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इनसाइटः नीतीश जाति जनगणना क्यों चाहते हैं?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते हैं कि केंद्र सरकार बिहार फॉर्मूले का अनुसरण करते हुए आरक्षण में से अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के लिए अलग से कोटा तय कर दे. नीतीश ने एक बार फिर जाति-जनगणना कराने की मांग भी की है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • नीतीश कुमार का कहना है कि यह जाति आधारित आरक्षण की खातिर आदर्श अनुपात तय करने के लिए जरूरी है
  • नीतीश चाहते हैं कि बिहार की तरह केंद्र भी आरक्षण में से ईबीसी के लिए अलग से कोटा तय कर दे
  • जस्टिस रोहिणी आयोग ओबीसी के 27 फीसद आरक्षण के समान पुनर्वितरण के मुद्दे पर राज्य सरकारों के साथ मशविरा शुरू करने जा रहा है

अमिताभ श्रीवास्तव

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते हैं कि केंद्र सरकार बिहार फॉर्मूले का अनुसरण करते हुए आरक्षण में से अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के लिए अलग से कोटा तय कर दे. इससे भी अहम यह कि नीतीश ने एक बार फिर जाति-जनगणना कराने की मांग की है. उनका कहना है कि यह जाति आधारित आरक्षण की खातिर आदर्श अनुपात तय करने के लिए जरूरी है.

फिलहाल, केंद्र के पास नौकरी और शैक्षिक संस्थाओं में दाखिले के लिए सिर्फ एक श्रेणी अन्य पिछड़ी जातियां (ओबीसी) है, जबकि बिहार ऐसी पद्धति का अनुसरण करता है जिसमें पिछड़ी जातियों को दो श्रेणियों में बांटा गया है—ईबीसी और ओबीसी. केंद्र ओबीसी को 27 फीसद आरक्षण देता है, जबकि बिहार में 12 फीसद आरक्षण ओबीसी को, 18 फीसद ईबीसी को और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को 3 फीसद आरक्षण दिया जाता है.

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘हम जन नायक कर्पूरी ठाकुर (पूर्व मुख्यमंत्री) के फॉर्मूले का अनुसरण कर रहे हैं. हमारा मानना है कि इसका पालन केंद्र को भी करना चाहिए.’’

गौरतलब है कि जस्टिस रोहिणी आयोग ओबीसी के 27 फीसद आरक्षण के समान पुनर्वितरण के राजनैतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे पर विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मशविरा शुरू करने जा रहा है. ऐसे में नीतीश कुमार के बयान की अहमियत बढ़ गई है.

केंद्र ने ओबीसी के लिए 27 फीसद आरक्षण को विभिन्न पिछड़े वर्गों के बीच समान रूप से बांटने के लिए दिल्ली हाइकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी. रोहिणी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया था. केंद्र ने पिछले महीने इस आयोग का कार्यकाल बढ़ा दिया और अब यह 31 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगा.

इस बात के संकेत हैं कि यह आयोग 2,633 ओबीसी जातियों की केंद्रीय सूची को चार उपश्रेणियों में बांटने के लिए जल्दी ही परामर्श शुरू करने वाला है.

आयोग ने पाया कि करीब 97 फीसद नौकरियां और उच्च शैक्षिक संस्थानों में दाखिले केवल 25 फीसद उपजातियों को मिल जाते हैं, और करीब एक-चौथाई नौकरियां ओबीसी की 10 प्रभावशाली जातियों के हिस्से चली जाती हैं. ऐसे में सारे ओबीसी समुदायों में आरक्षण के ‘समान वितरण’ की खातिर उपश्रेणियां बनाने की दलील दी जा रही है.

संयोगवश, इससे यह साबित हो गया है कि ओबीसी के भीतर ईबीसी की श्रेणी बनाने का बिहार का विचार न केवल वक्त से आगे है, बल्कि महत्वपूर्ण भी है. बिहार में अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के सशक्तीकरण का विचार सबसे पहले दिग्गज समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर ने पेश किया था, जिन्हें बिहार में सोशल इंजीनियरिंग का जनक माना जाता है. हालांकि ठाकुर ने ही पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण शुरू किया और विशेष लाभ के लिए अति पिछड़ा श्रेणी के लिए कोटे के भीतर कोटा शुरू किया लेकिन वे सोशल इंजीनियरिंग को आगे नहीं बढ़ा सके क्योंकि 1971 में उनकी सरकार गिर गई.

