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वीरभद्र के बाद कांग्रेस को हिमाचल में नए लीडर की तलाश

हिमाचल प्रदेश में जातीय समीकरण और विवाद-रहित फार्मूले पर तय होगा कांग्रेस का नया चेहरा.

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हिमाचल में कांग्रेस को नए नेता की तलाश हिमाचल में कांग्रेस को नए नेता की तलाश
स्टोरी हाइलाइट्स
  • लोकसभा की एक सीट और तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में जीत से कांग्रेस उत्साहित है
  • वीरभद्र सिंह की मृत्यु के बाद लीडरशिप को लेकर पुराने दिग्गज अपने दावे ठोकने लगें हैं
  • दूसरी ओर, उपचुनाव में अपनी हार पर भाजपा मंथन कर रही है

-डी॰डी॰ गुप्ता
लोकसभा की एक सीट और तीन विधानसभा सीटों पर हिमाचल प्रदेश में हुए उपचुनाव में जीत से उत्साहित कांग्रेस एक साल के भीतर होने जा रहे फाइनल चुनाव जीतने की तैयारियां करने लगी है. वीरभद्र सिंह की मृत्यु के बाद राज्य में लीडरशिप को लेकर पुराने दिग्गज अपने दावे ठोकने लगें हैं. राज्य में सत्ता वापसी का माहौल भांप नेताओं में मुख्यमंत्री पद की बिसात बिछने लगी है. इसी क्रम में दावेदार नेता अपने-अपने हिसाब से विधायकों की टीम बना कर आगे बढ़ रहे हैं. 

हालांकि पार्टी में नए अध्यक्ष बने कुलदीप राठौर के नेतृत्व में इन उपचुनावों को लेकर कांग्रेस के पक्ष में माहौल खड़ा किया जा रहा है. लेकिन मुख्यमंत्री (सीएम) पद के लिए संगठन में बदलाव के साथ ही विपक्ष के नेता के बदलाव को लेकर भी जद्दोजहद जारी है. वीरभद्र सिंह के परिवारवाद से इतर कांग्रेस में नए लीडरशिप के उभरने के लिए नजरें दस जनपथ पर टिकी हैं.

हाल ही में दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह के सांसद चुने जाने के बाद उनके आवास पर कांग्रेसी नेताओं का जमावड़ा भी अपने आप में यह संदेश दे रहा है कि नेतृत्व को लेकर मामला हाइकमान पर छोड़ दिया जाए और वहीं से हरी झंडी का इंतजार हो रहा है. बताया जा रहा है कि कांग्रेस में लीडरशिप को लेकर जल्द ही स्थिति साफ होगी क्योंकि पंजाब की तर्ज पर नई टीम के जरिए पार्टी आगे बढ़ेगी. पंजाब में युवा चेहरे को सरप्राइज ऐलीमेंट के तौर पर पेश करके कांग्रेस ने भाजपा की तर्ज पर काम किया है. इसलिए पुराने दिग्गजों की मनमानी से पीछा छुड़ाने की कसरत के मद्देनज़र हिमाचल में भी जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखा जाएगा. 
सूत्र बताते हैं कि राज्य कांग्रेस प्रभारी राजीव शुक्ला से फीडबैक मांगी जा रही है और नए चेहरे में संगठन और सरकार में तजुर्बा वाले नेताओं को शार्टलिस्ट किया जा रहा है. अन्य राज्यों में हुई किरकिरी के बाद हिमाचल में गैर-विवादित लीडर को सीएम चेहरा देने की कोशिश है. राज्य में भाजपा के सीएम चेहरा जय राम ठाकुर युवा होने के साथ-साथ संगठन अध्यक्ष एवं पांच मर्तबा विधायक भी रहे. साथ ही उनकी ईमानदार छवि के कारण पार्टी हाइकमान ने राजपूत प्रत्याशी को राज्य का जिम्मा दिया. 

