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एच-1बी वीजा की लड़ाई

अमेरिका में कुशल भारतीयों को लाने वाले वीजा को लेकर आखिर इतना हो-हल्ला क्यों होता है.

इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे
स्टोरी हाइलाइट्स
  • एच-1बी वीजा हासिल कर सकने वालों की सूची को छोटा कर दिया गया है
  • एच-1बी वीजा के नए नियम दिसंबर से लागू होंगे
  • वीजा खारिज होने वाले आवेदनों की संख्या में भारतीयों के आवेदन ज्यादा हैं

रोशनी मजूमदार

अमेरिका में काम करने के लिए बड़ी संख्या में भारतीय एच-1बी वीजा पर निर्भर हैं और यह फिर चर्चा में है. पांच महीने पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की थी कि साल के अंत तक के लिए ये वीजा निलंबित किए जाते हैं. इस बार ट्रंप प्रशासन ने दो नए ‘अंतरिम फाइनल रूल्स’ तय किए हैं जिनसे नियोक्ताओं के लिए वीजा पर अप्रवासियों को नौकरी पर रखना मुश्किल हो जाएगा.  

एच-1बी वीजा पर रखे गए कर्मचारियों को नियोक्ता कितना वेतन देंगे, यह तय करने वाले अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ लेबर ने 6 अक्तूबर को घोषणा की कि वेतन में महत्वपूर्ण बदलाव किए जा रहे हैं. ये नियम 8 अक्तूबर से लागू हो गए. एक और नियम डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (डीएचएस)- अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा इसी का हिस्सा है- ने जारी किया और एच-1बी वीजा हासिल कर सकने वालों की सूची को छोटा कर दिया. ये नियम दिसंबर से लागू होंगे.  

ये नियम उन लोगों पर गंभीर असर डालेंगे जिन्हें एच-1बी वीजा जारी हो चुके हैं. इसका असर सिर्फ उन नियोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा जो भारतीयों को नौकरी पर रखना चाहते हैं बल्कि उन भारतीयों पर भी पड़ेगा जो अमेरिका में काम कर रहे हैं और उन्हें अपना एच-1बी वीजा की भविष्य में मियाद बढ़वाने की जरूरत पड़ेगी. हालांकि इन नियमों को कोर्ट में चुनौती दिए जाने के आसार हैं क्योंकि जिन एजेंसियों ने इन्हें जारी किया है उन्होंने पहले जन सुनवाई नहीं की है, जबकि मानक प्रक्रिया के तहत नए नियम जारी करने से पहले ऐसा करना जरूरी होता है.

ओबामा सरकार में आव्रजन नीति पर काम कर चुके और नागरिकता प्रक्रिया में अप्रवासियों की मदद करने वाले संगठन बॉंडलैस इमीग्रेशन के सह संस्थापक डग रैंड कहते हैं कि इस तरह के अंतरिम फाइनल रूल्स का इस्तेमाल एक दुर्लभ घटना है, हालांकि ट्रंप प्रशासन इस प्रक्रिया का इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही कर रहा है. वे कहते हैं, “यह एक जोखिमभरा कदम है क्योंकि अगर सरकार जन सुनवाई की प्रक्रिया को नजरअंदाज करने का ठोस कारण नहीं बता पाई तो अंतरिम फाइनल रूल कोर्ट में खारिज हो सकते हैं.” रैंड यहां डीएचएस स्टेटमेंट का हवाला दे रहे थे जिसमें कहा गया है कि महामारी का असर अकाट्य और प्रत्यक्ष है और यह फाइनल रूल जारी करने का पर्याप्त आधार है. हालांकि अर्थशास्त्रियों की तरफ से इसका कोई ठोस विश्लेषण नहीं है जिससे इन नए नियमों का औचित्य सिद्ध किए जा सकते कि अंतर्राष्ट्रीय कर्मचारियों की संख्या घटाने से अमेरिकी लोगों को ज्यादा संख्या में रोजगार के अवसर मिलेंगे. 

