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नेताओं का कद तय करेंगे राजस्थान उपचुनाव, टिकट देने में परिजनों को तरजीह

दोनों पार्टियों ने उन विधायकों के परिजनों को उपचुनाव के मैदान में उतारा है जिनके निधन के कारण उपचुनाव हो रहे हैं ताकि सहानुभूति के वोट मिलें. वहीं, कांग्रेस अंदरूनी खींचतान पर रोक लगाने के प्रयास में भी है.

सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस अंदरूनी खींचतान न दिखाने के लिए काफी संवेदनशील हो गई है
  • राजस्थान में तीन विधानसभा सीटों पर 17 अप्रैल को उपचुनाव होने हैं और नतीजे 2 मई को आएंगे
  • इनमें राजसमंद भाजपा के पास तथा सहारा और सुजानगढ़ कांग्रेस के पास थीं

मंगलवार 30 मार्च को बागी कांग्रेस नेता सचिन पायलट की उदयपुर के महाराणा प्रताप हवाई अड्डे पर केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से मुलाकात को लेकर सोशल मीडिया पर कयास लगाए जाने लगे. दोनों नेता राजसमंद विधानसभा उपचुनाव के लिए प्रचार करके लौट रहे थे. शेखावत की कमर पर हाथ रखे पायलट की अस्वाभाविक तस्वीर सबका ध्यान आकर्षित कर रही थी क्योंकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहले ही दोनों पर अपनी सरकार गिराने की साठगांठ करने का आरोप लगा चुके हैं. लेकिन तीन सीटों के उपचुनाव के लिए प्रचार शुरू हो चुका है और हालात का शुरुआती अंदाजा लगाएं तो लगता है कि कांग्रेस एक सर्वमान्य चेहरा ढूंढने की कोशिश में है ताकि पायलट और गहलोत एक साथ हवाई यात्रा करें और मंच साझा करें. कांग्रेस अंदरूनी खींचतान न दिखाने के लिए काफी संवेदनशील हो गई है और उसने यह सुनिश्चित किया है कि मंच पर पायलट की तस्वीरें लगें.  

इसके विपरीत भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व उनकी तस्वीरों की शुरुआती प्रचार अभियान और नामांकन प्रक्रिया के दौरान गैरमौजूदगी संदिग्ध रही. लेकिन वे स्टार प्रचारकों की सूची में हैं. राजस्थान में तीन विधानसभा सीटों पर 17 अप्रैल को उपचुनाव होने हैं और नतीजे 2 मई को आएंगे. इनमें राजसमंद भाजपा के पास तथा सहारा और सुजानगढ़ कांग्रेस के पास थीं. बहरहाल, ये चुनाव कुछ नेताओं का कद जरूर तय कर देंगे.

परिजनों को तरजीह, तजुर्बा यही है 

दोनों ही पार्टियों ने उपचुनाव में कोई जोखिम नहीं लिया है. पार्टियों ने उन विधायकों के परिजनों को मैदान में उतारा है जिनके निधन के कारण उपचुनाव हो रहे हैं ताकि सहानुभूति के वोट मिलें. साथ ही स्थापित राजनीतिक परिवार की पहुंच और तजुर्बे का फायदा मिले. इनके मुकाबले में परिपक्व नेताओं को उतारा गया है. भाजपा ने राजसमंद से 34 साल की दीप्ती माहेश्वरी को उतारा है. यह सीट उनकी मां और पूर्व मुख्यमंत्री किरण माहेश्वरी के कोरोना से निधन के कारण खाली हुई है जो एक प्रतिबद्ध राजनेता थीं. कांग्रेस ने यहां से 45 साल के तनसुख बोहरा को उतारा है जो प्रभावी मार्बल कारोबारी हैं. वे सामाजिक तौर पर सक्रिय और सर्वमान्य चेहरा हैं. हालांकि पिछले साल स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया था और इसके बाद से टिकट के अनेक दावेदार खड़े हो गए थे.   

सुजानगढ़ में कांग्रेस ने 45 साल के मनोज मेघवाल को उतारा है जो पेशे से वकील हैं और भंवरलाल मेघवाल के पुत्र हैं, जिनके निधन के कारण यह उपचुनाव हो रहा है. उनका मुकाबला भाजपा नेता और पूर्व मंत्री खेमाराम मेघवाल (55 वर्षीय) से हो रहा है.  

कांग्रेस ने 68 वर्षीय गायत्री देवी को सहारा सीट से टिकट दिया है जो कि उनके पति कैलाश त्रिवेदी के निधन के कारण खाली हुई. गायत्री देवी का मुकाबला भाजपा के 73 वर्षीय रतन लाल जाट से हो रहा है जो कि पूर्व मंत्री भी रह चुके हैं. लिहाजा तीन सीटों में भाजपा ने दीप्ती माहेश्वरी के रूप में एक नया चेहरा और कांग्रेस ने तीनों सीटों पर नए प्रतिद्वंद्वी उतारे हैं. लेकिन इनमें से दो मनोज मेघवाल और गायत्री देवी उन लोगों के परिवारों से हैं जिन्होंने 2018 का विधानसभा चुनाव जीता था.  

कांग्रेस के बोहरा इसमें अपवाद हैं, उन्होंने न तो पहले कोई चुनाव लड़ा है और न ही वे स्थापित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं.  

गहलोत-पायलट समरसता? 

पायलट रैलियों में अपने संबोधनों में कहते हैं, “ये चुनाव सरकार बनाने या गिराने के लिए नहीं हैं”, इसका सीधा मतलब यह है कि चुनाव में खराब प्रदर्शन से गहलोत कमजोर होंगे और इससे उन्हें रक्षात्मक होना पड़ेगा. लेकिन पायलट के साथ उन इलाकों में जहां गुर्जर वोट (पायलट गुर्जर समुदाय से हैं) अच्छे खासे हैं, मुख्यमंत्री उनके ऊपर चुनावी प्रदर्शन की जिम्मेदारी डालते दिखते हैं. गहलोत कहते हैं कि वे उस घोषणापत्र को लागू कर रहे हैं जिसकी घोषणा पायलट ने की थी. गहलोत न सिर्फ प्रदर्शन के आधार पर वोट मांग रहे हैं बल्कि एक स्थिर सरकार का भी हवाला दे रहे हैं जिसे उखाड़ने में भाजपा लगी हुई है. गहलोत लोगों से अगले ढाई साल के लिए खुद को वोट देने के लिए कह रहे हैं और लोगों से कहते हैं कि अगर वे इस दौरान काम न करें तो उन्हें आगे वोट न दें. पायलट किसान आंदोलन को मुद्दा बना रहे हैं. दूसरी ओर भाजपा, कांग्रेस सरकार की अंदरूनी खींचतान को निशाने पर ले रही है. राज्य भाजपा अध्यक्ष को प्रत्याशी चयन और प्रचार में खुला हाथ मिला हुआ है. अच्छे प्रदर्शन से उनकी स्थिति मजबूत होगी. लगता नहीं कि राजे खेल बिगाड़ने की कोई कोशिश करेंगी. पूनिया को गजेंद्र सिंह शेखावत और नेता विपक्ष गुलाब चंद कटारिया का मिला हुआ सहयोग महत्वपूर्ण रहेगा. 

अनुवादः मनीष दीक्षित

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