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इकोनॉमिकमः हिम्मत बांधने की जरूरत

इन दिनों में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर एक बैंक की मुहर लगी पासबुक का फोटो वायरल हो रहा है. यह फोटो सही है या नहीं इसपर बहस करने से पहले यह जानना जरूरी है कि जो जानकारी इसके सहारे वायरल की जा रही है वह दरअसल बिल्कुल सही है.

फोटो सौजन्यः सोशल मीडिया फोटो सौजन्यः सोशल मीडिया

इन दिनों में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर एक बैंक की मुहर लगी पासबुक का फोटो वायरल हो रहा है, जिसमें यह लिखा है कि बैंक में आपकी जमा में से सिर्फ एक लाख रुपए तक की राशि ही बीमित है. यानी अगर बैंक डूब जाता है जो आपकी पूरी जमा में से सिर्फ एक लाख रुपए की वापस मिलेंगे. 

यह फोटो सही है या नहीं इसपर बहस करने से पहले यह जानना जरूरी है कि जो जानकारी इसके सहारे वायरल की जा रही है वह दरअसल बिल्कुल सही है. डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (डीआइसीजीसी) की ओर से बैंकों पर दिया जाने वाला बीमा एक लाख रुपए तक की राशि पर ही है. यह नियम, बैंक की लॉकर में रखी सम्पत्ति, सावधि जमा यानी एफडी, बचत खाते में जमा पैसा आदि सब पर समान रूप से लागू होता है. डीआइसीजीसी, भारतीय रिजर्व बैंक की ही एक सब्सिडरी है.

ऐसे समय में जब पीएमसी बैंक सवालों के घेरे में है तब कहीं न कहीं हर बैंक खाताधारक के मन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या मेरा पैसा बैंक में सुरक्षित है? 

यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि भारत में आजतक किसी भी बड़े निजी या सार्वजनिक बैंक ने डिफॉल्ट नहीं किया है. को-ओपरेटिव संस्थाओं का ढांचा और कामकाज हमेशा पारदर्शिता की कमी के कारण सवालों के घेरे में रहता है. नोटबंदी के दौरान भी को-ओपरेटिव बैंक की ओर धांधली की खबरें चर्चा में थीं. 

भारत में आज तक अगर कोई बड़ा बैंक डिफॉल्ट नहीं हुआ तो इसका श्रेय दो लोगों को जाता है. पहला आरबीआइ जैसे सख्त नियामक और दूसरा करोड़ों देशवासियों, जिनकी आदत में बचत करना शुमार है. भारत में बैंक अपनी जमा के कारण धंधा कर पा रहे हैं. 

ऐसे समय में जब देश में करोड़ों बैक खाता धारकों में भरोसे की कमी है तो क्या सरकार को जमाकर्ताओं की हिम्मत बांधने के लिए बीमित जमा राशि की सीमा नहीं बढ़ानी चाहिए. पिछली बढ़ोतरी 23 साल 6 महीने पहले मई 1993 में की गई थी. शुरुआत 1961 में 1.5 हजार रुपए की रकम से की गई थी. इसके बाद 1968 में इस सीमा को बढ़ाकर 5 हजार, 1970 में 10 हजार, 1976 में 20 हजार, 1980 में 30 हजार किया गया था. 1993 के बाद अब तक महंगाई 470 फीसदी से ज्यादा बढ़ चुकी है. यानी 1993 में 100 रुपए आज 570 रुपए के करीब हो चुके हैं. तो बीमे की राशि को 1 लाख से बढ़ाकर 5 से 6 लाख के बीच क्यों नहीं लाना चाहिए. 

देश में बैंक डूबने की खबरें आम नहीं है. ऐसे में सरकार या बैंक की सेहत पर इसका बहुत असर पड़े या न पड़े लेकिन आम जनता में भरोसा जगाने के लिए यह कदम जरूर काम आएगा. वो भी ऐसे समय पर जब देश में बचत दशकों के निचले स्तर पर है. आरबीआइ, बैंक और डीआइसीजीसी संयुक्त रूप से एक ऐसा फैसला लें ताकि जनता की हिम्मत बंध सके. 

(शुभम शंखधर इंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर हैं)

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