एच1बी वीजा सिस्टम पर ट्रंप प्रशासन की भृकुटि तनने का मुख्य कारण यह है कि एच1बी वीजा की वजह से कुछ हाई प्रोफाइल मामलों में अमेरिकी लोगों को खामियाजा उठाना पड़ा था. साल 2015 में वाल्ट डिज्नी ने 200 घरेलू आइटी कर्मचारियों को निकाल बाहर किया था और इस काम को एक भारतीय आइटी फर्म को आउटसोर्स कर दिया था. भारतीय आइटी फर्म विदेशी कर्मचारियों को एच1बी वीजा पर वही काम करने के लिए लाई थी. उसी साल दक्षिणी कैलिफोर्निया में एक यूटिलिटी कंपनी ने 400 आइटी कर्मचारियों को निकाल दिया था और इन्फोसिस और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को इसकी जगह पर रख लिया था. यही वह वक्त था जब डोनॉल्ड ट्रंप अमेरिका के राषट्रपति का चुनाव लड़ रहे थे और प्रचार में जुटे थे.  

अमेरिकी राष्ट्रपति का रुख वीजा के मामले में समय के साथ और कठोर होता गया. उदाहरण के लिए सीएनबीसी रिपब्लिकन की 2015 की डिबेट में ट्रंप ने कहा था कि कुछ कृपापात्र लोग देश में अवैध रूप से आ रहे हैं. लेकिन अप्रैल 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ शीर्षक वाले एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर दस्तखत किए. अमेरिकी सरकार का कहना था कि इससे अमेरिकी लोगों को ज्यादा वेतन का रास्ता साफ होगा.

हालांकि तब की और उससे पहले की रिपोर्ट में भी अमेरिका में टेक वर्कर्स की कमी की बात कही गई थी. माइकल ब्लूमबर्ग और रूपर्ट मर्डोक के गठजोड़ वाली न्यू अमेरिकन इकोनॉमी रिपोर्ट में एच-1बी वीजा सिस्टम में दक्ष कर्मचारियों को लाने की तरफदारी की गई थी. इसमें दलील दी गई थी कि इससे बिजनेस बढ़ेंगे और हर किसी के वेतन में भी बढ़ोतरी होगी. सभी एच-1बी वीजा टेक वर्कर्स को नहीं जाएंगे. बड़ी संख्या में यूनिवर्सिटी वैज्ञानिक अनुसंधान, सहयोगी कार्यों और छोटे स्टार्ट अप भी वर्करों के लिए एच-1बी वीजा पर निर्भर होते हैं. ये लोग अपने कारोबार के तकनीकी पहलू के लिए विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर होते हैं जो कि इन्हें ग्लोबल पैमाने पर प्रतिस्पर्धी बनाते हैं. इस बात में भी स्पष्टता नहीं है कि नए नियम कौशल के अंतर को भर पाएंगे क्योंकि ज्यादातर अमेरिकी दूसरे सेक्टरों में नियोजित है. लेकिन इस बहस का भारतीय कंपनियों पर भी असर है. भारतीय एच-1बी वीजा के सबसे बड़े आवेदक हैं. पिछले साल एच-1बी वीजा के 75 प्रतिशत आवेदन भारतीयों के थे, लिहाजा खारिज होने वाले आवेदनों की संख्या में भी भारतीयों के आवेदन ज्यादा हैं. टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा को 2019 में मना करने की दर (डिनायल रेट) क्रमश: 31 प्रतिशत, 35 प्रतिशत, 47 प्रतिशत और 37 प्रतिशत रहा. दूसरी ओर अमेजन और गूगल के लिए आवेदनों के खारिज होने की दर 4 प्रतिशत रही. इससे स्पष्ट है कि प्रशासन अपने कुछ कृपापात्रों के लिए यह लड़ाई लड़ रहा है.

अनुवादः मनीष दीक्षित

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