इसी तर्ज पर हिमाचल कांग्रेस में भी कई नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं. पार्टी में हमीरपुर संसदीय सीट क्षेत्र से सुखवेंद्र सिंह सुक्खू का नाम कांग्रेस के कई विधायक आगे बढ़ा रहे हैं. इसके पीछे करीब दो दशकों तक सुक्खू की एनएसयूआइ एवं युवा कांग्रेस में अध्यक्षता के साथ ही लंबे अर्से तक पार्टी की अध्यक्षता भी रही. वह सीपीएस भी रहे और नादौन से कई बार विधायक भी रहे. भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त सुक्खू अपनी तनख्वाह को डोनेट करने और ईमानदार छवि के लिए जाने जाते हैं. राजपूत विधायक, (जिस वर्ग की राज्य में बहुतायत है) की भी वह पैरवी करते हैं. वह पार्टी के कई धड़ों से ऐका करते चलते हैं और पूर्व में जब-जब भी वीरभद्र सिंह ने अपने पार्टी विधायकों के साथ दस जनपथ में आंख दिखा कर कदमताल की, उस वक्त सुक्खू ने विद्या स्टोक्स के साथ रहते गांधी परिवार के प्रति निष्ठा बनाए रखी. 

वहीं दूसरी ओर ठाकुर प्रत्याशियों में राम लाल ठाकुर, कौल सिंह और आशा कुमारी के नाम भी समर्थक चला रहे हैं. मंडी से होने को कारण कौल सिंह की हसरतें परवान चढ़ रही हैं, वहीं रामलाल ठाकुर भी अपने हिसाब से आगे बढ़ रहे हैं. आशा कुमारी महिला हैं और सोनिया गांधी परिवार की करीबी भी. केंद्र में आनंद शर्मा का साथ भी उन्हें हासिल है.

राज्य में सीएलपी लीडर मुकेश अग्निहोत्री भी वीरभद्र के दाएं हाथ रहे हैं और ऊना में हरोली से हैं. ब्राह्मण प्रत्याशी के तौर पर उनका पलड़ा भारी भले न हो, लेकिन अपनी बेबाकी और तेज़तर्रारी के कारण वे आगे बढ़ते हैं. विधायकों की टीम को साथ रखने के लिए यह भी वीरभद्र खेमे के साथ लाॅबिंग कर रहे हैं. सुधीर शर्मा भी ब्राह्मण कोटे से हैं, इसलिए वे राज्य में भाजपा के स्ट्रांग फेस की तरह कद नहीं बना पाए. कुछ लोग राजपूत और महिला दावेदारी पर वीरभद्र की पत्नी प्रतिभा पर दांव खेलने की तैयारी में हैं. पंजाब चुनाव से पहले हिमााचल में कांग्रेस एक चेहरे को साफतौर पर आगे करना चाहती है. हालांकि कुलदीप राठौर जब पार्टी अध्यक्ष बने तो चर्चाएं चली कि वह उच्छे अध्यक्ष साबित नहीं होंगें, लेकिन उपचुनाव के नतीजों ने राठौर का कद बढ़ा दिया. राठौर कभी चुनाव नहीं लड़े और ईमानदार छवि के लिए जाने जाते हैं. बहरहाल कांग्रेस में जल्द ही एक नया चेहरा सामने होगा. हाइकमान क्या तय करेगा यह सामने होगा.
 

भीतरघात से हारे जयराम

दूसरी ओर, उपचुनाव में कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार पर चिंतन-मंथन जारी है. वीरभद्र का सिंपथी फैक्टर हो या मंहगाई का मुद्दा, पर भाजपा को इस बार बड़ा झटका अपनों ने ही दिया है. मंडी सीट पर चुनाव जयराम की प्रतिष्ठा से जुड़ा था. लेकिन पूर्व में भाजपा के घोषित सीएम प्रत्याशी का वर्ष 2017 में हारना और जयराम का अचानक सीएम बन जाना, साढ़े तीन साल तक पार्टी के एक बड़े धड़े को रास नहीं आया. अब मंडी लोकसभा चुनाव एक ऐसा मौका था जब जयराम को नीचा दिखाया जाए. सूत्र बताते हैं कि कुल्लू और मंडी जिलों में ऐसे ही भीतरघातयों ने न सिर्फ कांग्रेस प्रत्याशियों का साथ दिया बल्कि नोटा का बटन भी दबा दिया. भाजपा के गैर-परिवारवाद फार्मूले को भी इन चुनावों में “डेंट” का बड़ा कारण माना जा रहा है. अब देखना यही है कि अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भाजपा भीतरधात से कैसे निपटेगी? वह भी तब जब मौजूदा सीएम के गृह जिले मंडी की प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के गृह राज्य की भी प्रतिष्ठा इन चुनावों से जुड़ी थी. यह नतीजे कांग्रेस को नई संजीवनी भी दे गए हैं. अब नरेंद्र मोदी के अगले ऐक्शन पर सभी की निगाहें हैं.

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