बाद में हालांकि लालू प्रसाद यादव को ईबीसी का समर्थन मिला लेकिन उन्होंने उनके सशक्तीकरण के लिए कुछ खास नहीं किया.

लेकिन नीतीश कुमार ने वह हासिल कर लिया जिसके बारे में कर्पूरी और लालू ने सोचा था. नीतीश कुमार ने इस विचार को पुनर्जीवित कर दिया. उन्होंने जनवरी 2006 में सबसे पहले त्रिस्तरीय स्थानीय निकायों, जिला बोर्डो, पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों में अति पिछड़ा वर्ग के लिए 20 फीसद आरक्षण की व्यवस्था कर दी.

नीतीश कुमार ने अति पिछड़ा के सशक्तीकरण के लिए प्रतिभाशाली ईबीसी युवाओं को वित्तीय सहायता देना शुरू किया. इससे वे लोक सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर सकते हैं या फिर अपना कारोबार खड़ा कर सकते हैं.

नीतीश ने कहा कि वे समाज के सबसे गरीब तबकों के लिए आरक्षण के समान वितरण और सशक्तीकरण के पक्ष में हैं. उनका मानना है कि इसे हासिल करने की दिशा में जाति जनगणना पहला कदम होगा. उन्होंने कहा, ‘‘एक बार जाति जनगणना करनी चाहिए क्योंकि इससे विभिन्न जातियों की संख्या मालूम हो जाएगी. इससे उनके लिए योजना बनाने में मदद मिलेगी. संयोगवश, बिहार विधानसभा ने जाति जनगणना के पक्ष में दो प्रस्ताव पहले ही पारित करके केंद्र को भेज रखा है.’’

संयोगवश, आखिरी जाति जनगणना 1931 में हुई थी और उसमें पिछड़ी जातियों की आबादी 52 फीसद बताई गई थी. लेकिन ओबीसी के कुछ वर्गों तथा अगड़ी जातियों ने इस आंकड़े पर सवाल उठाया है. बाद में 2011 में यूपीए सरकार ने देश में जाति और आर्थिक स्थिति का पता लगाने के लिए सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना शुरू की. इसमें भारत के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआइ) और ग्रामीण विकास, आवास और गरीबी उन्मूलन मंत्रालयों को शामिल किया गया. इस जनगणना के सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को 2015 में सार्वजनिक किया गया लेकिन अनियमितताओं का हवाला देते हुए जाति के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया. केंद्र की भाजपा सरकार के लिए जाति जनगणना कराना दोधारी तलवार भांजने के बराबर होगा. अगर जाति जनगणना में 52 फीसद के आंकड़े को सही पाया गया या उससे ज्यादा निकला तो इससे राजनैतिक और सामाजिक मंथन शुरू हो जाएगा और नौकरियों तथा दाखिले में मौजूदा 27 फीसद से ज्यादा कोटे के लिए आंदोलन शुरू हो जाएगा. इस तरह की स्थिति में नीतीश कुमार और अखिलेश यादव जैसे क्षेत्रीय नेताओं को फायदा होगा.

बहरहाल, नीतीश कुमार का कहना है कि जाति जनगणना से हर जाति की सही संख्या का पता चलेगा और उनके कल्याण के लिए योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा, ‘‘यह सिर्फ हमारी राजनैतिक मांग नहीं है. बिहार की विधानसभा और विधान परिषद ने इस तरह की जनगणना कराने के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेजा हुआ है.’’

भाजपा के लिए अपने सहयोगी नीतीश कुमार के विचार पर गौर न करना मुश्किल हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब केंद्र अपनी नीतियों, कानूनों और कार्रवाइयों की वजह से कई तरह के विवादों में उलझा हुआ है. आरक्षण के संवेदनशील मुद्दा होने की वजह से केंद्र स्पष्ट रूप से अपने लिए मुसीबत खड़ी करने से बचना चाहता है. हालांकि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव तार्किक लग रहा है कि उसमें किसी तरह के बदलाव से बड़ा बवंडर उठ सकता है. लेकिन आरक्षण का न्यायसंगत वितरण एक ऐसा तर्क है जिससे मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता.

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