्य सभा सांसद प्रताप सिंह बाजवा के बीच खींचतान आम हो चुकी है जबकि क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं.

ये सब ऐसे तथ्य हैं जिनपर अकाली-भाजपा के जुदा होने का असर दिखेगा और इससे ही इन दोनों पार्टियों के भविष्य की रूपरेखा तैयार होगी.

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